Kisan Andolan: कृषि प्रधान देश को किसान राजनीति से समस्या क्यों है?
Kisan Andolan: किसान आंदोलन को लेकर अब सियासत शुरू हो गई है। किसान अपनी मांगों को लेकर दिल्ली आ रहे हैं यह सुनते ही सबसे पहले कांग्रेस पार्टी आंदोलन को लपकने के लिए दौड़ पड़ी है।
कांग्रेस कह रही है कि अगर वह सत्ता में आती है तो न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी का कानून बना देगी। सत्ता पक्ष जवाब दे रहा है कि जब कांग्रेस शासन में थी तब स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट क्यों नहीं लागू की। यानी कि लगातार कम हो रही आय से परेशान किसान अपनी मांगों को लेकर सड़क पर हैं और पार्टियां अपने-अपने हिसाब से अपनी राजनीति चमका रही हैं।

सरसरी निगाह से देखें तो किसान आंदोलन और किसान राजनीति भारत में कभी भी स्थाई भाव या दीर्घ राजनीति का विषय नहीं बना है, या जानबूझकर बनाया नहीं गया है। लेकिन भावनात्मक राजनीति में किसान शब्द का बहुत उपयोग हुआ है, जैसे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की राजनीति की सफल शुरुआत 1920 में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में उनके द्वारा आयोजित किसान मार्च से मानी जाती है।
यह किसान मार्च नेहरू के राजनैतिक कैरियर के लिए मील का पत्थर ही साबित हुआ। इसके बावजूद नेहरू हमेशा औद्योगिक, वैज्ञानिक और वैश्विक राजनीति के लिए काम करते ही नजर आए। उनके समर्थक और विरोधी भी उनकी औद्योगिकीकरण की नीति के ही आसपास घूमते रहते हैं।
नेहरू के बाद आए शास्त्री जी से लोगों को उम्मीदें तो थीं, लेकिन सिवाय 'जय किसान' नारे यानी भावनात्मक अपीलों के वे भी कुछ खास कर नहीं पाए, क्योंकि काम करने के लिए उनको समय ही नहीं मिला। तो इसी तरह से देश के हर प्रधानमंत्री से घूमते हुए हम वर्तमान प्रधानमंत्री तक आ जाते हैं, लेकिन सिवाय भावनात्मक मुद्दों के कुछ मिलता नहीं दिखता है। किसानों की आय दोगुनी होने या बढ़ाने की वायदे तो हो रहे हैं, लेकिन जिस अस्थिरता के साथ लागतों का उतार-चढ़ाव होता है, उससे आय की वृद्धि कैसे कितनी होगी, इसका स्पष्ट खाका कभी बनता नहीं दिखता है।
जहां तक किसान की पहचान की बात है तो इसमें हर धर्म, हर जाति, हर वर्ग के लोग शामिल है। इसमें सवर्ण, पिछड़ों की विशाल संख्या के साथ ही दलित मानी जाने वाली जातियों की भी अच्छी उपस्थिति है, साथ ही मुस्लिम, सिख यानी दूसरे समुदायों का प्रतिनिधित्व भी अच्छा है। यानी किसान एक तरह से अपने आप में जाति, धर्म और भाषा जैसे भेद को पीछे छोड़ते हुए एक संपूर्ण पहचान रखने का माद्दा रखता है। लेकिन फिर भी आज तक किसान पहचान की राजनीति कभी दूसरे पायदान तक भी नहीं पहुंची। जब कभी किसान ने अपनी जायज मांगों को लेकर मुखर होने की कोशिश की, भावनात्मक तंतुओं की आड़ लेकर हर बार राजनीति ही की गई।
दो साल पहले न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग को लेकर किसानों ने लंबे समय तक दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन किया था। किसान इसी आश्वासन पर वापस लौटे थे कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी का कानून जल्दी ही बना देगी। इसके लिए समिति भी गठित की गई मगर कानून का प्रारूप अधर में ही लटक रहा।
आंदोलन के दौरान जिन किसानों की मृत्यु हुई थी उनके परिजनों को मुआवजा और उनके परिवार से किसी एक व्यक्ति को नौकरी देने का आश्वासन भी सरकार की ओर से दिया गया था। आंदोलन के दौरान जिन किसानों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए थे सरकार ने उन्हें भी वापस लेने का वादा किया था मगर इनमें से एक भी वादा पूरा नहीं हो सका।
यह ठीक है कि सरकारी फैसलों में थोड़ा वक्त लगता है, उसके विभिन्न पहलुओं पर विचार करना पड़ता है, मगर इतना भी वक्त नहीं लगता जितना किसानों के मामले में लग रहा है। अगर सरकार ईमानदारी से किसानों से किए गए वादे को पूरा करने की राह में आ रही अड़चनों के बारे में स्पष्ट राय रखती तो शायद यह आंदोलन दोबारा उभरने की स्थिति ही नहीं खड़ी होती?
लेकिन सरकार ने न केवल चुप्पी साधे रखी बल्कि अब जबकि किसान दिल्ली के लिए निकल पड़े तो उन्हें चुप कराने की, किसी भी कीमत पर राजधानी में दाखिल नहीं होने देने की कोशिश करती देखी जा रही है। यहां सवाल यह भी खड़ा होता है कि खुद को लोकतांत्रिक कहने वाली कोई सरकार क्या सड़कों पर कील कांटे और दीवार लगाकर किसी आंदोलन को कुचलने का प्रयास कर सकती है?
तो जब किसानों की समस्याओं के लिए किसी भी राजनैतिक दल से कोई समर्थन वास्तविक रूप यानी नीतिगत रूप से मिलता नहीं दिखता है, तब किसानों या यों कहें कृषि से जुड़ी विशाल आबादी के अंदर एक छटपटाहट तो होगी है। दूसरी बात आज सूचना क्रांति और पूंजी के प्रवाह ने जानकारी और आवागमन को इतना आसान कर दिया है कि किसान आसानी के साथ एक दूसरे संवाद स्थापित कर ले रहे हैं। और किसान नाम की पहचान पर इकट्ठा खड़े हो रहे हैं। यह तो अच्छा शगुन है क्योंकि तमाम वाद की राजनीति से किसानवाद की राजनीति अधिक भली होगी।
वैसे भी अगर किसान की पहचान पर कोई राजनैतिक एकता संभव होती है तो किसान राजनीति वर्तमान सभी राजनैतिक व्यवस्था से अलग बनेगी, क्योंकि किसान विशुद्ध आर्थिक और सामाजिक चिंतन है। इसे ऐसे देखिए कि भारत की विशाल आबादी के पास काम नहीं है, और भारत में सबसे अधिक प्रसार वाला कोई उद्यम अगर है, तो कृषि ही है। किसानी को लाभप्रद बनाते ही तीन सबसे बड़ी समस्याएं सुलझ जाएंगी। पहली, गांव में ही लोगों को काम मिलने लगेगा; दूसरी, काम मिलने के साथ ही पलायन बंद होगा और इसी के साथ तीसरी समस्या शहरों पर दबाव कम हो जाएगा।
कुल मिलाकर किसान पहचान पर अगर कोई राजनीति खड़ी होती है तो कृषि प्रधान भारत के लिए शुभ ही कहा जाएगा, लेकिन दुर्भाग्य है कि कृषि प्रधान देश भारत में किसान हमेशा एक भावुक शब्द की तरह ही इस्तेमाल हुआ है। आजादी के बाद से ही सभी राजनीतिक दलों ने अपने घोषणा पत्रों में किसानों की बात तो की है लेकिन काम निकालने के बाद उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं दिखता।
आज जब एक बार फिर किसान अपनी समस्याओं को लेकर दिल्ली की ओर बढ़ रहे हैं तो तमाम राजनीतिक दलों की गिद्ध दृष्टि उन पर है, लेकिन जो राजनीतिक दल इसका सियासी फायदा उठाने का प्रयास करते देखे जा रहे हैं वह किसानों के कितने हमदर्द हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। उनके पुराने कामकाज के तरीके और फैसले भी इसकी गवाही देते हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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