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Indian Art Market: कारोबारियों की बाजीगरी का शिकार होता कला बाजार

Indian Art Market: अमृता शेरगिल की 'द स्टोरी टेलर' नामक पेंटिंग हाल ही में सैफरन आर्ट ऑक्‍शन हाउस द्वारा की गई एक नीलामी में करीब 61.8 करोड़ रुपये में बिकी है। किसी भी भारतीय कलाकार द्वारा बनाई गई पेंटिंग के लिए मिली अभी तक की यह सबसे ऊंची कीमत है। पिछले महीने यह रिकॉर्ड सैयद हैदर रजा की पेंटिंग 'गेस्टेशन' ने बनाया था। वह 51.7 करोड़ रुपये में बिकी थी।

ये दोनों ही कलाकार बेशक अब इस संसार में नहीं हैं, लेकिन इनका नाम हमेशा से देश के सबसे ज्‍यादा बिकने वाले कलाकारों में शामिल रहा है। इनका ही क्‍यों, देश में ऐसे दो दर्जन से ज्‍यादा कलाकार हैं, जिनकी कलाकृतियॉं बार-बार अविश्‍वसनीय दामों पर नीलाम होती हैं और हर बार पहले से ज्‍यादा कीमत बटोरने में कामयाब रहती हैं।

Indian Art Market: The art market becomes a victim of the juggling of businessmen

वीएस गायतोंडे की 1974,1980, 1969 में बनाई तीन शीर्षकरहित पेंटिंग (क्रमश: 47.5 करोड़, 42 करोड़ व 39.98 करोड़ रुपए), शेरगिल की ही इन द लेडीज़ एनक्लोजर (37.8 करोड़) और मदर एंड चाइल्‍ड (30.4 करोड़), फ्रांसिस न्‍यूटन सूजा की जन्‍म (32.1 करोड़) और बिड़ला (29.3 करोड़), एसएच रज़ा की सौराष्ट्र (31.5 करोड़) व तपोवन (28 करोड़), तैयब मेहता की काली (26.4 करोड़), कीमत के मामले में भारत की शीर्ष दस पेंटिंग हैं।

पिछले फाइनेंशियल ईयर यानि वर्ष 2022-23 के दौरान कुल 3,833 आर्ट वर्क बिके। इससे भारतीय कला बाजार का टर्नओवर 1200 करोड़ रूपये पहुँच गया, जो इससे पहले वाले वित्त वर्ष के मुकाबले 9% अधिक था और तीन दशक पहले के मुकाबले 600 गुना ज्‍यादा। इसके भी वर्ष 2030 तक बढ़कर 7.2 अरब डॉलर तक पहुँचने की उम्‍मीद की जा रही है। इससे भी ज्‍यादा आश्‍चर्य आपको यह जानकर होगा कि वैश्विक कला बाजार की कुल बिक्री का सिर्फ 0.3% ही भारत के हिस्‍से में आता है। अंतरराष्‍ट्रीय कला बाजार का कुल आकार 2022 में 441.02 अरब डॉलर था और 2023 में 579.52 अरब डॉलर।

आंकड़ों में ज्‍यादा न उलझते हुए अब हम मूल प्रश्नों पर आते हैं। इनमें सबसे पहला तो यही है कि आखिर वे कौन लोग हैं जो इतनी महंगी पेंटिंग खरीदते हैं और उन्‍हें किसी पेंटिंग में ऐसा क्‍या नजर आता है, जिसकी वजह से वे करोड़ों रुपए उसे खरीदने के लिए खर्च कर डालते हैं। आज निवेश कर कल मुनाफा कमाने की चाहत से लेकर अभिजात्‍य वर्ग में अपनी हैसियत साबित करने की ललक तक इसकी बहुत सारी वजह हो सकती हैं। किसी नकारात्‍मक पहलू की तरफ रुख करने की बजाए हम अभी सिर्फ कारोबारी वजहों पर ही फोकस करते हैं।

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि सोने और जमीन की तरह, कला भी एक ऐसा ही निवेश है, जिसमें सामान्‍य हालातों में नुकसान की संभावनाएं न के बराबर ही हैं। लेकिन, बाकी चीजों से यह एक मायने में अलग है कि जिस तरह की पेंटिंग मुनाफे का सौदा बनती हैं, उनमें निवेश करने की हर कोई नहीं सोच सकता। इसके लिए आपका करोड़पति होना ही काफी नहीं है, बल्कि आपको अरबपति-खरबपति होना चाहिए। तभी आप उसके स्‍वामी होने का गौरव और दूसरों को यह बताने का आनंद अनुभव कर पाएंगे।

धनिकों द्वारा कला को संरक्षण देने की बातें सिर्फ राजा-महाराजाओं के दौर तक ही गले उतरती हैं। आज दुनिया में सबसे ऊंची कीमतों पर बिकने वाली पेंटिंग में ऐसी बहुत ही कम होंगी, जिनकी मौजूदा कीमत से उसके रचयिता या उनके परिवारवालों को कोई उल्‍लेखनीय लाभ मिल रहा हो। वर्ना तो यह सारी कमाई पहले से ही माता लक्ष्‍मी के कृपा पात्र रहे धनिकों और कला बाजार के दलालों के बीच ही बंटती नजर आती है। बाकी की हालत उस किसान की होती है, जिसकी उगाई सब्जियॉं, उसे मिलने वाली राशि की तुलना में दस से बीस गुना ज्‍यादा ऊंची कीमत पर बाजार में बिकती हैं।

आज दुनिया के सबसे ज्‍यादा महंगे बिकने वाले कलाकारों में से एक विन्‍सेंट वॉन गॉग की मृत्‍यु बेहद मुफलिसी और परेशानियों भरे दौर में हुई थी। उन्‍हीं की तरह एडवर्ड मुंच, क्‍लोड मोने, पॉल सेजेन, वर्मीर, एमेडियो मोदिग्लिआनी, थॉमस एकिंस, वांग मेंग जैसे कलाकार हैं, जो गरीबी में ही जिए और गरीबी में ही मरे। यह एक अलग बात है कि उनकी मृत्‍यु के सैकड़ों साल बाद भी वे दूसरों को अमीर बना रहे हैं।

कला पर बाजार का यह बढ़ता दबाव असली कला को भी काफी नुकसान पहुँचा रहा है। आज कला, अपने संदेश और शैली से ज्यादा निवेश, ऊंची कीमतों और प्रसिद्धि पर केंद्रित हो गई है। आर्टिस्‍ट सहज भाव से चित्र बनाने की बजाए, ऐसी कला बनाने के बारे में सोचते रहते हैं, जो बाजार में अच्‍छी कीमत पर बिके।

मुद्दा यह भी है कि क्‍या पेंटिंग्स की ऊंची कीमत को उनकी गुणवत्ता या प्रासंगिकता का प्रमाण माना जा सकता है? ऐसे कई कारक हैं जो किसी पेंटिंग की कीमत में योगदान करते हैं, जिसमें कलाकार की प्रतिष्ठा, काम की दुर्लभता और कला बाजार की समकालीन स्थिति तो शामिल है ही, साथ ही कला के कारोबारियों की बाजीगरी भी इसमें कुछ कम हवा नहीं भरती।

प्रॉडक्‍ट, प्राइस, पीपल, प्रोपेगंडा और प्रोजेक्‍शन... मार्केटिंग के ये पॉंच पी, थोड़ा रूप और अंदाज बदलकर यहॉं भी अपना खेल दिखाते हैं और एक अनजान कलाकार, अचानक से सेलिब्रिटी बन जाता है। सिनेमा में जिस तरह ब्रांड बिकते हैं, यहॉं सिग्‍नेचर बिकते हैं। एक साधारण सी पेंटिंग एक प्रसिद्ध चित्रकार के सिग्‍नेचर की वजह से मूल्‍यवान बन जाती है, वहीं अप्रसिद्ध-अल्‍पज्ञात, मगर अत्‍यंत प्रभावशाली चित्रकारों के बनाए मास्‍टरपीस भी अनबिके या कौडि़यों के दाम पर बिकते दिखाई दे सकते हैं।

सच तो यही है कि किसी पेंटिंग का मूल्य व्यक्तिपरक होता है और यह इस बात से निर्धारित होता है कि व्यक्तिगत खरीदार इसके लिए कितना भुगतान करने को तैयार हैं। और वह या तो अपने सर्किल में अपना स्‍टेटस दिखाने के लिए यह भुगतान करता है, या फिर मुनाफे के लिए। और ये दोनों ही चीजें, प्रसिद्ध नामों के साथ ही सुनिश्‍च‍ित की जा सकती हैं। यही वजह है कि जब फिल्‍मों या खेलों के सितारे पेंटिंग जैसी विधा में हाथ आजमाते हैं तो कलाबाजार के नियमित खरीदारों का कला प्रेम एकाएक बहुत बढ़ जाता है।

तकनीक के इस दौर में, कला बाजार में डिजीटल आर्ट और एनएफटी जैसी चीजों की घुसपैठ बहुत तेजी से बढ़ रही है। यह परंपरागत कला के कारोबार को काफी तेजी से बदल रही है। इसमें ग्राहक और कलाकार, बिना बिचौलियों की मदद के एक-दूसरे से सम्‍पर्क और मोलभाव कर सकते हैं। इसमें कलाकार का प्रसिद्ध होना भी कोई शर्त नहीं है। 2021 में 9.18 करोड़ डॉलर में बिकी अब तक की सबसे महंगी एनएफटी कलाकृति 'मर्ज' को बनाने वाला कलाकार पैक, एक गुमनाम डिजिटल आर्टिस्‍ट था।

परंपरागत पेंटिंगों की कीमत उनकी सम्‍पूर्णता में ही होती है, जबकि एनएफटी में इसकी भी कोई अड़चन नहीं है। मर्ज को ही बाद में 3 लाख 12 हजार इंडिविज्‍युअल एनएफटी में बांटा गया, ताकि अधिक से अधिक लोग उसमें निवेश कर सकें। इससे कला के कारोबार से जुड़े लोग अपनी सोच और अपने तौर-तरीके, दोनों में ही बदलाव लाने के लिए मजबूर हो गए हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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