Nihang Sikhs : नागा सन्यासियों की तरह क्या निहंग सिखों के भी नि:शस्त्रीकरण की जरूरत है?
जो निगंह लोगों को निर्भय करते थे, अब भयभीत करने लगे हैं। बीते कुछ सालों में निहंग सिखों द्वारा क्रूर तरीके से की गयी हत्या की खबरें आ चुकी हैं। ऐसे में क्या निहंग सिखों को हथियार रखने पर रोक लगा देनी चाहिए?

Nihang Sikhs : 8 फरवरी को चंडीगढ में पुलिस और सिख प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़प हुई। इसमें निहंग सिख भी शामिल हुए और उन्होंने सीधे पुलिस पर हमला बोला। पुलिस वालों पर निहंग सिखों ने न सिर्फ तलवारों और बरछों से हमला किया बल्कि उनके ऊपर घोड़े दौड़ा दिये। इस हिंसक उपद्रव की सोशल मीडिया पर जमकर चर्चा भी हुई और आलोचना भी। इसके पहले भी सिख निहंग कई बार अपने शस्त्रों के साथ हिंसक झड़प और शक्ति प्रदर्शन करते रहे हैं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या निहंग सिखों के निशस्त्रीकरण का समय आ गया है?
यह सवाल इसलिए भी कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में किसी समुदाय विशेष को सिर्फ इसलिए शस्त्र रखने की कानूनी अनुमति नहीं जा सकती क्योंकि उसकी मान्यताओं में ऐसा कहा जाता है। तब तो बिल्कुल भी नहीं जब वो उस शस्त्र का इस्तेमाल हत्या करने या फिर हिंसक प्रदर्शन करने के लिए करते हों।
सिख निहंगों द्वारा हथियारों के दुरुपयोग का पहला बड़ा मामला किसान आंदोलन के दौरान दिल्ली बार्डर पर दिखा था जब उन्होंने बेअदबी के नाम पर एक व्यक्ति की क्रूरता और निर्ममता से हत्या कर दी थी। अक्टूबर 2021 में सिंधू बार्डर पर निहंग सिखों ने एक दलित लखबीर सिंह की इस आरोप में हत्या कर दी थी कि उसने गुरुग्रंथ साहब की बेअदबी कर दी थी। इसी कारण उसके हाथ पैर काट दिये गये और मारकर टांग दिया गया। यह इतनी क्रूर और बर्बर घटना थी कि पूरा देश दहल गया था। संयुक्त किसान मोर्चा ने न केवल इस घटना की निंदा की थी बल्कि ये भी कहा था कि निहंग सिख हमारे लिए मुसीबत बन गये हैं।
इसके बाद बेअदबी के ही एक अन्य आरोप में निहंग सिखों ने हरि मंदिर साहेब में एक नौजवान की क्रूरता से हत्या कर दी। दिसंबर 2021 में वहां यूपी से आये एक नौजवान को निहंग सिखों ने मार दिया क्योंकि उसके ऊपर ये आरोप लगाया गया कि वह गुरुग्रंथ के पास रखी कृपाण को उठाने की कोशिश कर रहा था। इस हत्या के बाद भी सिखों और निहंगों ने पछतावा व्यक्त करने की बजाय उसके शव को पुलिस को न देने तथा उसके शव को भी सजा देने की मांग पर अड़ गये।
पिछले साल सितंबर में स्वर्ण मंदिर या हरिमंदिर के पास एक और जघन्य हत्याकांड की घटना हुई जब दो निहंग सिखों ने एक नौजवान को सिर्फ इसलिए घेरकर मार दिया क्योंकि वह स्वर्ण मंदिर के पास तंबाकू खा रहा था। उस व्यक्ति के सीने में निहंग सिखों ने खंजर भोंक दिया और उसे लहुलूहान करके वहां से भाग गये। निहंगों का भय इतना ज्यादा था कि रातभर वह व्यक्ति वहीं पड़ा रहा लेकिन किसी ने उसे अस्पताल ले जाने की हिम्मत नहीं जुटाई। आखिरकार स्वर्ण मंदिर के सामने वह व्यक्ति तड़प तड़पकर मर गया।
अप्रैल 2020 में पटियाला में निहंग सिखों ने पुलिसवालों पर हमला बोल दिया था जो कोरोना प्रोटोकॉल का पालन करवा रहे थे। इस हमले में निहंगों ने तलवार से एक पुलिसवाले का हाथ ही काट दिया था। इसके बाद वो जाकर एक गुरुद्वारे में छिप गये जिसके बाद पुलिस और निहंगों के बीच खूनी संघर्ष हुआ। आखिरकार पुलिस ने कमांडों कार्रवाई करके निहंगों पर काबू पाया। इसके बाद जब उस गुरुद्वारे को सर्च किया गया तो उसमें भारी मात्रा में गोली बारूद, बम, गड़ासे, बरछी, तलवारें बरामद हुईं।
ये हाल में घटित कुछ ऐसी घटनाओं का विवरण है जिनका व्यापक स्तर पर मीडिया कवरेज हुआ है। निहंग सिखों द्वारा सरेआम गुण्डागर्दी, बदमाशी की ऐसी न जाने कितनी घटनाएं होती हैं जो कभी खबर नहीं बनती। इन घटनाओं में निहंग सिख अपने शस्त्रों का प्रदर्शन करके लोगों को डराते हैं और मनमानी करते हैं। निहंगों के बारे में माना जाता है क्योंकि वो सशस्त्र धर्मरक्षक हैं इसलिए पुलिस प्रशासन भी उनके सामने लाचार ही नजर आती है। लेकिन जिस तरह से निहंग सिखों द्वारा उपद्रव बढ़ता जा रहा है उसे देखते हुए अब समय आ गया है कि सरकार के स्तर पर उनके निशस्त्रीकरण की दिशा में विचार किया जाए।
चंडीगढ में ही 8 फरवरी को जिस तरह से निहंग सिखों ने उपद्रव किया, पुलिस वालों को दौड़ाकर मारा पीटा, उनका हेलमेट और जैकेट छीन लिया, यह कोई सामान्य बात नहीं है। ये सीधे सीधे शासन को चुनौती है। निहंगों के पुलिस पर इस हमले के बाद कई निहंग सिखों ने इस पर गर्व महसूस किया कि उन्होंने पुलिस वालों पर 'फतेह' हासिल कर ली और उन्हें पीटकर भगा दिया।
निहंग सिखों द्वारा की गयी ऐसी हर हिंसक घटना के बाद उन्हें उस पर शर्म या पछतावा नहीं होता। वो ऐसी घटनाओं पर गर्व करते हैं। फिर चाहे वह सिन्धू बार्डर पर की गयी हत्या हो या स्वर्ण मंदिर के सामने की गयी हत्या। ऐसी हर हत्या के बाद वो 'बोले सो निहाल' का नारा भी लगाते हैं और अपनी हिंसा को जायज भी ठहराते हैं। ऐसा संभवत: इसलिए होता है क्योंकि उन्हें लगता है कि वो ऐसा करके धर्म की रक्षा कर रहे हैं।
निहंग सिखों की ही तरह हिन्दुओं में ऐसी ही एक धर्मरक्षक सेना रही है जिसे नागा सन्यासी कहा जाता है। नागा सन्यासी अखाड़ों से जुड़े होते हैं और इनका उदय मुस्लिम आक्रांताओं से निपटने के लिए हुआ था। उन्हें अपने प्राणों का कोई मोह नहीं होता और वो समाज तथा धर्म की रक्षा करने के लिए आगे रहते थे। वो भी हथियार रखते थे और धर्मयुद्ध लड़ा करते थे। लेकिन बदलते समय के साथ वो अपने अपने अखाड़ों तक सिमट गये। नागा सन्यासियों का सबसे बड़ा अखाड़ा जूना अखाड़ा है लेकिन अब वो सार्वजनिक जीवन में सिर्फ कुंभ के मौके पर ही दिखते हैं।
नागा सन्यासी भी सामान्य नागरिक कानूनों के दायरे से बाहर रहते हैं लेकिन वो अपने अखाड़ों के सिद्धांतों से बंधे होते हैं। समय बदला तो अखाड़ों ने नागाओं को सामान्य जनजीवन से अलग कर लिया और अब वो सिर्फ अखाड़ों तक ही सिमटे रहते हैं। हथियार इत्यादि भी उन्होंने रख दिया है और प्रतीकात्मक रूप से सिर्फ कुंभ स्नान के समय धारण करते हैं। फिर भी जब जब कुंभ होता है तो नागा सन्यासियों द्वारा किसी न किसी उपद्रव की खबर सामने आ ही जाती है। आप कल्पना करिए कि अगर निहंग सिखों की तरह उन्हें भी स्वतंत्र कर दिया जाए तो देश की क्या दशा होगी?
अत: समय आ गया है कि भारत सरकार या फिर पंजाब सरकार निहंगों को हथियार रखने या सार्वजनिक रूप से सक्रियता को लेकर कोई नियम कानून बनाये। इसके लिए सिख धार्मिक संगठनों को शामिल किया जा सकता है। निहंग सिखों में ज्यादातर हिंसक वारदातें मजहबी या रंगरेटा निहंगो द्वारा की जाती हैं। ये निहंग अपना एक निशान साहिब लेकर चलते हैं जो अलग सिख स्टेट बनाने का संकेत होता है। वर्तमान में सिखों के इसी वर्ग की ओर से खालिस्तान की मांग भी फिर से उठायी जाने लगी है।
चार प्रकार के निहंग सिख होते हैं, जिनमें बूढ़ा, तरुण, बीधी और रंगरेटा शामिल हैं। इनमें रंगरेटा निहंग सबसे उग्र और आक्रामक होता है। ये मजहबी सिखों से संबंध रखते हैं इसलिए नीली पगड़ी और नीला चोला पहनते हैं। इनमें दो प्रकार के निहंग दल खालसा से जुड़े होते हैं, बूढ़ा और तरुण। जबकि बीधी निहंग स्वतंत्र होता है। रंगरेटा मजहबी सिखों से जुड़ा होता है। ज्यादातर हिंसक वारदातों वाली खबरें इन्हीं मजहबी रंगरेटा निहंगों से जुड़ी होती हैं जो कि दलित और पिछड़े सिखों का निहंग समूह समझा जाता है।
समाज में आपसी सौहार्द बना रहे उसके लिए जरूरी है कि मजहबी निहंगों को नागाओं की तरह धार्मिक स्थानों तक सीमित कर दिया जाए। उनके हथियार रखने के धार्मिक अधिकार की भी समीक्षा की जानी चाहिए ताकि उनके द्वारा हिंसा और उपद्रव के कारण होने वाली सिख धर्म की बदनामी को रोका जा सके।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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