भारत में इस्लाम: गुर्जर-प्रतिहार एवं चालुक्य सम्राटों का प्रतिरोध
आरसी मजुमदार अपनी पुस्तक 'प्राचीन भारत' में मोहम्मद बिन कासिम के सिंध अभियान का विश्लेषण करते हुए लिखते है, "इस प्रकार भारत में अरब प्रभुत्व की शुरुआत हुई। आश्चर्य इस बात पर होता है कि विजयी सेनाएं केवल सिंध से ही संतुष्ट क्यों रही और भारत के भीतरी भागों में वे सेनाएं क्यों नहीं घुसी। वे संसार के विजेता भारत के द्वार पर ही रुक गए और उन्होंने जो कुछ भी जीता उसे भी अपने कब्जे में न रख सके।"

राजा दाहिर के बाद, उनके बेटे जय ने कासिम की मौत के बाद सिंध के एक बड़े हिस्से पर फिर से अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। उसे कश्मीर के महाराजा का भी सहयोग मिलने लगा था। यूरोपियन इतिहासकार एच एम इलियट एवं जॉन डौसन ने अपनी पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया' में चचनामा के आधार पर बताया है कि जय को कश्मीर के महाराजा ने सहायता के लिए 50 घुड़सवार सैनिक भेज थे।
जय ने उमय्यदों के कई युद्धक अभियानों का बहादुरी से सामना किया। 717 से 720 के बीच उमर द्वितीय खलीफा बना, उसने एक बड़ी सेना के स्थान पर छोटे-छोटे हमले करने शुरू कर दिए। जिसके खिलाफ जय ने कई बार सफलता हासिल की। मगर इन लगातार हमलों ने जय और उसके सहयोगियों को एकदम थका दिया था और कुछ इतिहासकार कहते हैं कि थक हारकर जय ने इस्लाम स्वीकार कर लिया था।
लेकिन इस्लाम स्वीकार करना जय की एक सामरिक नीति अधिक नजर आती है क्योंकि इससे सिंध में कुछ समय के लिए शांति स्थापित हो गयी। 724 से 743 के बीच हिशाम जब उमय्यद वंश का दसवां खलीफा बना तो उसने जुनैद को सिंध का गवर्नर नियुक्त किया। मौका देखकर जय ने जुनैद के खिलाफ हमला बोल दिया। हालाँकि, इस संघर्ष में जय को हार का सामना करना पड़ा और उसे बंदी बना लिया गया।
जुनैद ने इस सफलता के बाद, भारत के अन्य इलाकों जैसे जैसलमेर, मंडोर (जोधपुर) और भरूच तक हमले करने शुरू कर दिए। बैजनाथ पुरी अपनी पुस्तक 'द हिस्ट्री ऑफ़ गुर्जर-प्रतिहार' में लिखते है कि "तत्कालीन गुर्जर-प्रतिहार सम्राट नागभट्ट प्रथम ने उसे बुरी तरह से खदेड़ दिया था।" यह हमले उमय्यद खलीफाओं के लिए बहुत घातक सिद्ध हुए। ग्वालियर में उत्खनन में मिले प्रशस्ति पत्रों में कहा गया है कि "मलेच्छ शासक की विशाल सेनाओं को चूर करने वाला वह मानों नारायणस्वरूप लोगों की रक्षा करने के लिए उपस्थित हुआ था।"
दुर्गा प्रसाद दीक्षित की पुस्तक 'पोलिटिकल हिस्ट्री ऑफ़ द चालुक्य ऑफ़ बादामी' के अनुसार चालुक्य सम्राटों का भी उमय्यद सेनाओं के साथ कई बार संघर्ष हुआ। विक्रमादित्य द्वितीय 731 में इस वंश के प्रभावशाली सम्राट बने। इनके कालखंड में 738 में भारत की उत्तरी-पश्चिमी सीमा पर नवसारी में उमय्यद खलीफाओं और उनकी सेना के बीच जबरदस्त युद्ध हुआ। चालुक्यों की तरफ से इस युद्ध का नेतृत्व अवनिजनाश्रय पुलिकेशन ने किया और उमय्यदों को बुरी तरह से पराजित कर दिया। उसकी इस अभूतपूर्व सफलता के लिए सम्राट विक्रमादित्य ने उसे पृथ्वीबल्लभ नाम से सम्मानित किया। 'द एज ऑफ़ इंपीरियल कन्नौज' पुस्तक में आरसी मजूमदार लिखते है कि इस हार के बाद अरबों ने गुजरात पर पुनः हमला करने की हिम्मत नहीं की।
इसलिए नौवीं शताब्दी का पर्शियन इतिहासकार अल-बालाधुरी अपनी पुस्तक 'किताब फ़ुतुह अल-बुलदान' में लिखता है, "उमय्यद वंश में जुनैद के बाद सत्ता तमीम ने संभाली और उसने हिन्द से मुस्लिम सेना को वापस बुला लिया और कभी वापस मुड़कर हिन्द की तरफ नहीं देखा।"
इस बीच 713 में कश्मीर के कार्कोट साम्राज्य पर भी उमय्यदों ने हमला करने का प्रयास किया। उस वक्त, महाराजा चंद्रपीड ने राज्य का कार्यभार सँभाला हुआ था। उन्होंने चीनी नरेश के पास दूत भेजकर इस हमले के खिलाफ सहायता माँगी। यद्यपि चीन से सहायता नहीं प्राप्त हो सकी लेकिन महाराजा चंद्रपीड ने कश्मीर पर होने वाले इन हमलों से अपने राज्य को सुरक्षित रखा।
उधर 750 में दमिश्क में एक और इस्लामिक विद्रोह हुआ और उमय्यद की जगह खिलाफत अब्बासियों के पास आ गयी। अब इस्लाम का केंद्र बगदाद हो गया। इस प्रकार इस्लाम के दो बड़े वंश - पहले रशीदुन खलीफा जिन्होंने भारत की तरफ हमला करने से पहले कई बार सोचा और फिर उमय्यद खलीफाओं ने कई प्रयास किये लेकिन हर बार असफलता ही हाथ लगी। इतना जरुर था कि अभी उमय्यदों का सिंध पर आंशिक कब्जा था लेकिन वह भी पूरी तरह से उनके वर्चस्व से लगभग बाहर ही था। वैसे भी कुछ ही वर्षों बाद सिंध भी इन खलीफाओं के चंगुल से बाहर आकर स्वतंत्र हो गया था। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि उमय्यद वंश के शासकों ने दुनिया के एक बड़े हिस्सें को कब्ज़ा कर लिया लेकिन उनके पूर्ववर्ती खलीफाओं की भांति भारत उनकी पहुँच से एकदम बाहर था।
इस कालखंड पर बहुत सी पुस्तकें लिखी गयी लेकिन इतिहासकारों द्वारा अरबों के विरुद्ध भारतीय सम्राटों की इन महान विजयों को खास महत्व नहीं दिया गया। बस इस सन्दर्भ में मात्र उल्लेख ही मिलते है। इसके पीछे का एकमात्र कारण जो समझ आता है वह इस कालखंड विशेषकर इन युद्धों के अधिकारिक दस्तावेजों और अभिलेखों की खोज नहीं की गयी है। वहीं इस्लामिक इतिहासकारों ने भी भारत को जीतने के इस्लाम के प्रयासों की विफलता पर कुछ लिखने से परहेज किया है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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