लाल बहादुर शास्त्री ने 1965 में ही रख दी थी बांग्लादेश की नींव
अभी 2 अक्टूबर को देश ने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की 118वीं जयंती मनाई है। साल 1904 में बनारस के पास मुगलसराय में जन्मे प्रधानमंत्री शास्त्री का 61 वर्ष की आयु में 1966 में ताशकंद में निधन हो गया था। जिन परिस्थितियों में उनका निधन हुआ उन पर आज भी संशय बना हुआ है। अपने निधन से पहले, छोटी सी कद-काठी और साधारण से दिखने वाले लाल बहादुर शास्त्री लगभग अठारह महीनों तक भारत के प्रधानमंत्री रहे।

प्रधानमंत्री शास्त्री ने अपने इस कार्यकाल में कई महत्वपूर्ण कार्य किये लेकिन उसमें सबसे प्रमुख 1965 का भारत और पाकिस्तान का युद्ध था। इस युद्ध में पाकिस्तान ने न सिर्फ भारत से मात खायी बल्कि उसके विभाजन की भी नींव इसी दौरान रख दी गयी थी। कुछ साल बाद 1971 में इसका नतीजा बांग्लादेश के रूप में सामने भी आ गया।
पेंटवाले अयूब का धोतीवाले शास्त्री जी पर तंज
साल 1965 में जब पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान ने 'ऑपरेशन जिब्राल्टर' और फिर बाद में 'ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम' के नाम पर जम्मू और कश्मीर पर हमला कर उसे कब्जाने की योजना बनायीं तो भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने भी इसका मुंहतोड़ जवाब देने का पक्का इरादा बना लिया था।
अयूब खान को लगता था कि एक धोती-कुर्ता पहनने वाला छोटा सा हिन्दू कैसे पाकिस्तान के सूट-बूट पहनने वाले जनरल से मुकाबला कर सकता है। इसलिए लाल बहादुर शास्त्री ने एक बार भारतीय सैनिकों को संबोधित करते हुए कहा था, "ये पाकिस्तानी सोचते है कि हिन्दू तो लड़ ही नहीं सकता। हालाँकि हम बार-बार कहते है कि हिंदुस्तान तो और भी कौमों का वतन है, वो तो समझते है कि हिंदुस्तान तो हिन्दुओं का देश है और हिन्दू लड़ ही नहीं सकते। उनका ख्याल है कि हिन्दू केवल धर्म, कर्म, पूजा, पाठ इत्यादि में ही लगे रहते है।खासतौर पर वो धोती वालों को बिलकुल लड़ने के काबिल नहीं समझते।
बहरहाल, आप में से कोई धोती पहनता नहीं, किन्तु मैं तो धोती पहनता ही हूँ। पर मुझे यह नहीं मालूम कि ज्यादा जोरदार फैसले मैंने धोती पहन कर लिए या प्रेसिडेंट अयूब ने पैंट पहनकर।" अंत में नतीजा सबके सामने था। धोती पहनने वाले के नेतृत्व में न सिर्फ भारत ने युद्ध जीता बल्कि पाकिस्तान में सूटबूट वाले अयूब के जीवन का हर दिन मुश्किल कर दिया। इसलिए युद्ध विराम के बाद जब दोनों देशों के सर्वोच्च नेता ताशकंद में मिले तो अयूब ने शास्त्री जी से हाथ मिलाने के लिए भी मना कर दिया था। दरअसल अयूब को यह डर सताता था कि अगर वे शास्त्री से हाथ मिलायेंगे तो पाकिस्तान लौटने पर उन्हें बहुत नकारात्मक प्रतिक्रिया झेलनी पड़ेगी।
यह भी पढ़ें: Lal Bahadur Shastri Jayanti 2022: अपनी सादगी के लिए हमेशा याद किए जाएंगे लाल बहादुर शास्त्री
ताशकंद में अयूब और शास्त्री जी की भेंट
यह किस्सा 4 जनवरी 1966 को लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान की ताशकंद में मुलाकात से एक दिन पहले का है। दरअसल, दोनों राष्ट्राध्यक्षों की यह भेंट भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद पहली बार हो रही थी। युद्ध के बाद शांति की इस पहल की मेजबानी सोवियत संघ के राष्ट्रपति एलेक्सी कोसिजिन कर रहे थे। जब कोसिजिन की अयूब से मुलाकात हुई तो अयूब ने लाल बहादुर शास्त्री पर कुछ आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कोसिजिन से कहा कि वे शास्त्री से हाथ नहीं मिलायेंगे।
इस पर कोसिजिन ने नाराजगी व्यक्त करते हुए अयूब से कहा कि आपने शांति वार्तालाप के लिए ताशकंद आने का निमंत्रण स्वीकार किया था और आप यह मत भूलिए शास्त्री भी एक देश की सरकार के मुखिया है। यह वाकया लगता तो साधारण है लेकिन इसके मायने कई प्रकार से बेहद महत्वपूर्ण है। क्योंकि अयूब खान, जंग हार चुके एक देश का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। वे अपने देश की जनता का भरोसा पहले ही खो चुके थे और अब ताशकंद में वे कुछ ऐसा कमाल करना चाहते थे कि जिससे मनोवैज्ञानिक रूप से ही सही, कुछ समय के लिए उन्हें जनता के बीच जाने का मौका मिल सके। अतः उन्होंने सोचा कि अगर वे विश्वभर की मीडिया और नेताओं के सामने शास्त्री से हाथ नहीं मिलायेंगे तो पाकिस्तानी जनता उन्हें कुछ सम्मान जरुर दे देगी।
पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी लेखक हसन अब्बास अपनी पुस्तक 'पाकिस्तान ड्रिफ्ट इंटू एक्सट्रीमिज्म : अल्लाह, द आर्मी एंड अमेरिकाज वॉर ऑन टेरर' में लिखते है, "1965 के युद्ध ने अयूब को सदमे में पहुंचा दिया था." अब्बास आगे लिखते है कि दिसंबर 1967 में पूर्वी पाकिस्तान में अयूब पर एक जानलेवा हमला किया गया लेकिन स्थानीय मीडिया में उसे ज्यादा खबर नहीं बनने दिया।
1965 के युद्ध से पड़ी बांग्लादेश की बुनियाद
अयूब के सामने एक के बाद एक विपरीत हालात पैदा होते चले गए और वे अपना स्वयं का विश्वास एवं विश्वासपात्र सहयोगी दोनों लगभग खो चुके थे। पश्चिमी पाकिस्तान में तो उनका विरोध हो ही रहा था लेकिन पूर्वी पाकिस्तान ने उन्हें अपना नेता ही मानने से इनकार कर दिया। पूर्वी पाकिस्तान के सबसे लोकप्रिय नेता शेख मुजीबुर्रहमान इस मौके का फायदा पूर्वी पाकिस्तान की स्वायत्तता की मांग उठाने में करने लगे।
प्रधानमंत्री शास्त्री की प्रतिबद्धता और संकल्प ने अयूब के शासन को बुरी तरह से विफल बना दिया था। इस कमजोरी से पूर्वी पाकिस्तान की बंगाली जनता मुखर हो गयी। पूरे पूर्वी पाकिस्तान में पश्चिमी पाकिस्तान के विरोध में दंगें भड़क उठे। इसका असर अयूब पर व्यक्तिगत रूप से भी पड़ा और इन बदलती परिस्थियों में उन्हें इस्तीफा तक देना पड़ गया। यही नहीं, इसी दौरान उन्हें दिल का दौरा एवं लकवा जैसे जानलेवा बिमारियों ने घेर लिया और वे हमेशा के लिए व्हीलचेयर पर आ गए।
अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) की एक गुप्त सूचना में भी यह कहा गया था कि पूरे पाकिस्तान में अव्यवस्था फैली हुई है। हर दिन सरकारी इमारतों, सरकारी अधिकारियों और सरकार का पक्ष लेने वाले समाचार-पत्रों पर हमले सामान्य घटनाएं हो गयी थीं। इसी कारण सरकार को ढाका सहित देश के अन्य कई शहरों में कर्फ्यू लगाना पड़ा है।
पाकिस्तान के अमेरिका में राजदूत रह चुके, हुसैन हक्कानी अपनी पुस्तक 'पाकिस्तान : बिट्विन मॉस्क एंड मिलिट्री' में लिखते है, "भारत से 1965 के युद्ध से अनेक परिणाम सामने आये जो कि सभी पाकिस्तान के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण थे। पहला, इस युद्ध ने पाकिस्तानियों के बीच गैर-अमेरिकी भावना को पैदा कर दिया क्योंकि पाकिस्तान का सहयोगी होने के बावजूद अमेरिका ने उसकी सहायता नहीं की। दूसरा, इस युद्ध ने पाकिस्तानी सेना को इस्लामिक विचारधारा के बेहद नजदीक लाकर खड़ा कर दिया। अब जिहाद के नारों से नागरिकों और सैनिकों का मनोबल बढाया जाने लगा था।
तीसरा, इस युद्ध ने पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान के बीच दूरियाँ बढ़ने लगी। पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों को अब यह आभास हो गया कि अयूब खान की सैन्य रणनीति उन्हें सुरक्षा प्रदान करने में एकदम असमर्थ है।"
हक्कानी ने 1965 के युद्ध के अपने इस विश्लेषण में कहीं भी लाल बहादुर शास्त्री का जिक्र नहीं किया है। हालाँकि, इसकी भरपाई भारत के अमेरिका में राजदूत एवं विदेश मंत्री रह चुके एमसी छागला ने अपनी आत्मकथा 'रोजेज इन दिसम्बर' में यह लिखते हुए की है, "जब युद्ध समाप्त हुआ तो वे (शास्त्री) बहुत तेजी से विख्यात हो चुके थे - लगभग लोगों के एक आदर्श के रूप में।" हालाँकि, यह भारत का दुर्भाग्य था कि जिस लाल बहादुर शास्त्री ने पाकिस्तान के इस विभाजन की पृष्ठभूमि लिखी, वे स्वयं इसे देखने के लिए जीवित नहीं रहे।
यह भी पढ़ें: क्या लाल बहादुर शास्त्री की हत्या विदेशी एजेंसियों ने करवाई थी?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
-
जीत के बाद भी टीम इंडिया से वापस ली जाएगी T20 World Cup की ट्रॉफी? सामने आई बड़ी वजह, फैंस हैरान -
Gold Rate Today: जंग के बीच भारत में लगातार सस्ता हो रहा सोना, इतना गिरा भाव, अब क्या है 22k, 18K गोल्ड का रेट -
Love Story: IFS की ट्रेनिंग के दौरान हिंदू लड़की को दिल दे बैठे थे Hardeep Puri, शादी लिए मिली थी धमकी -
Kim Yo Jong Profile: किम जोंग उन की ‘सबसे ताकतवर बहन’ कौन? ईरान जंग के बीच अमेरिका को खुली धमकी, दुनिया अलर्ट -
US-Iran-Israel War: 11 मार्च तक पूरी तरह खत्म हो जाएगा Iran? US का मास्टर प्लान तैयार, कहा- आज सबसे भयंकर हमले -
Essential Commodities Act: क्या है ECA? ईरान-इजराइल तनाव के बीच भारत में क्यों हुआ लागू -
महीका शर्मा की वजह से पंड्या ब्रदर्स के बीच आई दरार? अचानक बिखरा परिवार! चुप्पी ने मचाया शोर -
Gold Silver Rate: सोना ₹8797 सस्ता, चांदी में बंपर गिरावट,₹29,729 सस्ती, आज कितने में मिला है रहा गोल्ड-सिल्वर -
Budh Nakshatra Parivartan 2026: बुध का हुआ नक्षत्र परिवर्तन, इन 3 राशियों पर गिर सकती है गाज, संभलकर रहें -
जीत के जश्न में भारी बवाल! Kirti Azad ने भारतीय टीम की हरकत को बताया शर्मनाक, ईशान किशन ने दिया तगड़ा जवाब -
आज का तुला राशिफल 10 मार्च 2026: व्यस्तता भरा रहेगा दिन, दिल से रहेंगे खुश लेकिन हो सकता है खर्चा -
Ladli Behna Yojana: इस दिन खातों में आएंगे 1500 रुपये, CM मोहन यादव करेंगे ट्रांसफर, जानिए तारीख












Click it and Unblock the Notifications