इंडिया गेट से: राजनीतिक अपरिपक्वता का उदाहरण है हेमंत सोरेन

जन समर्थन और राजनीतिक समझ दोनों अलग अलग बातें हैं, जरूरी नहीं कि जिस राजनीतिक नेता को जन समर्थन हो, उसे राजनीतिक समझ भी हो। यहाँ हम झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की बात करते हैं, उन्हें अच्छा खासा जन समर्थन है, इसीलिए वह राष्ट्रीय दलों कांग्रेस और भाजपा को पछाड़ते हुए सब से ज्यादा सीटें ले कर आए थे।

Hemant Soren

सोरेन परिवार की झारखंड की राजनीति पर जबर्दस्त पकड़ है। पांच बार सोरेन परिवार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंच चुका है, लेकिन कार्यकाल कभी भी पूरा नहीं किया। किसी न किसी वजह से कुर्सी गंवानी पड़ी। यह पांचवीं बार है जब सोरेन परिवार को बड़ा झटका लगा है। सब से पहले शिबू सोरेन दो मार्च 2005 से 12 मार्च 2005 तक सिर्फ 10 दिन मुख्यमंत्री रहे थे। फिर 27 अगस्त 2008 से 19 जनवरी 2009 तक 145 दिन मुख्यमंत्री रहे। तीसरी बार 30 दिसंबर 2009 से एक जून 2010 तक 153 दिन मुख्यमंत्री पद पर रहे। हेमंत सोरेन पहली बार 13 जुलाई 2013 से 28 दिसंबर 2014 एक साल 168 दिन मुख्यमंत्री रहे और अब 29 दिसंबर 2021 से अब तक दो साल 241 दिन मुख्यमंत्री पद पर रहे हैं। अब उन्हें इस्तीफा देना पड़ सकता है।

भारतीय जनता पार्टी ने यूपीए की सरकार बनते ही सोरेन परिवार को घेरना शुरू कर दिया था। सबसे पहले सीएम हेमंत सोरेन पर अपने नाम से खनन लीज आवंटित करने करने का आरोप लगाया। उसके बाद उनकी पत्नी कल्पना सोरेन के नाम से उद्योग विभाग की जमीन आवंटित होने का खुलासा हुआ। इसके बाद हेमंत सोरेन के भाई और विधायक बसंत सोरेन के बारे में खुलासा हुआ कि उन्होंने चुनावी शपथ पत्र में जानकारी छिपाई है। इसके अलावा भाजपा ने शिबू सोरेन के खिलाफ लोकपाल में शिकायत कर रखी है। यानी सोरेन परिवार पूरी तरह से विवादों में घिरा हुआ है। भाजपा ने एक तरह से ऐसा माहौल बना दिया है कि सोरेन परिवार का कोई बेदाग नहीं बचा।

बिहार और झारखंड में हम पिछले तीन दशक से देख रहे हैं कि राजनीतिक नेता सत्ता का लाभ उठाने का कोई मौक़ा नहीं चूकना चाहते। लालू यादव, शिबू सोरेन और मधु कौड़ा के उदाहरण हमारे सामने हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा के तीन सांसद तो नरसिंह राव की सरकार बचाने के लिए मिला कैश लेकर बैंक में जमा करवाने चले गए थे। लालू यादव ने किस प्रकार चारा घोटाला कर के सरकारी खजाने में सेंध लगाई थी। मधु कौड़ा ने तो हद ही कर दी थी, सरकारी खजाना ही लूट लिया था।
अब यह कहना राजनीतिक टिप्पणी होगी कि लालू यादव, मधु कौडा, शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन सभी कांग्रेस के समर्थन से ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंचे या फिर कांग्रेस के समर्थन से ही कुर्सी बचाते रहे। कांग्रेस के समर्थन से सरकार चला रहे हेमंत सोरेन ने भी वही किया। उन्होंने मुख्यमंत्री रहते ही खदान अपने नाम करवा ली, अपनी पत्नी कल्पना सोरेन को भी इण्डस्ट्रियल लैंड अलॉट कर दी। भाईयों, भाभियों को क्या क्या दिया होगा, उसकी परतें खुलना अभी बाकी है। क्योंकि इस परिवार में सभी के सभी विधायक हैं, तो वे भी अपना हिस्सा मांगेगे।

मूल बात बात यह है कि राजनीतिक समझ हो तो राजनेता संकट को पहले भांप लेता है और उसका हल भी निकाल लेता है। यहाँ हम सोनिया गांधी और हेमंत सोरेन की तुलना करते हैं। फरवरी महीने में पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने खदान अपने नाम पर करवाने के मामले में राज्यपाल को लाभ के पद संबंधी शिकायत की थी। यह शीशे की तरह साफ़ था कि वह मुक्त नहीं हो सकते क्योंकि यह एक बड़ी राजनीतिक भूल थी।

ठीक यही स्थिति 2006 में यूपीए शासनकाल के समय सोनिया गांधी के सामने आई थी। उनके खिलाफ भी लाभ के पद का मामला सामने आया था। वह रायबरेली से सांसद थीं। इसके साथ ही वह यूपीए सरकार के समय गठित राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की चेयरपर्सन भी थीं, जिसे लाभ का पद करार दिया गया था। लेकिन सोनिया गांधी ने राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया, उन्होंने खुद ही लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया, जिस के बाद रायबरेली से दोबारा चुनाव लड़ा और जीत कर फिर लोकसभा में आ गईं।

इसी तरह 2006 में ही जया बच्चन पर भी लाभ के पद का मामला बन गया था। जया राज्यसभा सांसद थीं। इसके साथ ही वह उत्तर प्रदेश फिल्म विकास निगम की चेयरपर्सन भी थीं, जिसे लाभ का पद करार दिया गया और चुनाव आयोग्य ने जया बच्चन को अयोग्य ठहराया था। जया बच्चन इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गईं लेकिन उन्हें राहत नहीं मिली। इसकी वजह से जया बच्चन की संसद सदस्यता रद्द हो गई थी। जब मामला चुनाव आयोग में गया था, अगर वह तभी राज्य सभा से इस्तीफा दे देती तो इस छीछालेदर से बच सकती थीं। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि अगर किसी सांसद या विधायक ने लाभ का पद लिया है तो उसकी सदस्यता निरस्त हो जाएगी चाहे उसने वेतन या दूसरे भत्ते लिए हों या नहीं।

लोकसभा के स्पीकर रहते हुए सोमनाथ चटर्जी भी ऑफिस ऑफ़ प्रॉफिट के मामले में बुरी तरफ फंस गए थे। तब उन्होंने मनमोहन सरकार पर दबाव बनवा कर पिछली तारीख से कुछ पदों को ऑफिस ऑफ़ प्रॉफिट से मुक्त करवाने का बिल पास करवाया था। इस पर संसद में काफी हंगामा भी हुआ था, और राष्ट्रपति से भी गुहार लगाई गई थी कि वह पिछली तारीख से लागू किए जाने वाले क़ानून पर दस्तखत नहीं करें। लेकिन राष्ट्रपति ने दस्तखत कर के लोकसभा स्पीकर सहित अनेक नेताओं को बचा लिया था।

हेमंत सोरेन के सामने ये उदाहरण थे। अगर वह सोनिया गांधी की तरह राजनीतिक समझदारी का परिचय देते तो इस छीछालेदर से बच सकते थे। वह विधान सभा से इस्तीफा दे कर मुख्यमंत्री बने रह सकते थे और अपनी ही खाली हुई सीट से छह महीनों के भीतर दुबारा चुनाव लड़ कर विधानसभा में लौट सकते थे। जया बच्चन की तरह चुनाव आयोग के फैसले का इन्तजार करने और फिर कोर्ट में चुनौती देने की वकीलों की सुझाई हुई रणनीति अपना कर उन्होंने अपनी छीछालेदर करवा ली है। राजनीतिक नेताओं को वकीलों की सलाहों पर अमल करने की बजाए, अपनी राजनीतिक समझ का इस्तेमाल करना चाहिए। वकील तो मोटी कमाई के लिए सब को मीठी गोली देते ही हैं।

हेमंत सोरेन ने समय से पहले खुद इस्तीफा न देकर बहुत बड़ा रिस्क लिया। विधानसभा से उन की बर्खास्तगी दो तरह की हो सकती थी। एक तो यह कि उन्हें सिर्फ विधासभा से बर्खास्त किया जाए, दूसरा यह कि उन्हें और पांच साल चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहरा दिया जाए। इस रिस्क की बजाए उन्हें सोनिया गांधी की तरह खुद ही इस्तीफा दे देना चाहिए था।

अगर हेमंत सोरेन को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ती है, तो ऐसी स्थिति में यूपीए तो क्या सोरेन परिवार में ही फूट पड़ सकती है। अलबत्ता खबरें आ रही हैं कि परिवार में हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन को मुख्यमंत्री बनाने पर सहमति नहीं हो रही। अगर सहमति हो भी जाती है, तो भाजपा राज्यपाल के पास जा कर उनके खिलाफ दायर शिकायत का हवाला दे कर उन का शपथ ग्रहण रुकवा सकती है। राज्यपाल हाईकोर्ट या सुप्रीमकोर्ट से राय लेने की बात भी कर सकते हैं। इसलिए परिवार में हेमंत सोरेन की मां रूपी सोरेन के नाम पर सहमति बनती दिखाई दे रही है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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