Indian Science: भारत ने दिया विज्ञान फिर भी यूरोप महान?
इसरो के चेयरमैन एस सोमनाथ ने हाल ही में कहा कि वेदों को विज्ञान का जनक मानना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत का ही विज्ञान अरब के रास्ते यूरोप तक पहुंचा फिर उसे अपना बताकर यूरोप के लोगों ने हमें दे दिया।

इसरो चीफ के इस बयान पर तो वैसा कोई हंगामा नहीं मचा जिसमें उन्होंने वेदों को विज्ञान का स्रोत बताया है लेकिन आमतौर पर भारत में वैज्ञानिक कहे जाने वाले लोग ऐसे बयान नहीं देते हैं। ऐसे बयान कुछेक नेता देते थे। जब कोई राजनीतिज्ञ ये कहे कि गणेश जी को प्लास्टिक सर्जरी का पहला उदाहरण मानना चाहिए तो आयातित विचारधारा से पीड़ित जन के लिए उसका मजाक उड़ाना सरल होता है। लेकिन इसरो चीफ ऐसा कहें तब?
लेकिन प्लास्टिक सर्जरी की जगह राइनोप्लास्टी कह दें तो? अगर कोई "राइनोप्लास्टी" कह देता है तो मेडिकल साइंस के इतिहास के हिसाब से ये प्रमाणित होता कि जब टीपू (सुल्तान) ने एक अंग्रेज अफसर की नाक काट ली थी, तब किसी नाइ ने उसका उपचार किया था। उसी के आधार पर आगे नाक फिर से बनाने की जो शल्यचिकित्सा आज प्रयोग होती है, वो विकसित हुई। कुछ ऐसा ही टीकाकरण के मामले में भी होगा क्योंकि फिरंगी तरीके से जो टीकाकरण आज हम लोग देखते हैं, उसका विकास भी भारतीय टीकाकरण की पद्धति से हुआ है। आधुनिक मेडिकल साइंस के इतिहास में ये बताया जाता है कि भारतीय तरीके को फिरंगियों ने प्रतिबंधित कर दिया था। राजनेताओं की भाषा का जरूर पश्चिम से अभिभूत बुद्धिजीवी मजाक उड़ा सकते हैं, लेकिन वैज्ञानिक और ऐतिहासिक तथ्यों के साथ ये मुश्किल होगा। लेकिन वैज्ञानिक तथ्य सामने इसलिए कम आते हैं, क्योंकि वो हमें पढ़ाये ही कम जाते हैं।
शिक्षा नीति और पाठ्यक्रमों में परिवर्तन एक ऐसी मांग थी, जिसे राष्ट्रवादी लम्बे समय से उठाते रहे हैं। जब 2014 में सरकार बदली तो कई लोगों को ये उम्मीद थी कि जल्दी ही पाठ्यक्रमों से विदेशी आक्रान्ताओं के गुणगान वाले प्रसंग हटेंगे और स्वदेश एवं स्वधर्म की महिमा पुनः उजागर की जाएगी। लेकिन शायद मौजूदा सरकार की प्राथमिकताओं में यह नहीं है। ऐसा नहीं है कि इस दिशा में कोई काम नहीं हुआ, बस इतना है कि जो हुआ है वो बहुत थोड़ा है, बहुत धीमा है।
इन सबके बीच एक बदलाव यूजीसी द्वारा चलाये जाने वाले एनईटी/जेआरएफ की परीक्षाओं में दिख जाता है। ये बदलाव है "भारतीय ज्ञान परम्परा" नाम के एक विषय का जोड़ा जाना। इस विषय का पाठ्यक्रम देखते ही ये स्पष्ट हो जाता है कि इसमें पढ़ाये जाने वाले विषय क्यों महत्वपूर्ण होंगे। उदाहरण के तौर पर कावेरी नदी पर बना कल्लनई बांध इस पाठ्यक्रम में स्थापत्य कला का एक हिस्सा है। करीब 2,000 वर्ष पूर्व इस बांध को चोल सम्राट करिकालन ने बनवाया था। इतना पुराना यह बांध आज भी प्रयोग में है और विश्व के सबसे पुराने बांधों में से एक है। थंजावुर, तमिलनाडु में स्थित यह बांध आज पर्यटकों के भी आकर्षण का केंद्र है। जैसे ही इसे सामने ले आया जाता है, पाठ्यक्रम में शमिल करके पढ़ा दिया जाता है, वैसे ही भारत में सारा ज्ञान विदेशों से आया कहने वालों के मुंह पर ताला लग जाना स्वाभाविक है। जैसे ही कोई कहेगा कि भारत में कोई अविष्कार नहीं हुए, वैज्ञानिक शोध नहीं होते थे, वैसे ही कल्लनई बांध के बारे में जानने वाला कोई भी पूछ लेगा कि बिना गणित, अभियंत्रण, नदी के बहाव, जल की मात्रा, मौसम, क्षेत्र के भूगोल इत्यादि के बारे में शोध किये कोई बांध कैसे बना सकता है।
ऐतिहासिक रूप से देखें तो रुड़की का आईआईटी जो एशिया का सबसे पुराना इंजीनियरिंग कॉलेज भी है, उसका इतिहास भी हमें ऐसे ही तथ्य के सामने ला पटकता है। वो फिरंगी शासन का - 1847 का ज़माना था। उस समय में भारत में कोई इंजीनियरिंग कॉलेज भी नहीं था। ऐसे समय में जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भीषण अकाल आया तो फिरंगी सरकार बहादुर को लगान कम मिलने लगा। उस दौर में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इलाके के गवर्नर थे, जेम्स थॉमसन। एक तो लगान कम मिलने से वे परेशान थे दूसरा वो थोड़े भले से थे तो उनसे लोगों का भूखे मरना भी देखा नहीं जाता था। लिहाजा उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी को ख़त लिख कर उस इलाके में नहर खुदवाने की बात की। एक चिट्ठी पर जवाब ना आया तो दूसरा ख़त लिखा। जवाब फिर भी नहीं आया तो उन्हें समझ आया कि वो तरीका सही नहीं लगा रहे। लिहाजा तीसरे ख़त में उन्होंने लिखा कि अगर सिंचाई होगी, तो फसल ज्यादा होगी। फसल ज्यादा तो लगान ज्यादा वसूला जा सकेगा। इस बार भी हामी नहीं आई, इस बार पूछा गया कि सिंचाई की नहर का विचार तो ठीक है। मगर इंजिनियर तो हैं नहीं, नहर बनाएगा कौन?
थॉमसन ने जवाब दिया कि स्थानीय देहाती बना लेंगे नहर। आप तो बस हुकुम कर दो। ये कोई मामूली नाला नहीं बन रहा था। हरिद्वार के पास गंगा से नहर निकाल कर उसे दो सौ किलोमीटर के इलाके में फैलाने की बात हो रही थी। अब अगर आप बिना इंजिनियर दो सौ किलोमीटर के इलाके में नहर के बारे में सोचकर ये समझ रहे हैं कि नहर नहीं बनी होगी तो आप गलत सोच रहे हैं। नहर बनी थी और वो नहर आज भी गंग नहर के रूप में मौजूद है। उसे देहाती लोगों ने अपने वैज्ञानिक समझ और कौशल से बनाया था। इसी नहर के रख-रखाव के लिए इंजिनियर लगेंगे और वो अंग्रेजी हुकूमत को बढ़ाने में मददगार होंगे, ऐसा कहकर जेम्स थॉमसन ने देश में पहला रुड़की इंजीनियरिंग कॉलेज बनवाया था, जहां उन्हीं देहाती लोगों से उनके विज्ञान को सीखा गया और उसे कलमबद्ध करके साइंटिफिक कैरिकुलम का हिस्सा बना दिया गया।
इससे ये भी कहा जा सकता है कि 1847 तक जो ज्ञान भारत में परंपरागत था, पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग सीखते जाते थे, उसे ऐसे इंजीनियरिंग कॉलेज बनाकर कुछ अभिजात्यों तक सीमित कर दिया गया। ऐसे इंजीनियरिंग कॉलेज बनने से फायदा ब्रिटिश सरकार को ये भी मिला कि अब वो कह सकते थे कि जिसे हम सर्टिफिकेट देंगे, वही बांध-नहर बना सकता है, या उनका रखरखाव कर सकता है। तो मूलतः जो दल-हित चिन्तक कहते हैं कि ब्राह्मणों ने हमें पढ़ने नहीं दिया, वो झूठ कहते हैं ये भी अपने-आप ही समझ में आ जाता है। सारी इंजीनियरिंग, उत्पादन से जुड़ा सारा विज्ञान परंपरागत रूप से उन्हीं के पास था जिन्हें आज जाति के नाम पर गोलबंद करके राजनीतिक चौसर चली जाती है।
सिर्फ गणित जैसे विषय को ही देखें तो ये एक स्थापित तथ्य है कि जिन संख्याओं को हम प्रयोग में लाते हैं, वो भारतीय मूल के हैं। भारत से निकलकर ही ०, १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, और ९ की संख्याएं अरब से होते हुए अंग्रेजों के पास तक पहुंची। जिसे हम "अरेबिक न्युमरल्स" कहते हैं वो भी असल में भारतीय संख्याएं या फिर "इंडियन न्युमरल्स" कहलानी चाहिए। इसलिए जब इसरो चीफ कहते हैं कि भारत से, वेदों से निकलकर विज्ञान अरब पहुंचा और वहां से यूरोप पहुंच गया तो कोई बहुत गलत बात नहीं कह रहे होते। इसरो चीफ का ये कहना बिल्कुल प्रासंगिक है कि यूरोप ने हमारा ज्ञान विज्ञान अपने पैकेज में लपेटकर हमें वापस कर दिया।
सिर्फ गणित और अभियंत्रण से सम्बंधित क्षेत्र में ही देखें तो शुल्ब सूत्रों की सबसे पहले याद आती है। संस्कृत में शुल्ब शब्द का अर्थ डोरी या रस्सी होता है। अनेकों मनीषियों ने जिन शुल्ब सूत्रों की रचना की थी उनमें से आज आपस्तम्ब शुल्ब सूत्र, बौधायन शुल्ब सूत्र, मानव शुल्ब सूत्र, कात्यायन शुल्ब सूत्र, मैत्रायणीय शुल्ब सूत्र, और पाण्डुलिपि के रूप में वाराह तथा वधुल उपलब्ध हो जाते हैं। इनमें बौधायन प्रमेय आता है जिसे आम तौर पर आज "पायथागोरस थ्योरम" के नाम से विद्यालयों में पढ़ाया जाता है।
इसलिए शिक्षा में सिर्फ "भारतीय ज्ञान परंपरा" का एक विषय जोड़ देने से ये बदलाव आएगा कि कुछ ही वर्षों में भारतीय युवा पीढ़ी अपने गौरवशाली अतीत को पहचानने लगेगी। उसे इस बात पर शर्म नहीं आ रही होगी कि हमारे पास जो भी है, वो दूसरों का दिया हुआ है। भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन के चेयरमैन एस सोमनाथ जब वेदों को विज्ञान का जनक बताते हैं तो वो कोई विचित्र बात नहीं कर रहे होते। कुछ वर्ष "भारतीय ज्ञान परंपरा" की पढ़ाई जारी रहने दीजिये, बीजगणित, समय के माप, दर्शनशास्त्र, अभियंत्रण, वास्तुकला से लेकर धातुकर्म और रसायनशास्त्र तक में भारतीय ज्ञान का लोहा दुनिया मानेगी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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