सूचना के अमरीकी साम्राज्यवाद पर जयशंकर की चोट

बीसवीं सदी के आखिरी दिनों तक तीसरी दुनिया के कई देशों में जारी उपनिवेशवाद ने सिर्फ उन देशों के संसाधनों की लूट ही नहीं की, बल्कि वहां के निवासियों के मानस को बदलने की भी कोशिश की। इसका जरिया बना शिक्षा का पश्चिमी मॉडल और उसके जरिए आया सूचना का साम्राज्यवाद। सूचना के इस साम्राज्यवादी सोच का शिकार तीसरी दुनिया के देशों के आम नागरिक ही नहीं, राजनेता भी होते रहे हैं।

Jaishankar questions Western media arrogance

भारत सहित अन्य विकासशील देशों के राजनेताओं की यूरोप और अमरीका यात्रा के दौरान जिस तरह का रवैया वहां का मीडिया अख्तियार करता रहा है, वह कम से मीडिया की तटस्थता के मानकों पर खरा नहीं उतरता है। तीसरी दुनिया के देश, उनके नागरिक और उनके शासक अक्सर इस साम्राज्यवादी सोच के निशाने में रहते रहे हैं। चूंकि पश्चिमी विकसित मुल्कों की अर्थव्यवस्था बहुत मजबूत है, इसलिए तीसरी दुनिया के देशों के राजनेता सूचना की साम्राज्यवादी सोच का प्रतिकार करने से बचते रहे हैं।

लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। अपनी अमेरिकी यात्रा के दौरान भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जिस तरह पश्चिमी मीडिया विशेषकर न्यूयॉर्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट को खरी-खरी सुनाई है, वह संभवत: अपनी तरह का पहला मामला है।

यूरोप की डेमोक्रेसी और सेकुलरिज्म

उपनिवेशवाद के सहारे अमेरिका की अगुआई वाले पश्चिमी देशों की ओर से दुनिया को दो प्रमुख चीजें मिलीं। इसे विश्व का एक हिस्सा पश्चिमी सभ्यता का उपहार मानता रहा है। पहला है डेमोक्रेसी और दूसरा सेकुलरिज्म। यहां इस पर चर्चा बेकार है कि उनकी लोकतांत्रिक धारा और सेकुलरिज्म की सोच एशिया और दूसरी सभ्यताओं के मूल्यों के हिसाब से कितनी खरी है?

पश्चिमी सेकुलरिज्म के अवधारणा की बुनियाद में मार्क्सवादी दर्शन का वह प्रमुख विचार है जिसके अनुसार धर्म अफीम हैं। सेकुलरिज्म के नाम पर इसी को स्थापित किया गया है। पश्चिमी दुनिया बाइबिल हाथ में लेकर सेकुलरिज्म की बात करती है। लेकिन यही पश्चिमी विचारधारा जब भारतीय संदर्भों की व्याख्या करती है तो हिंदू और हिंदुत्व की चर्चा सेकुलरिज्म के लिए खतरा नजर आने लगती है। रामायण और महाभारत जैसे नीतिपरक और वेद जैसे ज्ञानपरक ग्रंथों में पश्चिम के विचारक सेकुलरवाद से दुश्मनी के अंश तलाशने लगते हैं। पश्चिम की यह सोच उनकी मीडिया के प्रमुख संस्थानों में भी दिखती है। यही वजह है कि उन्हें भारतीय समाज अब भी पिछड़ा ही नजर आता है।

पश्चिमी मीडिया की दृष्टि में भारत

पश्चिमी मीडिया की दृष्टि में भारत की व्यवस्था और तंत्र हमेशा उपहास का पात्र रहा है। उसके लिए भारत के आतंकवादियों और अलगाववादियों के मानवाधिकार महत्त्वपूर्ण होते हैं। कश्मीर घाटी में आतंकियों के हाथों होने वाली हत्याएं पश्चिमी मीडिया की चिंता का विषय नहीं होतीं, बल्कि वहां सुरक्षा बलों की उपस्थिति बड़ा मुद्दा होती हैं।
अतीत में पश्चिमी मीडिया के ऐसे दृष्टिकोण को लेकर शायद ही कभी तीसरी दुनिया के देशों या उनके राजनेताओं ने सवाल उठाए हों। लेकिन अपनी ताजा वाशिंगटन यात्रा के दौरान भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पश्चिमी मीडिया के इस 'पूर्वाग्रही' रूख पर सवाल उठाने से हिचक नहीं दिखाई।

अमेरिकी मीडिया पर जयशंकर के सवाल

भारतीय समुदाय के साथ चर्चा के दौरान एस जयशंकर ने पूर्वाग्रह से ग्रस्त खबर देने के लिए 'द वाशिंगटन पोस्ट' समेत कई प्रमुख अमेरिकी मीडिया घरानों को आड़े हाथों लिया। इस दौरान जयशंकर ने जो कहा, उस पर गौर किया जाना चाहिए। उन्होंने, "मैं मीडिया में आने वाली खबरों को देखता हूं। कुछ समचार पत्र हैं, जिनके बार में आपको अच्छी तरह पता होता है कि वे क्या लिखने वाले हैं और ऐसा ही एक समाचार पत्र यहां भी है।" उनका इशारा 'वाशिंगटन पोस्ट' की तरफ था जो वाशिंगटन डीसी में प्रकाशित होने वाला राष्ट्रीय दैनिक अखबार है और इसके मालिक "अमेजन" के जेफ बेजोस हैं।

सूचना के साम्राज्यवाद की ताकत कहें या पश्चिमी ताकतों के प्रति हमारा दैन्यभाव कि पश्चिमी मीडिया में बनी छवि पर ही भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश भरोसा करते रहे हैं। तीसरी दुनिया को दबाने की पश्चिमी मानसिकता का दर्शन अतीत में पश्चिमी ताकतवर मुल्कों के राजनेताओं की प्रेस कांफ्रेंस और तीसरी दुनिया के देशों के दौरे पर भी दिखता रहा है। 2001 में प्रधानमंत्री वाजपेयी की अमेरिका यात्रा के दौरान भारतीय पत्रकारों ने कुछ ज्यादा सवाल पूछ दिए तो अमेरिकी पत्रकारों ने इसे गंवारपन बताने में देर नहीं लगाई थी।

पश्चिमी देशों में तीसरी दुनिया के राजनेताओं के दौरे पश्चिमी देशों के मीडिया के लिए महत्वहीन खबर होती रही है। इसके बावजूद भारत समेत तीसरी दुनिया के देश पश्चिमी मीडिया का ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश करते रहे हैं। लेकिन जयशंकर के ताजा बयान से स्पष्ट है कि भारत अब बदल रहा है और उसकी राजनीति भी बदल रही है। यही वजह है कि न्यूयॉर्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट पर टिप्पणी की जा रही है।

अपने आप को भारत का संरक्षक न समझे पश्चिमी मीडिया

अब भारत के जयशंकर जैसे राजनेता को इस बात की परवाह नहीं है कि पश्चिम का कथित अंतरराष्ट्रीय मीडिया उसके बयानों को किस अंदाज में लेगा। जयशंकर ने कहा है कि "मेरा यह कहना है कि कुछ लोग पूर्वाग्रही हैं। निर्णय तय करने की कोशिश करते हैं। लेकिन जैसे-जैसे भारत अपने फैसले खुद करना शुरू करेगा, इस तरह के लोग जो अपने को संरक्षक की भूमिका में देखते हैं, उनके विचार बाहर आएंगे।" जयशंकर तंज करने से भी नहीं चूके। उन्होंने यहां तक कह दिया कि इन समूहों (पश्चिमी मीडिया की) नजर में "भारत की जीत नहीं हो रही है।"

जयशंकर की इस टिप्पणी के बाद साफ है कि सूचना का साम्राज्यवाद और पश्चिमी मीडिया का अतिवादी और आग्रही रूख ज्यादा चलने वाला नहीं है। भले ही पश्चिम की नजरों में भारत अब भी तीसरी दुनिया वाली हैसियत रखता हो, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं।

भारत विश्व की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। सॉफ्टवेयर क्रांति का अगुआ है, उसके पास विश्व का सबसे बड़ा मध्यवर्ग है, जो ना सिर्फ आर्थिक तौर पर दुनिया को प्रभावित करता है, बल्कि राजनीतिक तौर पर भी कर रहा है। संसारभर में फैले भारत के पेशेवरों की बढ़ती साख भी भारत को नया आत्मविश्वास दे रही है। ऐसे में अब या तो पश्चिमी मीडिया को अपना रूख बदलना होगा या फिर उनके कथित संरक्षक की कथित भूमिका को भारत जैसे देश नकार देगें।एस जयशंकर के बयान ने इसकी शुरूआत कर दी है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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