China vs India: भारत से क्यों भयभीत है शी जिंगपिंग?
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चीन भारत को अपना कड़ा प्रतिद्वंदी मानता है। उसे लगता है कि दुनिया का सिरमौर बनने से सिर्फ भारत ही रोक सकता है। इसलिए भारत के लिए निरंतर चुनौती पेश करना उसकी दूरगामी नीति का हिस्सा बन गया है।

China vs India: चीनी राष्ट्रपति शी जिंगपिंग को इस समय महान बनने का भूत सवार है। वे इतिहास के पन्नों में एक शक्तिशाली चीनी सम्राट के बतौर अपना नाम दर्ज़ कराना चाहते हैं इसलिए वे अपने पड़ोसी देशों पर लगातार दनदना रहे हैं। उनकी महानता के इस सपने में सबसे बड़ी बाधा भारत और उसका मौजूदा नेतृत्व है। इसलिए वह समय समय पर भारतीय सीमा पर अस्थिरता पैदा करने की कोशिश करते हैं।
भारत को लेकर शी जिनपिंग की परेशानी के कई कारण हैं। पहला, जो इज़्ज़त और सम्मान भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को दुनिया में मिला हुआ है, वैसा चीन की अधिनायकवादी, तानाशाही और निरंकुश कम्युनिस्ट व्यवस्था को नहीं मिलता। इसलिए चीन लगातार अपने प्रचार तंत्र और भारत में मौजूद अपने दत्तक वैचारिक पुत्रों के ज़रिये हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था का मखौल बनाता रहता है। हमारी व्यवस्था पर ये प्रहार कभी माओवादियों के आतंक के जरिये होता है तो कभी वामपंथी बुद्धिजीवी वर्ग के जरिये।
याद कीजिये कि किस तरह जब भारत में कोविड महामारी की पहली और दूसरी घातक लहर आई थी तो इन कतिपय लोगों ने बड़े बड़े अख़बारों में लेख लिखकर 'चीन से सीखने' की वकालत की थी। कई भाई लोगों ने तो बीबीसी से लेकर न्यूयॉर्क टाइम्स तक में भारत के भीतर ही मार्क्सवादी सरकार के 'केरल मॉडल' की तारीफ में दर्जनों ख़बरें और लेख छपवाए थे। ये बात अलग है कि उनमें दिए अधपके तर्क और तथ्य बाद में गलत साबित हुए। ऐसा ही चीन की कोविड नीति के बारे में भी साबित हुआ। आज पूरा विश्व भारत की कोविड से निपटने की रणनीति को सही मानता है।
दुनिया को त्रस्त करने वाली कोरोना महामारी के बारे में कहा जाता है कि ये चीन की प्रयोगशाला से ही पैदा हुई। कई पश्चिमी विशेषज्ञ तो यहाँ तक कहते हैं कि इसे जैविक हथियार के तौर पर चीन ने दुनिया को परास्त करने के लिए जानबूझकर कर प्रायोगिक तौर पर पैदा किया। पर वही कोरोना अब खुद चीन के लिए भस्मासुर बन गया लगता है। कुछ समय से चीन में कोरोना को लेकर कोहराम मचा हुआ है। शी जिनपिंग की 'जीरो कोविड' नीति नाकाम हो चुकी है।
त्रस्त चीनी जनता ने खुलेआम इसका विरोध किया है और चीन के दर्जनों शहरों और विश्वविद्यालयों में सरकार की कोरोना नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन हुए हैं। वैसे तो चीन के निरंकुश और तानाशाही कम्युनिस्ट तंत्र से ख़बरें बाहर आना मुश्किल है। लेकिन इन प्रदर्शनों को लेकर छन छन कर जो जानकारी बाहर आ पायी है उससे लगता है कि कोरोना को लेकर आम चीनी नागरिक बेहद हताश, निराश और गुस्से में हैं।
ये प्रदर्शन शुरू तो कोरोना को लेकर हुए थे लेकिन बाद में इनमें शी जिंगपिंग के खिलाफ नारे भी सुनाई दिए है। चीन की कठोर नियन्त्रण वाली व्यवस्था में ये प्रदर्शन किसी विद्रोह से कम नहीं है। 1989 के थ्याननमान प्रदर्शनों के बाद चीन में ये ऐसे पहले व्यापक प्रदर्शन है। 1989 के इन प्रदर्शनों को कुचलने के लिए चीनी सरकार ने अपने निहत्थे नागरिकों पर टैंक चढ़ा दिए थे। मौजूदा प्रदर्शनों के दौरान सैकड़ों लोगों की गिरफ्तारी हुई लेकिन फिर भी चीनियों का आक्रोश नहीं थमा है।
हारकर कम्युनिस्ट सरकार को अपनी तीन साल से चल रही 'ज़ीरो कोविड' नीति में कई बड़े परिवर्तन करने पड़े हैं। इससे स्थितियां ठीक होने की बजाय और भी विषम हो गयी हैं। चीन में अभी भी सभी बुजुर्गों को टीके नहीं लगे हैं। इसलिए वहां कई इलाकों में कोरोना संक्रमण के तेज़ी से फैलने की खबरें आ रहीं हैं। सघन आबादी को देखते हुए कोरोना से भारी संख्या में मौतों की आशंका की जा रही है।
लेकिन राष्ट्रपति शी जिनपिंग आंतरिक स्थितियों से चीन की जनता का ध्यान हटाने में माहिर खिलाड़ी हैं। इसका बेहतर इस्तेमाल उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के पिछले अधिवेशन में किया और तीसरी बार चीन के सर्वेसर्वा बन बैठे। ऐसा माओ के बाद पहली बार चीन में हुआ। अरुणाचल में नियंत्रण रेखा का स्वरुप बदलने की नाकाम कोशिश को भी इस सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए।
उधर बुनियादी तौर पर भारतीय सभ्यता और विरासत के चिर पुरातन और नित्यनूतन स्वरुप को भी चीनी नेतृत्व एक चुनौती के रूप में देखता है। चीनी कम्युनिस्ट नेतृत्व जानता है कि पुराने समय से भारत आध्यात्मिक और नैतिक नेतृत्व प्रदान करता रहा है। तिब्बत और एशिया के बाकी देशों में बौद्ध धर्म का अमिट प्रभाव इसका अन्यतम उदाहरण है। चीन के लिए यह एक बुनियादी वैचारिक और आध्यात्मिक चुनौती है।
भारत को आर्थिक और सामरिक रूप से रोकने के लिए चीन 1950 से ही पाकिस्तान का एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करता आया है। कश्मीर और पंजाब में आतंकवाद की फंडिंग उसी प्रोजेक्ट का हिस्सा रही है। पाकिस्तान में चीन ने अरबों डॉलर लगाए हैं लेकिन वे सब अब बट्टेखाते में जाते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में डर ये है कि पाकिस्तान को दिए कर्ज़े की एवज में चीन उसकी सेना और आईएसआई से भारत में आतंक फ़ैलाने को कहेगा।
भारत को उलझाए रखने के अपने इसी मिशन के तहत चीन भारत में माओवादियों और वामपंथी गुटों को बढ़ावा देता रहा है। यही कारण है कि भारत में हर छोटी सी बात पर शोर मचाने वाले वामपंथी बुद्धिजीवियों को चीन में उइगर मुसलमानों के निर्दयतापूर्ण दमन पर सांप सूंघ जाता है। मजहबी आज़ादी का झंडा लेकर चलने वाले भी चीन में हो रहे दमन पर एक बयान तक नहीं देते।
दरअसल इनमें से अधिकतर लोग बुद्धिजीवी की आड़ में भारत को परेशान रखने के लिए चीन के पाले हुए तोते जैसे हैं। चिंता की बात तो ये है कि अपने देश के मीडिया और अकादमिक जगत में इनकी गहरी घुसपैठ है।
इन सारी रूकावटों और अड़चनों के बावजूद भारत अपनी अस्मिता के साथ आगे बढ़ता ही गया है। प्रधानमंत्री मोदी की स्पष्ट नीतियों और ठोस सोच ने भारत को एक नई आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक धार दी है। भारत चीन सीमा पर बन रहे सड़कों और पुलों के नए जाल ने चीन के विस्तारवादी इरादों में खलल डाल दी है।
चीन भारत के इन्हीं रक्षात्मक उपायों से परेशान है। वह संभवत: ये संदेश देना चाहता है कि भारत की सीमाओं का अतिक्रमण कर सकता है। लेकिन अरुणाचल के मुख्यमंत्री प्रेमा खाण्डू ने ठीक ही कहा है कि ये 1962 का भारत नहीं है। आज का भारत सिर्फ आत्मविश्वास के साथ दुनिया की आंख से आंख मिलाकर बात करने वाला भारत ही नहीं है। उसकी सेना में किसी टेढ़ी आंख को फोड़ने का दमखम और हौसला भी है। इसे डोकलाम, गलवान और अब तावांग में दुनिया ने देख लिया है।
यह भी पढ़ें: एक एक कदम से Lac पर कब्जा, जानिए 'सलामी स्लाइसिंग' कैसे बना चीन का अचूक हथियार?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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