Liquor Ban in Bihar: बिहार की शराबंदी नीति दोषपूर्ण है या राजनीति?

शराब सेवन व्यसन का विषय है, लेकिन बिहार में यह पिछले साढ़े छह साल से राजनीति का मुद्दा बना हुआ है। सारण और सिवान जिले में जहरीली शराब पीने से हुई दर्जनों मौतों के बाद तो बिहार में शराब की राजनीति चरम पर है।

Liquor Ban in Bihar prohibition policy flawed or politics over died due to poisonous liquor

Liquor Ban in Bihar: बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा नीतीश सरकार पर हमलावर है। सदन से लेकर सड़क तक भाजपा आंदोलन कर रही है और सारण और सिवान में जहरीली शराब पीने से हुई मौतों के लिए लगातार सरकार की नीतियों को दोषपूर्ण ठहरा रही है। भाजपा ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से इस्तीफे की मांग तक कर डाली है। नेता प्रतिपक्ष विजय सिन्हा कहते हैं, 'हमारे 30 विधायकों का दल प्रभावित गावों में गया था। हमने पीड़ित परिवारों से मुलाकात की। आंकड़े छिपाने के लिए जबरदस्ती शवों का पोस्टमार्टम कराया गया है। 100 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है। मुख्यमंत्री मौतों की जिम्मेदारी लें।'

दूसरी ओर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी शराब नीति पर पूर्व की तरह कायम हैं। विपक्षी दलों के आरोप का जवाब देने के क्रम में तो उन्होंने बीच सदन में अपना आपा तक खो दिया। उन्होंने अपनी सौम्य और शालीन छवि के विपरीत स्तरहीन भाषा का इस्तेमाल किया।

देखा जाए तो शराबबंदी की नीति को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लगातार अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित करते रहे हैं। हालिया घटना के बाद जब इस पर सर्वाधिक सवाल उठ रहे हैं, तो वे जो प्रतिक्रिया दे रहे हैं उससे संकेत मिलता है कि मुख्यमंत्री शराबबंदी को लेकर न सिर्फ प्रतिबद्ध हैं, बल्कि पजेसिव हैं। यही कारण है कि जब विपक्षी दलों ने जहरीली शराब से मरने वाले लोगों के आश्रितों को आर्थिक मदद देने की मांग की तो मुख्यमंत्री ने कहा- 'दारू पीकर मरे हैं तो क्या सरकार मुआवजा देगी। एक पैसा नहीं देंगे। जो शराब पियेगा वो मरेगा।'

पूर्व में भी राज्य के अंदर कई बार शराबबंदी से होने वाले आर्थिक नुकसान समेत अन्य परेशानियों की बात उठती रही है। लेकिन हर तर्क को मुख्यमंत्री लगातार खारिज करते रहे हैं और किसी तरह के पुनर्विचार की आवश्यकता से इनकार करते रहे हैं।

सैद्धांतिक रूप से शराबबंदी के कई लाभ गिनाए जाते हैं। लेकिन अब जबकि कानून को लागू किए हुए साढ़े छह साल बीत गए हैं तो बिहार के समाज को स्वास्थ्य और नशापान से मुक्ति की दिशा में कितना लाभ मिला, इसका कोई आधिकारिक अध्ययन या आंकड़ा मौजूद नहीं है। वहीं दूसरी ओर इस नीति के कारण जो परेशानियां सामने आई हैं, वे गंभीर हैं।

गौरतलब है कि बिहार की तत्कालीन महागठबंधन की सरकार ने अप्रैल 2016 में शराबबंदी कानून (बिहार मद्यनिषेघ और उत्पाद अधिनियम-2016) लागू किया था। उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक अप्रैल 2016 से फरवरी 2022 तक इस कानून के तहत करीब 4.5 लाख लोगों को कानून के उल्लंघन के जुर्म में गिरफ्तार किया गया। कई हजार लोग जेलों में बंद हैं। सख्ती के बावजूद हर दिन गिरफ्तार होने वालों की संख्या में इजाफा हो रहा है।

उत्पाद विभाग के द्वारा जनवरी में जहां प्रतिदिन औसतन गिरफ्तारी 40 थी, वह नवंबर में 751 गिरफ्तारी प्रतिदिन तक पहुंच गई है। पुलिस और उत्पाद विभाग दोनों के आंकड़े मिला लें तो प्रतिदिन औसतन 1400 से अधिक अभियुक्त शराब पीने के जुर्म में पकड़े जा रहे हैं। यह आंकड़ा इसलिए चौंकाने वाला है क्योंकि गिरफ्तारी की यह संख्या इसी अवधि में अन्य अपराधों के लिए हुई गिरफ्तारी से भी अधिक है। इससे स्पष्ट है कि शराबबंदी को लागू करने के लिए पुलिस और प्रशासन ने न सिर्फ तत्परता दिखाई बल्कि शीर्ष प्राथमिकता दी है। कई बार तो इसके लिए लम्बे-लम्बे समय तक विशेष धड़-पकड़ अभियान चलाया गया।

कानून में (संशोधन के बावजूद) सजा और दंड के कठोर प्रावधान मौजूद हैं। इसके बावजूद शराब की बोतल शराबी को मिल ही जाती है। शराब की अवैध होम डिलेवरी की बातें सुनने को मिलती रहती है। चर्चित चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर का आरोप है कि 'बिहार में जगह-जगह शराब की होम डिलेवरी होती है।'

शराबबंदी के कारण अन्य खतरनाक नशा जैसे कि गांजा, मादक द्रव्य, देसी दारू के सेवन में बढ़ोतरी की रिपोर्ट मीडिया में आती रहती है। बंदी के कारण राजस्व नुकसान का आंकड़ा भी कम नहीं है। उल्लेखनीय है कि कानून लागू होने से पहले बिहार को शराब के मद में सालाना 5,000 करोड़ की आमदनी होती थी।

इन सबके बावजूद यह सवाल अनुत्तरित रह जाता है कि क्या शराबबंदी सच में एक अप्रासंगिक कदम है? इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए हमें शराबबंदी के राष्ट्रीय या वैश्विक अनुभव और वैज्ञानिक अध्ययनों पर गौर करना होगा। रिकॉर्ड बताते हैं कि दुनिया में कहीं भी कोई सरकार शराबबंदी को सफलतापूर्वक लागू नहीं करवा पाई है।

बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में अमेरिका, कनाडा, सोवियत यूनियन आदि में शराबबंदी लागू की गई थी। कई वर्षों के बाद लगभग हर जगह यह विफल हो गई। शराबबंदी के कारण अवैध शराब की खरीद-बिक्री का एक व्यापक संगठित अपराध तेजी से फैलने लगा। जहरीली शराब से होने वाली मौत की घटना में वृद्धि होती गई और अंतत: हर जगह शराबबंदी अप्रासंगिक साबित होती रही और हटती रही।

2015 में शराबबंदी के लिए बंबई उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका डाली गई थी, जिस पर महाराष्ट्र सरकार के उत्पाद विभाग ने न्यायालय में अपना पक्ष रखते हुए जो कहा था, वह एक कड़वी सच्चाई है। विभाग ने कहा था, 'प्रवर्तन एजेंसियां पूर्ण शराबबंदी में कभी सक्षम नहीं हुई हैं। एजेंसियों के आंकड़ों में देखा जा सकता है कि शराबबंदी के बाद अवैध शराब निर्माण, परिवहन और बिक्री के मामले में वृद्धि होती जाती है।'

यह सच है कि शराब सेवन घरेलू हिंसा, सड़क दुर्घटना समेत अन्य प्रकार के अपराधों को बढ़ावा देता है। शराब के व्यसन से घर उजड़ते हैं, रोग का बोझ बढ़ता है। लेकिन सिर्फ कानून, पुलिस और सख्ती के बल पर शराब उन्मूलन असंभव है। बिहार जैसे राज्य में जिसकी सीमा नेपाल समेत झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश से लगती है, वहां प्रशासन के लिए शराब की तस्करी रोकना और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

ऐसे में नशा उन्मूलन के क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञों के अनुभव और सलाह पर ध्यान देना चाहिए। सरकार अवैध शराब निर्माण पर रोक लगाकर, शराब बिक्री के मानदंडों को सख्त कर और नशा उन्मूलन केंद्रों का नेटवर्क तैयार कर इसे नियंत्रित कर सकती है। पूर्ण प्रतिबंध की बजाय नियंत्रण ही बीच का रास्ता है, जिससे शराब के अभिशाप से बहुत हद तक मुक्ति पाई जा सकती है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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