Jawaharlal Nehru: धार्मिकता से दूर रहे लोकतांत्रिक नेहरु

जवाहरलाल नेहरू की पुण्यतिथि पर यह जानना चाहिए कि भारत में लोकतंत्र की सफलता में उनका कितना बड़ा योगदान रहा।

Jawaharlal Nehru death anniversary Democratic Nehru stayed away from religiousness

Jawaharlal Nehru: जवाहरलाल नेहरू से किसी विदेशी पत्रकार ने उनके जीवन और कार्यकाल के आखिरी दिनों में एक साक्षात्कार में पूछा था कि 'आप अपने कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानते हैं?' नेहरू का जवाब था 'एक धार्मिक मानसिकता वाले देश में एक धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के निर्माण की दिशा में कोशिश करना।'

जिन लोगों को आज इस बात की शिकायत है कि जवाहरलाल नेहरु ने सत्ता हस्तांतरण में मिले राजदंड को संसद में क्यों स्थापित नहीं किया, उनकी शिकायत का समाधान नेहरु के इस एक वाक्य से हो सकता है। नेहरु भारत या भारत के लोगों को वैसे नहीं देखते थे जैसा उनसे उम्मीद की जाती है। नेहरु वैज्ञानिक सोच वाले देश का निर्माण करना चाहते थे। वो नहीं चाहते थे कि पाकिस्तान की तरह भारत भी किसी धर्म विशेष वाले राज्य के रूप में अपनी पहचान कायम करे। वो समाजवाद से बहुत प्रभावित थे और देश के आर्थिक विकास का ढांचा उसी समाजवादी मॉडल पर स्थापित करना चाहते थे जिसमें धर्म उन्हें गैर जरूरी तत्व नजर आता था।

मोतीलाल नेहरू और स्वरूपरानी के घर 14 नवंबर 1889 को जन्में जवाहरलाल नेहरू मुंह में सोने का चम्मच लेकर पैदा हुए थे। उनके पिता मोतीलाल नेहरू ने वकालत में खूब पैसा और प्रतिष्ठा अर्जित की थी। अकूत संपत्ति और धनार्जन के साथ राजसी ठाठ बाट, अभिजात्य दावतें, पश्चिमी रहन सहन और अंग्रेजियत मोतीलाल नेहरू के जीवन के शुरूआत की यथार्थ थी और इस कारण जवाहरलाल नेहरू को बचपन से विशेष देखभाल, लाड़ प्यार के साथ नौकर चाकर, रईसी, गाड़ी और आनंद भवन जैसे महलरूपी घर में मौजूद नाना प्रकार की सुख सुविधाएं बचपन से उपलब्ध थीं। हां, जवाहरलाल की मां स्वरूपरानी धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं, इसलिए हिंदू संस्कारों का जो भी परिचय उन्हें हुआ वो अपनी मां के कारण ही हुआ।

लेकिन जवाहर जल्द ही पढ़ाई करने लंदन चले गये। वो बैरिस्टर मोतीलाल के इकलौते पुत्र थे इसलिए उन्हें संसार में सबसे बढ़िया जो भी था वो मिल रहा था। शिक्षा भी लंदन से इसलिए दिलवाई गयी क्योंकि उस दौर में उसकी प्रतिष्ठा थी। 1912 में लंदन से कानून की विधिवत् वकालत की परीक्षा पास की और बैरिस्टर एट लॉ की डिग्री के साथ इलाहबाद लौट आए। हालांकि लौटकर आने के बाद जवाहरलाल के साथ सबकुछ वैसा नहीं हुआ जैसा उनके पिता मोतीलाल चाहते थे। पिता की अकूत संपत्ति के इकलौते वारिस, विदेश में शिक्षा और वकालत की डिग्री होने के बाद भी जवाहरलाल ने वकालत में पैसा कमाने का मोह छोड़कर महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतत्रंता आंदोलन में शामिल होने का निर्णय लिया।

1920 में महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन में युवा जवाहरलाल को गांधी ने यूनाइटेड प्रोविन्स की कमान सौंपी। सविनय अवज्ञा आंदोलन ने जवाहरलाल के जीवन की दिशा ही बदल दी। इस दौरान उन्होंने खूब यात्राएं की। पैदल, रेल से, बैलगाड़ी और साइकिल से गांवों का चप्पा चप्पा छाना। वो देश की असल तस्वीर पहली बार देख रहे थे, जिसमें गरीबी थी। अकूत सम्पत्ति के मालिक होने के बाद भी जवाहरलाल नेहरू ने ख़ुद क़ो देश की मिट्टी में मिलाने और देश के स्वतंत्रता आंदोलन क़े सेनानी के रूप में संपूर्ण रूप से भाग लेने का निर्णय लिया।

नेहरू की बुद्धिमत्ता और देश की जनता में स्वीकार्यता के कारण ही बीसवी सदी में गांधी के बाद यदि किसी एक हिन्दुस्तानी नेता की इस देश की जनता में चुबंकीय आकर्षण वाली लोकप्रियता रही तो वह शख्स जवाहरलाल नेहरू थे। देश की आजादी बंटवारें के साथ मिली थी। दो सौ वर्षो में अंग्रेजों ने इस देश के आर्थिक संसाधनों को निचोड़ लिया था। नेहरू को टूटा हुआ, बंटा हुआ, दीमक की तरह खाया हुआ, खोखला किया हुआ और सांप्रदायिक हिंसा की आग में धधकता देश मिला था। देश में न उद्योग थे और न कृषि। भुखमरी से मरते गरीब थे तो दंगों में जल रहा समाज था। एक कंगाल देश अधूरी आजादी के साथ विंखडित और हतप्रभ लाखों लाशों के श्मशान में खड़ा था।

देश के बंटवारें के बाद की सांप्रदायिक स्थिति भयावह थी। पाकिस्तान से आए हुए शरणार्थियों का पुर्नवास एक चुनौती थी। भंयकर सामाजिक आर्थिक विषमता सामने थी। इन सबके साथ ही नेहरू के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक सार्थक लोकतंत्र की बहाली और उसे गतिशील बनाने की थी।

वह नेहरू ही थे, जिन्होंने एक वैज्ञानिक सोच से युक्त समाज निर्माण के लिए प्रेरक तत्व की भूमिका निभाई और लोकतांत्रिक संस्थाओं को गरिमा देना और उन्हे सशक्त बनाने के लिए अपना पूरा सहयोग दिया। आज हम विश्व में जिस गरिमा से खड़े हैं, उसकी जड़ें जवाहरलाल के समय से जुड़ी हैं।

गांधी के साथ आजादी के आंदोलन में हिस्सा लेने वाले अधिकतर नेता इस बात को मानते थे कि इस देश की बहुलता, अखंडता, उदारवादी और लोकतांत्रिक मूल्य और परंपरा के साथ वैज्ञानिक चेतना का सम्मिश्रण अगर कोई नेता कर सकता है तो वह जवाहरलाल नेहरू ही हो सकते हैं। जब नेहरु प्रधानमंत्री बने तो अपने आप को इन्हीं कसौटियों पर कसने की कोशिश करते रहे।

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      लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने के लिए नेहरू ने पहले आम चुनाव की कमान देश के पहले निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन को सौंपकर निष्पक्ष और निर्भीक चुनाव करवाने के लिए जिस तरह हरसंभव मदद दी, वह जवाहरलाल नेहरू की लोकतंत्र में आस्था को दर्शाता है। नेहरू की लोकतांत्रिक व्यवस्था में गहरी आस्था और विश्वास होने के कारण ही नेहरू के नेतृत्व में भारत में तीन निर्विघ्न लोकसभा चुनाव हुए और दर्जनों विधानसभाओं के चुनाव भी। उस ज़माने में नेहरू के विरोधियों ने भी किसी भी स्तर पर उन चुनावों को भेदभावजनक क़रार नहीं दिया।

      इसी तरह उच्च शिक्षा में समर्पित कई संस्थाओं के निर्माण का श्रेय नेहरू को जाता है। उन्होंने एम्स, आई आई टी, आई आई एम, और एनआईटी की स्थापना की। शिक्षा के प्रसार के लिए प्रत्येक भारतीय बच्चे के लिए निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान रखा। हिन्दुस्तान की मौजूदा पीढ़ी जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, उदारवाद, विदेश में अपनी सफलता और भारत की नव अर्जित वैश्विक स्थिति के साथ भारत में लोकतंत्र और यहां की संस्कृति की विविधता को मजबूत और समृद्ध होने का गौरवगान करती है तो उसे इसमें नेहरू के दिए गए योगदान को भी याद करना चाहिए।

      प्रधानमंत्री के रूप में 15 साल पूरा करते करते मानों वो थक गये थे। जवाहरलाल नेहरू का स्वास्थ 1962 के बाद लगातार गिरता गया। 1963 में उन्होंने कुछ माह कश्मीर में स्वास्थ लाभ के लिए बिताए थे, लेकिन स्वास्थ्य में गिरावट लगातार जारी थी। 26 मई 1964 को देहरादूर से लौटकर वह नई दिल्ली आये थे। रात साढे ग्यारह बजे सोने गए। 27 मई को सुबह छह बजे उनकी पीठ में तेज दर्द हुआ। डाक्टरों से बात करते करते नेहरू बेहोश हुए तो फिर कभी न उठ सके।

      लोकसभा में उनकी मृत्यु की घोषणा उसी दिन 27 मई हुई। अगले दिन उनके पार्थिव शरीर को तिरंगे में लपेटकर गांधीजी की समाधि के पास लाया गया, जहां रघुपति राघव राजा राम के गायन के बीच लाखों लोगों ने उन्हें श्रंद्धाजलि दी और देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पार्थिव शरीर को अग्नि के हवाले कर दिया गया।

      (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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