Kharif Crops: मानसून की खेती का सिमट गया दायरा
Kharif Crops: कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक इस साल मानसून से मौसम में बोई गई फसलों का कुल रकबा लगभग 3.5 प्रतिशत घटकर 1073.22 लाख हेक्टेयर रह गया है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह रकबा 1079.64 लाख हेक्टेयर का था। हालांकि बाजरे की अधिक बुवाई के कारण मोटे अनाजों के तहत बुआई का क्षेत्रफल लगभग 40% बढ़कर 182.51 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया है।
गन्ने के रकबे में भी थोड़ी बढ़ोतरी होकर 59.78 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है, लेकिन खरीफ की मुख्य फसल धान का रकबा नीचे गिरकर 380.75 लाख हेक्टेयर पर है जबकि सभी दालों का रकबा संयुक्त रूप से पिछले साल के 131 लाख हेक्टेयर से नीचे गिरकर कल 119 लाख हेक्टेयर तक आ गया है। तिलहनों का रकबा 3.3 प्रतिशत गिरकर 190.21 हेक्टर पर आ गया है। पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष तुअर दाल, मूंग दाल, उड़द दाल, मूंगफली और सोयाबीन के बुवाई क्षेत्रफल में भी कमी दर्ज की गई है।

अरहर दाल का रकबा पिछले वर्ष 45.27 लाख हेक्टेयर था, चालू वर्ष में यह गिरकर 42.66 लाख हेक्टेयर पर आ गया है। इसी तरह उड़द का रकवा भी 36.65 से घटकर 31.68 लाख हेक्टेयर तथा मूंग का रकबा 33.57 से घटकर 30.98 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया है। मोटे अनाजों में ज्वार, बाजरा, रागी, स्माल मिलेट, मक्का का रकबा पिछले साल की तुलना में थोड़ा बढ़ा है।
वर्ष 2022 में श्री अन्न एवं मोटे अनाज की कुल बुवाई 179.3 लाख हेक्टेयर हुई थी, जबकि कृषि एवं किसान कल्याण विभाग द्वारा 1 सितंबर 2023 तक खरीफ फसलों के तहत बुवाई के कुल रकबे की दी गई जानकारी के मुताबिक वर्ष 2023 में मोटे अनाजों के बुआई के क्षेत्रफल का आंकड़ा बढ़कर 181.06 लाख हेक्टेयर हो गया है।
देश में बड़े पैमाने पर खाद्य तेल का आयात किया जाता है। सरकार तिलहन फसलों को बढ़ावा देने के लिए कई तरह की योजनाएं विभिन्न विभागों के साथ मिलकर प्रारंभ की है। सरकार के प्रयास के बावजूद तिलहन बुवाई का रकबा पिछले साल की तुलना में बढ़ने की बजाय घट गया है। वर्ष 2022 में मूंगफली की बुवाई 45 लाख हेक्टेयर में हुई थी जो वर्ष 2023 में घटकर 43.37 लाख हेक्टेयर ही हो पाई है।
इसी तरह सोयाबीन 127.3 लाख हेक्टेयर से घटकर 123.91 लाख हेक्टेयर, सूरजमुखी 2 लाख हेक्टेयर से घटकर 0.69 लाख हेक्टेयर, तिल 12.80 लाख हेक्टेयर से घटकर 11.53 लाख हेक्टेयर, अरंडी 8.63 लाख हेक्टेयर से घटकर 7.26 लाख हेक्टेयर रह गया है। खरीफ की मुख्य फसल मानी जाने वाली जूट एवं कपास के बुवाई क्षेत्र में भी भारी कमी दर्ज की गई है।
शुरुआत में तेज झटके के साथ मूसलाधार बारिश और फिर मानसून की मनमानी के कारण देश के कई राज्यों में कहीं जल प्लावन तो कहीं अतिशय सूखे के हालात बने रहे। इसीलिए मानसून के मौसम में होने वाली बारिश की कमी के कारण मानसून की खेती (खरीफ की फसलों) की बुवाई में पिछले साल की तुलना में अत्यधिक गिरावट दर्ज की गई है। इस बार मानसून की बारिश मुख्य रूप से गुजरात, राजस्थान, तमिलनाडु और पूर्व के कुछ हिस्सों में ही हुई है।
हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को निकाल दें तो देश के अन्य हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति ही है। चूंकि खरीफ की खेती मुख्य रूप से मानसून की बारिश पर ही निर्भर होती है, इसलिए बरसात के असंतुलित होने के कारण फसलों की बुवाई से लेकर अंतिम उत्पादन तक पर नकारात्मक असर देखा जा रहा है। महाराष्ट्र में मानसूनी बरसात कम होने के कारण कपास की खेती पर गंभीर असर पड़ा है। कपास का रकबा पिछले साल के मुकाबले 125.70 लाख हेक्टेयर से घटकर 107.01 लाख हेक्टेयर पर आ गया है। बुवाई के क्षेत्रफल में लगभग 15 प्रतिशत गिरावट होने के कारण कपास उत्पादकों में निराशा फैली हुई है। जूट के रकबे में भी 12% से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है।
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश में 1 सितंबर 2023 तक 1077.56 लाख हेक्टेयर में खरीफ फसलों की बुवाई हो चुकी है जो पिछले साल के मुकाबले लगभग सवा 6 लाख हेक्टेयर कम है। हालांकि पिछले साल मानसून कुछ देरी से आया था। वर्ष 2021 से तुलना करें तो चालू मौसम में लगभग 19 प्रतिशत क्षेत्र में बुवाई घटी है। सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में कर्नाटक, तेलंगाना, महाराष्ट्र और पंजाब है।
गांव में एक कहावत कही जाती है कि "आगे खेती आगे आगे/ पीछे खेती भागे-जोगे"। अर्थात जो समय से खेती करता है उसका भरोसा होता है लेकिन जो खेती पिछड़ जाती है वह भाग्य भरोसे ही रहती है। हुआ तो हुआ, न हुआ तो न हुआ। हमारे देश में खरीफ फसलों की बुवाई आमतौर पर जून के आखिरी पखवाड़े से लेकर जुलाई के पहले पखवाड़े तक पूरी कर ली जाती है। अबकी बार अनियमित बरसात के कारण धान की रोपाई समय पर नहीं हो पाई। खरीफ की बुवाई का रकबा मुख्य रूप से धान, दलहन की बुवाई में कमी के कारण घटा है।
भारत चावल उत्पादन के क्षेत्र में दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। अभी पिछले महीने ही सरकार ने बासमती के अपने सबसे बड़े चावल निर्यात श्रेणी को रोकने का आदेश दिया है। सरकार के इस फैसले के बाद चावल निर्यात की खेप लगभग आधी हो सकती है। अनुमान लगाया जा रहा है कि पिछले साल के मुकाबले इस बार धान की फसल ज्यादा कीमत पर बाजार में बिकेगी। यही कारण है कि अभी से महंगाई के बढ़ाने की आशंका डराने लगी है।
हालांकि सरकार सभी फसलों की उत्पादकता बढ़ाने पर जोर दे रही है और इसके लिए किसानों को तकनीकी सहायता और महत्वपूर्ण इनपुट के साथ-साथ एचआईवी बी मिनीकिट भी उपलब्ध कराए हैं। लेकिन मौसम की बेरुखी के कारण खरीफ फसलों के रकबे में आई कमी देश के खाद्य उत्पादन के लिए आशंकित करने वाली है।
सरकार कुछ कम उत्पादन होने पर भी किसानों की आय में पर्याप्त वृद्धि की बात कह रही है। संभव है कम उत्पादन पर भी कुछ किसानों को अधिक मूल्य प्राप्त हो जाए, लेकिन बारिश के अभाव में जिन क्षेत्रों के किसानों की बुवाई समय पर नहीं हो पाई है, पानी के अभाव में जिनकी खेती उजड़ सी गई है, उनके कंठ रूंधे हुए हैं।
पूर्वांचल के 10 से 12 जिले पूरी तरह से सूखे की चपेट में आ गए हैं। यह इलाके खेती के लिए हमेशा से उर्वर माने जाते रहे हैं। सात अनाजा, 12 अनाजा की खेती के लिए मशहूर इन क्षेत्रों में हमेशा से खरीफ की बुवाई शत प्रतिशत होती रही है। लेकिन अब की मौसम की बेरुखी के कारण इन क्षेत्रों में भी खरीफ फसलों की बुआई का रकबा कम हुआ है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












Click it and Unblock the Notifications