Artificial Intelligence: इंसानों के लिए कितनी खतरनाक है आर्टिफिशिएल इंटेलिजेंस?
हमारे जीवन में आर्टिफिशिएल इंटेलिजेन्स (एआई) का दखल बढ़ता ही जा रहा है। ऐसे में विशेषज्ञों ने आगाह करना शुरू कर दिया है कि जब एआई पूरी तरह एडवांस हो जायेगी तो यह सम्पूर्ण मानव जाति को नष्ट कर सकती है।

Artificial Intelligence: पिछले कुछ सालों से हम मशीनों पर कुछ ज्यादा ही निर्भर होते जा रहे हैं। हमारे इस जुनून ने कुछ नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं। हर क्षेत्र में मशीनों की बढ़ती घुसपैठ आगे चल कर कहीं हमारे अस्तित्व को ही तो संकट में तो नहीं डाल देगी? इस आशंका ने विश्व भर के सामाजिक और आध्यात्मिक चिंतकों को सोचने पर विवश कर दिया है।
आरंभ से ही मनुष्य की अधिकतर गतिविधियां ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं हासिल करते हुए, अपना जीवन आसान बनाने पर केन्द्रित रही हैं। इसके लिए उसने एक से बढ़कर एक साधनों की खोज की है। लेकिन, 21वीं सदी में आते-आते उसकी यह सनक बहुत बढ़ गई है। अब वह मशीनों में कृत्रिम बुद्धि डालकर अपना विकल्प बनाने में जुटा है। दस साल पहले तक उसका उद्देश्य ऐसी मशीनों का निर्माण था, जो उन कामों को करती थीं, जिन्हें मनुष्य न कर सकता हो। लेकिन, अब नाटकीय रूप से उसका फोकस ऐसी मशीनें विकसित करने पर एकाग्र हो चुका है, जो हर वह काम कर सकती हैं, जिन्हें अभी तक सिर्फ मनुष्य ही कर सकता था। खासकर ऐसे काम, जिनको करने के लिए विचार और विवेक की जरूरत पड़ती है।
मानव की जगह मशीनों पर आश्रित लोग
इंसान और मशीनों का रिश्ता सैकड़ों साल पुराना है। इंसान मशीनें बनाता है और मशीनें इंसान के काम आती हैं। लेकिन जब इंसान मशीनों को इंसान बनाने लगे और खुद मशीन में बदलता जाए तो किस तरह की स्थिति उत्पन्न होगी, आसानी से कल्पना की जा सकती है।
मानव समाज की संरचना कुछ इस तरह की है कि विभिन्न कार्यों और आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हमें एक-दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है। हमारे द्वारा निर्मित मशीनें धीरे-धीरे हमारी इस परस्पर निर्भरता को खत्म कर रहीं हैं। लेकिन, साथ ही साथ हमें अपना आदी भी बनाती जा रही हैं।
पिछले साल के आखिर में सामने आए चैट जीपीटी का उदाहरण हमारे सामने है। दो महीने में अपने यूजर्स की संख्या सौ गुना बढ़ा लेने वाले इस एआई प्रोग्राम ने काफी चर्चा पाई है। यह हमारे लिए वह सब कुछ कर रहा है, जिसके लिए हमें दिमाग, विचारशीलता और रचनात्मकता का इस्तेमाल करना पड़े। कविता लिखने से प्रपोजल बनाने तक, शोध-पत्र तैयार करने से होमवर्क करने तक, मनोरंजन से मार्गदर्शन तक... आप कुछ भी कहिए, चैट जीपीटी आपके लिए कर देगा। इससे मुकाबले के लिए गूगल भी अपना एआई चैटबॉट बार्ड लॉन्च कर चुका है। चैट जीपीटी बनाने वाली ओपेन एआई का डॉल-ई 2 प्रोग्राम आपके दिए टेक्स्ट कमांड के हिसाब से चित्र बनाकर दे सकता है।
वहीं गूगल का म्यूजिक एलएम आपके टेक्स्ट को संगीत में बदल देता है। इनसे भी और एक कदम आगे डीप मोशन व सिंथेसिया जैसे प्रोग्राम हैं। पहला, जहां आपके वीडियो को 3डी एनिमेशन में बदल देता है, वहीं दूसरा आपके टाइप किए हुए टेक्स्ट को वीडियो कंटेंट बनाकर पेश करता है। ऐसे छोटे-बड़े कई एआई प्रोग्राम हैं, जो हमारी समस्याओं के समाधान या कार्यों के संपादन के लिए हमें सोचने या दिमाग पर जोर डालने की जहमत से बचा रहे हैं।
आज बाजार में ऐसे-ऐसे एआई युक्त रोबोट आ चुके हैं, जो ऑफिस में फाइलें भी निपटा सकते हैं, बॉस बनकर आपको निर्देशित भी कर सकते हैं। वकील की तरह अदालतों में केस भी लड़ सकते हैं, जज बनकर फैसले भी सुना सकते हैं। आर्किटेक्ट बनकर एक बिल्डिंग का डिजाइन भी बना सकते हैं और श्रमिक बनकर बिल्डिंग भी। खिलाड़ी की तरह मैच भी खेल सकते हैं और अम्पायर की तरह निगरानी भी कर सकते हैं। ज्योतिषी की तरह आपके लिए उपयुक्त जीवनसाथी भी सुझा सकते हैं और आपके जीवनसाथी भी बन सकते हैं... यह सूची लगातार लंबी होती जा रही है।
इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि आने वाले दिनों में एआई हमारे परस्पर रिश्तों के ताने-बाने को भी प्रभावित कर सकती है। इस संदर्भ में 2013 में प्रदर्शित स्पाइक जोंज की फिल्म 'हर' का उल्लेख अप्रासंगिक न होगा, जिसका नायक अपनी मदद के लिए बनाए सामंथा नाम के कम्प्यूटर प्रोग्राम से ही प्रेम करने लगता है।
खतरे में हैं करोड़ों नौकरियां
ग्लोबल मैनेजमेंट कन्सल्टेंसी फर्म मैकिंसे एंड कंपनी का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक एआई और ऑटोमेशन करीब चालीस से अस्सी करोड़ नौकरियां खा जाएंगे। और करीब 37.5 करोड़ लोगों को अपने लिए दूसरा काम खोजना होगा।
यूके की ट्रांस ह्यूमैन पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारी और लंदन फ्यूचरिस्ट के अध्यक्ष डेविड वुड का दावा है कि वर्ष 2050 तक एआई की मदद से रोबोट हर वह काम कर सकेंगे, जो अभी सिर्फ मनुष्य ही कर पा रहा है।
सवाल यह है कि अगर सारे काम एआई ही करेगी तो फिर इंसान क्या करेगा? जिन्हें यह लगता है कि इन मशीनों का संचालन तो इंसान ही करेगा, वे वास्तविकता से अनभिज्ञ हैं। उन्हें नहीं समझ आ रहा कि जो एआई आपके लिए फैसले कर सकता है, वह अपने लिए फैसले क्यों नहीं ले सकता? आपको अपने विकल्प के रूप में एआई की जरूरत हो सकती है, लेकिन एआई को विकल्प के रूप में मनुष्यों की जरूरत नहीं है।
अगला लक्ष्य एजीआई
एआई से भी बढ़कर है एजीआई, अर्थात आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस। अभी यह एआई फील्ड के लिए आगे का सपना है। इसका लक्ष्य ऐसी मशीनें बनाना है, जो सभी मामलों में इंसानों से बेहतर परफॉर्म करेंगी। अभी भी कुछ मामलों में तो यह स्थिति आ ही चुकी है। एआई रिसर्चरों को विश्वास है कि अगले कुछ दशकों में यह सभी क्षेत्रों में हो जाएगा जब मशीनें हम से ज्यादा जीनियस साबित होने लगेंगी।
एक्सपर्ट वर्तमान में मौजूद एआई की तुलना ऐसे बच्चे से करते हैं, जो अभी हमसे सीख रहा है । उनका तर्क है कि जिस तरह अधिकतर बच्चे बड़े होकर अपने माता-पिता, शिक्षकों से ज्यादा बुद्धिमान एवं ज्ञानी बन जाते हैं, वैसा ही एआई के साथ भी होगा।
अभी तक हमने टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल अपने भविष्य को बेहतर बनाने के लिए किया है। लेकिन दिनों-दिन शक्तिशाली होती जा रही एआई एक ऐसी टेक्नोलॉजी है, जो खुद ही हमारा भविष्य बनने जा रही है। इसका अंजाम क्या होगा, यह अभी कल्पना से परे है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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