Muslim Reservation: कर्नाटक में पूरी हुई पसमांदा मुसलमानों की पुरानी मांग
कर्नाटक सरकार ने विशेष रूप से सिर्फ मुसलमानों के नाम पर दिये जाने वाले 4 प्रतिशत आरक्षण को अन्य आरक्षित कैटेगरी में शिफ्ट कर दिया है।

Muslim Reservation: पिछले दिनों कर्नाटक सरकार ने कर्नाटक स्टेट कमीशन फॉर बैकवर्ड क्लास की अनुशंसा पर ओबीसी आरक्षण के अंतर्गत केवल मुस्लिमों के लिए (Exclusively Muslim Reservation) आवंटित कैटेगरी 2B (4%) को समाप्त कर इसमें आने वाले मुस्लिमो को ईडब्ल्यूएस (10%) में शिफ्ट कर दिया। और 2B के 4% को दो बराबर भागों में विभाजित कर ओबीसी की अन्य कैटेगरी 3A (अब 2C) और 3B (अब 2D) को दे दिया।
इस खबर को लेकर अधिकतर मीडिया (अंग्रेजी-हिन्दी) ने यह हेडिंग बनाई कि "मुस्लिम आरक्षण समाप्त हो गया है" जिससे समाज में यह गलत सूचना गई कि सारे मुस्लिमों का आरक्षण समाप्त हो गया है। जबकि सामाजिक न्याय के आरक्षण के लिए योग्य मुस्लिमों की अधिकतर पसमांदा जातियों को ओबीसी की कैटिगरी 1 (4%), 2A (15%) और एसटी (7%) में रखा गया है, जो यथावत बरकरार भी है। यानी पसमांदा जातियों को पहले की तरह ओबीसी के 19% और एसटी के 7% आरक्षण का लाभ मिलता रहेगा। सरकार ने सिर्फ 4% वाले 2B (Exclusively Muslim Reservation) को समाप्त किया है जिसका लाभ अब तक सशक्त शासक वर्गीय अशराफ मुसलमान उठा रहे थे। यह संविधान और सामाजिक न्याय संगत नहीं था।
मजहबी पहचान के नाम पर आरक्षण संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है। कोई भी मजहब पिछड़ा दलित नहीं है। उसके मानने वालो में पिछड़ा दलित हैं जिन्हें आरक्षण में समाहित किया गया है। (एससी आरक्षण को छोड़ कर इसमें ईसाई और मुस्लिम धर्म के दलित अभी भी बाहर हैं)
मुस्लिम विमर्श की राजनीति करने वाली मुस्लिम सांप्रदायिक राजनैतिक पार्टी एआईएमआईएम के प्रमुख ओवैसी और मुस्लिम मजहबी सांप्रदायिक संगठन जमीयतुल उलेमा ने इसे सांप्रदायिक मुद्दा बना माहौल गरमाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा। जमीयतुल उलेमा ने विधिवत प्रेस रिलीज जारी कर यह भ्रम फैलाते हुए कि 2B में मुसलमानों की 12 पिछड़ी जातियां भी हैं, इस फैसले को कोर्ट में चुनौती देने की बात तक कह दी।
ज्ञात रहे कि कर्नाटक ओबीसी आरक्षण की जातियों की लिस्ट में अन्य कैटेगरी में तो जातियों के नाम दर्ज हैं लेकिन 2B में सिर्फ मुस्लिम लिखा हुआ है किसी जाति विशेष या जातियों के नाम एवं संख्या वर्णित नहीं हैं। यह भी एक विडम्बना है कि 2B कैटिगरी के लिए बनने वाले कास्ट सार्टिफिकेट में कास्ट का नाम मुस्लिम लिखा रहता है जो कि ठीक नहीं है क्योंकि मुस्लिम एक धार्मिक पहचान है ना कि जातीय पहचान। ऐसा प्रतीत होता है कि शासक वर्गीय अशराफ ने पूर्ववर्ती सरकारों और बुद्धिजीवियों को गुमराह कर अपना स्वार्थ साधने के लिए ओबीसी आरक्षण में यह चोर दरवाजा खुलवाया था।
मुख्यधारा की इंग्लिश हिंदी मीडिया और ओवैसी, मदनी के इस रवैये से देशज पसमांदा समाज में भी भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई कि कर्नाटक सरकार ने वंचित पसमांदा का भी आरक्षण खत्म कर दिया है।
जहां तक पसमांदा जातियों के आरक्षण की बात है तो अधिकतर पसमांदा जातियां जैसे नट, नेटुआ, जोगी, कंजड़, भांट, कसाई, कलाल, मदारी, सिकलगर, बेलदार, छप्परबंद, नीरशिकार, मंसूरी, दुदेकला, नद्दाफ आदि पहले की तरह ओबीसी की कैटेगरी 1 में हैं। धोबी, हज्जाम, दर्जी, लोहार, गद्दी, रंगरेज, जुलोही(बुनकर), तेली आदि कैटेगरी 2A में हैं। तथा सिद्दी, तड़वी भील, टोडा आदि जनजाति को एसटी में यथावत रहने दिया गया है। यदि "केवल मुस्लिम" आरक्षण की कैटेगरी 2B में आने वाली मुस्लिमों की जातियों की सूची होती तो स्थिति स्पष्ट हो जाती।
यदि हम यह मान भी लें कि 2B में कुछ पसमांदा जातियां भी थी तो फिर भी यह अनुचित था क्योंकि कमज़ोर पिछड़ी जातियां मजबूत शासक वर्गीय अशराफ जातियों से एक ही कैटेगरी में मुकाबला नहीं कर सकती थीं। इससे आरक्षण योजना का उद्देश्य बाधित हो रहा था। विदित होता है कि ओबीसी के कैटेगरी 2B आरक्षण का सारा लाभ मुसलमान नाम पर सैयद, पठान लोग (अशराफ) ही उठा रहे थे जो कि आरक्षण की मूल भावना के विपरीत था। ऐसे में यह उचित प्रतीत होता है कि सरकार, बैकवर्ड कमीशन और सामाजिक कार्यकर्ता ओबीसी आरक्षण में शामिल होने से छूट चुकी उन पसमांदा जातियों की पहचान कर उनको ओबीसी आरक्षण की उपयुक्त श्रेणियों में समाहित करने का प्रयास करें।
पसमांदा आंदोलन का यह स्पष्ट मानना रहा है कि देशज पसमांदा समाज का उत्थान उसकी सामाजिक शैक्षिक एवं आर्थिक स्थिति के अनुरूप हो ना कि उसकी मजहबी पहचान "मुस्लिम" के आधार पर। इसीलिए पसमांदा आंदोलन की यह बहुत पुरानी मांग रही है कि अनुच्छेद 341 के पैरा 3 को हटाकर पसमांदा दलितों को भी एससी आरक्षण में सम्मिलित किया जाय। दक्षिण भारत के प्रमुख राज्यों यथा कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल के ओबीसी आरक्षण से शासक वर्गीय सशक्त अशराफ जातियों को बाहर निकाला जाय ताकि मुस्लिम समाज में सामाजिक न्याय में अवरोध न उत्पन्न हो और मुस्लिमों की योग्य जातियों को ही इसका लाभ मिल सके।
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कर्नाटक सरकार की मंशा चाहे जो रही हो, पसमांदा आंदोलन की यह एक पुरानी मांग पूरी हुई जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। कर्नाटक की तरह ही केरल और तमिलनाडु में भी ओबीसी आरक्षण से सशक्त शासक वर्गीय अशराफ जातियों को बाहर कर ओबीसी आरक्षण का बिहार मॉडल अपनाना अधिक उचित होगा। ताकि वंचित देशज पसमांदा मुसलमानों को पूर्णतः सामाजिक न्याय मिल सके और शासक वर्गीय विदेशी अशराफ द्वारा आरक्षण का अनुचित लाभ लेना बंद हो सके।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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