Ram and Shabari: माता शबरी ने राम को जूठे बेर क्यों खिलाये?
हाल में रामचरितमानस को लेकर खूब बयानबाजी हो रही है। इसके राजनीतिक मतलब हैं लेकिन इसका सामाजिक पक्ष भी है। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शबरी का उल्लेख करके जो कहा है उसको समझना जरूरी है।

Ram and Shabari: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक टीवी चैनल से बात करते हुए कहा है कि जो लोग रामचरितमानस को लेकर विवाद पैदा कर रहे हैं, उन्हें उसमें वर्णित निषादराज और शबरी के चरित्र के बारे में जानना चाहिए। लेकिन वो इस बारे में बात इसलिए नहीं करेंगे क्योंकि उन्हें सिर्फ राजनीति करनी है।
भील राजकुमारी शबरी को रामायण में माता का दर्जा प्राप्त है। हालांकि वर्तमान काल में उन्हें बहुत लोगों ने अपनी समझ से दलित स्त्री की श्रेणी में रख दिया है। ऐसे ही निषादराज का भी जातीय वर्गीकरण भी इसी अनुरूप कर उन्हें भी कथित समाज विज्ञानियों ने दलित कैटेगरी में डाल दिया है। खैर... यह तो अलग-अलग काल पुरुषों की अपनी दृष्टि है। परन्तु माता शबरी कोई सामान्य भील राजकुमारी नहीं थीं। जी, हां! वे एक राजकुमारी थीं। उनके पिता भीलों के मुखिया थे। माता शबरी का नाम श्रमणा बताया जाता है। किन्तु भील जाति शबर से संबंध होने के कारण कालांतर में शबरी कही गईं।
माता शबरी सनातन संस्कृति में सम्माननीय और पूज्य हैं। कारण हम सभी जानते हैं कि भगवान राम ने उनके जूठे बेर खाए थे। यहां एक प्रश्न यह भी उठता है कि आखिर राम को उन्होंने जूठे बेर ही क्यों खाने को दिए? क्या इसका सामाजिक पक्ष है या वैज्ञानिक पक्ष भी है? यदि विज्ञान सम्मत पक्ष से देखा जाय तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि वे आज के समय के फिजीशियन और मनोरोग विशेषज्ञ के समान जानकारी रखती थीं।
बेर मानसिक स्वास्थ्य के लिए अमृत फल जैसा है। इसमें ज़बर्दस्त एंटीकॉन्वल्सेन्ट गुण और न्यूरो प्रोटेक्टिव गुण होते हैं। यह फल प्रचुरता में विटामिन और मिनरल से भरा हुआ है। इसमें सक्विसीनिक और टारटरिक अम्ल जैसे विभिन्न जैविक अम्ल भी पाए जाते हैं, जो आक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करता है। इस फल में तनाव से लड़ने की क्षमता है। साथ ही बेर का फल दिमाग की न्यूरॉनल कोशिकाओं की रक्षा भी करता है। दिमाग को शांत और नींद में सुधार कर मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में सुधार कर सकता है।
ये सारे साइंटिफिक विश्लेषण तो आज के हैं लेकिन बेर के महत्व को उस काल में भी माता शबरी समझ रही थीं। माता अच्छी तरह समझ सकती थीं कि सीता के विरह में वन-वन भटकते राम, कैसी मानसिक और शारीरिक वेदना अनुभव कर रहे होंगे। तभी तो उन्होंने आहार के रूप में सर्वथा उपयुक्त औषधि को ही दिया। भारतीय सांस्कृतिक, परंपरागत ज्ञान की सुन्दरता ही यह रही है कि हमारी नारियां 'आहार ही औषधि है' की पूरी अवधारण को समझती थीं।
बेर के विषय में आज का विज्ञान आधुनिक मेडिकल भाषा में कहता है कि इस फल में विटामिन 'के', कैल्शियम और मैग्नीशियम की भरपूर मात्रा होती है। बेर के बायोमॉलिक्यूल एंटी इन्फ्लेमेट्री होते हैं, और इसके गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल यानी पाचन तंत्र को मदद करने वाले गुण भी खूब हैं। इसमें एंटीमाइक्रोबियल तत्व होते हैं, जो बैक्टीरियल ग्रोथ को रोकते हैं। शरीर डिटॉक्स के लिए यह कितने ही टेस्ट रिसर्च में सफलता से पास हुआ है। यह बात भी सिद्ध हुई है और बेर शरीर में आर्सेनिक, लेड और कैडमियम जैसे हानिकारक टाॅक्सिक पदार्थ में कमी करने में कारगर है।
यदि इसे आयुष विज्ञान की भाषा में कहें तो बेर में कषाय रस होता है। कषाय से अम्ल -पित शांत होता है। बेर की मिठास कषाय गुणों से युक्त होती है। चिंता से शरीर में अम्ल वृद्धि होती है और थकान का अधिक अनुभव होता है। बेर इन दोषों को दूर करता है। इसलिए माता शबरी ने स्वयं चखकर एक-एक बेर अकारण ही राम को नहीं खिलाए। यहां चखने में भी आयुर्वेद के रस सिद्धांत के क्रमानुसार व्यवस्थित करना दृष्टिगत होता है। साथ ही वह निर्मल भाव जो एक माता के मन में उत्पन्न हो सकता है। अपने इष्ट के मानव जीवन में दुःख, विरह, पीड़ा को कैसे दूर किया जा सकता है। शरीर में बन रहे रस के विषम रस आहार के माध्यम से देकर, उनके चित्त को समत्व में लाने का प्रयास इतना वात्सल्यपूर्ण है कि माता ने सारे फल स्वयं चखने के बाद ही प्रभु को दिए, ताकि तनिक भी चूक न हो। मीठे, खट्टे और कसैले का क्रम जो सहज ज्ञान का विषय लग सकते हैं। किन्तु भूमिका में अति महत्वपूर्ण है। अंततः यह भाव की ही बात है। राम मन से शांत और सहज हों, उनके विषाद और विकार दूर हों। यही भाव, पूरे प्रसंग के मूल में दिखाई देता है।
आप इसे भाव से देखें या तर्क और तथ्य विश्लेषण से। भाव में भी रस ही होते हैं और फल में भी वही। दोनों मिलकर बहुत कुछ जादुई कर सकते हैं।
भाव से रस उत्पन्न हो या भोजन से, अंततः उपचार तो वही करता है। सनातन धर्म में सृष्टि का, भौतिक, जीव, रसायन, कर्मकांड- पूजा का ही नहीं भावना का भी विज्ञान होता है। ज्ञान को जब व्यवस्थित क्रमबद्ध समझ लिया जाता है तो वह विज्ञान हो जाता है। जिन्हें जो भाषा भली लगे उसमें समझ लें....... अंत में तो सब 'रस' ही है। 'रसो वै सः॥'
श्रीराम मानव अवतार में मनुष्य जीवन के सभी परिस्थितिजन्य भावों को जीते और अनुभव करते हुए समाज में मर्यादा का उदाहरण रखते हैं। यह प्रसंग भी विछोह की ऐसी ही भावना के अनुभव की प्रतीति है। इस भाव से उत्पन्न शारीरिक और मानसिक वेदना की स्थिति में, शरीर को ऊर्जा देने के लिए ही नहीं बल्कि उनके मन को भी शक्ति प्रदान करने के लिए बेर से उपयुक्त और क्या हो सकता था भला?
क्या अब भी आपको लगता है कि माता शबरी ने एक-एक बेर खुद चखकर बेर अकारण ही राम को खिलाए? विद्वान कहते हैं कि लीलाओं में कुछ भी अकारण नहीं होता। रामचरितमानस में शबरी प्रसंग, श्रीराम में करुण रस का शमन कर, वीर रस का संचार करने की तैयारी का महत्वपूर्ण पड़ाव था, जो लंका संधान हेतु आवश्यक था।
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माता शबरी असाधारण ऋषिका थीं। वे सनातनियों की सम्माननीय हैं, पूज्यनीय हैं। किन्तु आधुनिक सामाजिक तंत्र की संवैधानिक शब्दावली में वे मात्र दलित भीलनी कही जाएंगी। सनातन संस्कृति में महान नारियों की लंबी श्रृंखला है। किन्तु दुर्भाग्यपूर्ण है कि आधुनिक कथित नारी विमर्श में इनके अद्वितीय पक्ष का कहीं उल्लेख नहीं होता।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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