क्या उत्तर प्रदेश हो रहा है विपक्ष विहीन?
क्या उत्तर प्रदेश की राजनीति विपक्ष विहीन होने की राह पर है? क्या विपक्ष के लिए उत्तर प्रदेश में भाजपा को टक्कर देना कठिन होता जा रहा है? उत्तर प्रदेश में विपक्ष का प्रदर्शन देखकर ऐसे स्वाभाविक सवाल इस समय लखनऊ के राजनीतिक गलियारों में उठ रहे हैं।

दरअसल, 5 जनवरी 1887 में जब यूपी में विधान परिषद का गठन हुआ था उसके 135 साल बाद यूपी का उच्च सदन कांग्रेस विहीन हो गया है। 7 फरवरी 1909 को मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस के पहले सदस्य के रूप में विधान परिषद की सदस्यता ली थी। तब से लेकर 6 जुलाई 2022 तक कांग्रेस की उपस्थिति विधान परिषद में लगातार बनी रही। लेकिन दीपक सिंह का कार्यकाल समाप्त होते ही यूपी में कांग्रेस के अवसान का एक और चरण पूरा हो गया। कांग्रेस एक सदी से ज्यादा समय तक यूपी विधान परिषद में प्रतिनिधित्व करने वाली एकमात्र पार्टी थी। यूपी में अब कांग्रेस पार्टी के नाम पर अध्यक्षविहीन संगठन, आपसी कलह में उलझे नेता, दो विधायक एवं एक सांसद रह गये हैं।
दूसरी तरफ, रामपुर एवं आजमगढ़ अनुकूल जातीय एवं धार्मिक समीकरण की वजह से समाजवादी पार्टी का गढ़ माना जाता था। लोकसभा उपचुनाव में भाजपा ने सपा के इन दोनों मजबूत गढ़ों को ढहाकर विपक्ष विहीन राजनीति के संकेत दिये हैं क्योंकि इस समय भाजपा की जीत से ज्यादा चर्चे सपा की हार के हैं। अखिलेश यादव के नेतृत्व में पार्टी ने सीटों के उस न्यूनतम स्तर को छू लिया है, जिसकी कल्पना उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुलायम सिंह यादव के सक्रिय रहते संभव नहीं थी। लोकसभा में सपा की सीटें पांच से घटकर तीन रह गई हैं, और सवाल उठने लगे हैं कि क्या 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को विपक्ष की तरफ से वॉकओवर मिलने जा रहा है?
ऐसे सवाल इसलिये भी उठ रहे हैं कि बसपा की राजनीति ट्वीटर तक सिमटी दिख रही है, कांग्रेस यूपी में उहापोह में नजर आ रही है और मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी की सियासत लगातार हिचकोले खा रही है। यूपी में भाजपा से लगातार चार चुनाव की हार के बाद विपक्ष निष्क्रिय हो चला है। सड़क से लेकर सदन तक विपक्ष हताश और निराश दिख रहा है। भाजपा नेतृत्व ने विधानसभा चुनाव जीतने के साथ ही अपने कैडर को 2024 के लिये सक्रिय कर दिया है। कई कार्यक्रमों के जरिये कार्यकर्ता जनता के बीच जाकर उनसे लगातार संपर्क कर रहे हैं। सरकार की उपलब्धियां बता रहे हैं। दूसरी ओर विपक्ष के कार्यकर्ता अपने अपने दल का सांगठनिक ढांचा दुरुस्त होने का इंतजार कर रहे हैं।
आंकड़ों के लिहाज से तीनों प्रमुख विपक्षी दल उत्तर प्रदेश में अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं और भविष्य को लेकर भी इनमें कोई उत्साह नजर नहीं आ रहा है। कोई मजबूत योजना या रणनीति नहीं दिख रही है, जिसमें भाजपा की राजनीतिक व्यूह रचना को ध्वस्त करने की ललक हो। पूरा विपक्ष हाशिये की ओर है। लोकतंत्र के लिहाज से इस संकेत को बहुत उत्साहजनक नहीं कहा जा सकता है।
मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी विधानसभा चुनाव में छोटे दलों के साथ मिलकर 125 सीटें जीती थी, लेकिन चार महीने के भीतर ही इस गठबंधन की गांठें खुलने लगी हैं। महान दल के अध्यक्ष केशवदेव मौर्य ने खुद को गठबंधन से अलग कर लिया है और सुभासपा के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर के बयान रोज-रोज नये संकेत दे रहे हैं। अपना दल (कमेरावादी) की विधायक पल्लवी पटेल भी नाराज हैं।
अखिलेश के नेतृत्व को लेकर पार्टी के भीतर और सहयोगी दलों में अनिश्चय की स्थिति है। अखिलेश की चुनावी गंभीरता को लेकर अक्सर सवाल खड़े हो रहे हैं। भाजपा ने उपचुनाव में पूरी ताकत झोंकी, उसके विपरीत अखिलेश यादव चुनाव प्रचार से दूर केवल ट्वीटर पर ही सक्रिय रहे। सपा का कार्यकर्ता समझ नहीं पा रहा है कि अखिलेश यादव राजनीति को लेकर गंभीर हैं या फिर किसी दबाव में पार्टी की जिम्मेदारी ओढ़ रखी है।
उपचुनाव में हार के बाद अखिलेश यादव ने प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल को छोड़कर समूची ईकाई भंग कर दी है। ऐसा इसलिये कि लोकसभा में सीटों की संख्या उस स्तर तक जा पहुंची है, जहां तक सोचा नहीं जा सकता था। अक्टूबर 1992 में गठन के बाद 1996 में लोकसभा के अपने पहले चुनाव में समाजवादी पार्टी ने यूपी में 16 सीटें जीती थीं। 1998 में 20, 1999 में 26, 2004 में 35, 2009 में 23 तथा 2014 में 5 सीटों पर जीत मिली थी। लेकिन अब 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद सपा अपने न्यूनतम 3 लोकसभा सांसदों के साथ राजनीति के मैदान में खड़ी है।
दरअसल, मोदी-योगी की सियासी आंधी में सपा का थिंक टैंक ऐसे मुद्दों की पहचान नहीं कर पा रहा है, जिसको आगे बढ़ाकर भाजपा सरकारों को घेरा जा सके। वैचारिक स्तर पर भी समाजवादी पार्टी की नई पीढ़ी नये विचारों एवं नवाचारों से विरक्त नजर आ रही है। समूचा विपक्ष भाजपा द्वारा तय किये गये मुद्दों पर ही लड़ाई लड़ रहा है।
राज्य में सपा से भी खराब स्थिति बसपा की हो गयी है। विधानसभा में एक सीट तक सिमटी बसपा ने अपनी राजनीति को ट्वीटर तक समेट लिया है। तमाम दिग्गज नेताओं को पार्टी से निकालने के बाद बसपा की राजनीति अवसान की ओर है। विधानसभा के बाद विधान परिषद में भी बसपा का मात्र एक सदस्य शेष है।
सड़क की राजनीति से हमेशा दूर रही बसपा ने अब कैडर की सियासत से भी दूरी बना ली है। दलित वर्ग खासकर जाटव वर्ग के सामने विकल्पहीनता की स्थिति है। बीते विधानसभा चुनाव में इस वर्ग का वोटर बसपा से छिटका है। आगे बसपा का भविष्य क्या है, इसको लेकर भी अनिश्चय बना हुआ है। मायावती की सक्रियता भी अब कम हो गई है। शुरुआती दौर से जुड़े कई पिछड़े एवं दलित दिग्गजों के निष्कासन के बाद पार्टी कमजोर ही हुई है। उस पर इस विधानसभा चुनाव में उसका दलित ब्राह्मण गठजोड़ वाला फार्मुला भी फेल हो गया जिसके कारण सतीश चंद्र मिश्रा व अन्य अगड़े नेताओं को भी बसपा ने पिछली कुर्सियों पर बिठा दिया है।
इसी तरह की स्थिति कांग्रेस की है। उत्तर प्रदेश में संगठन अध्यक्षविहीन है। विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने 15 मार्च को इस्तीफा दे दिया था, तब से प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी खाली है। प्रियंका वाड्रा के पास उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी आने के बाद कांग्रेस चुनावी राजनीति में लगातार हाशिये पर जा रही है। राजनीतिक प्रयोगों से पार्टी की सेहत बिगड़ चुकी है। अमेठी जैसा गढ़ हारने के बाद भी कांग्रेस के पास कोई सबक नहीं है। हो हल्ला और मीडिया अटेंशन की राजनीति ने कांग्रेस से आमजन के भरोसे को कम किया है।
जाहिर है, जिस तरह से उत्तर प्रदेश में विपक्षी दल सड़क से दूर होकर सोशल मीडिया तक सिमट गये हैं और भाजपा की बिसात पर अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं, उस स्थिति में 2024 के आम चुनाव में भी भाजपा के अश्वमेध अभियान को रोकना असंभव ही दिख रहा है।
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(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)
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