Bharat and India: स्वतंत्रता, आधुनिकता और अभारतीयता

Bharat and India: यह एक दुखद किंतु कटु सत्य है कि भारत में अभारतीयता ही आधुनिकता की सबसे सरल परिभाषा बन गयी है। यह परिभाषा किसी और ने हमें बनाकर दी हो ऐसा भी नहीं है। जो कुछ भारतीय है वह पिछड़ा है, जड़ है, दकियानूसी है। इसके उलट जो कुछ भारत के बाहर से आ रहा है वह आधुनिक है, प्रगतिशील है, हमें इसे छोड़कर उसे पकड़ लेना है। हम अब ऐसे ही सोचने लगे हैं।

छोड़ने पकड़ने का यह खेल कोई आज शुरु हुआ ऐसा भी नहीं है। स्वतंत्रता से पहले ही जब संविधान बनाने का प्रयास शुरु हुआ तो बीएन राऊ जैसे विद्वान ने भी एक बार भी भारत की परंपरा में झांकने की कोशिश नहीं की। उन्होंने संसार के दूसरे देशों के संविधान का अध्ययन किया और एक प्रारुप बनाकर सामने रखा। इनमें अधिकांश यूरोप के ही देश थे। फिर बाद में जब संविधान सभा बनी तो इसी दृष्टिकोण से हमारे संवैधानिक कायदे कानून तय किये गये। अब भी हम 'गर्व' से कहते ही हैं कि भारतीय संविधान में किस देश से क्या उधार लिया गया।

independence-day-2023 Bharat and India: Independence, Modernity and Un-Indianness

गांधीजी ये सब नहीं चाहते थे। लेकिन जब औपचारिक रूप से संविधान बनाने की यह प्रक्रिया शुरु हुई तब तक गांधी जा चुके थे। अब उनकी हिन्द स्वराज और समय समय पर लिखे लेख या भाषण तो संविधान बनाने का आधार हो नहीं सकते थे। यूरोपीय लॉ सिस्टम के जानकार बीएन राऊ हों, फेबियन सोशलिज्म से प्रभावित नेहरू हों या ब्रिटिश शासन के कायल डॉ भीमराव अंबेडकर। उन्हें भी भारत को नये तरीके से आधुनिक बनाना था। यह आधुनिकता तब तक नहीं आ सकती थी जब तक भारत के पुरातन को निरस्त न किया जाए।

नेहरु ने 'अतीत के मृत वजन' को बदलने की इच्छा से प्रेरित होकर आधुनिकता का अपना दर्शन विकसित किया था। वो एक ऐसे "आधुनिक" राज्य का निर्माण करना चाहते थे जो किसी मत पंथ धर्म से बंधा हुआ न होकर अपने आप को बदलने और समय के साथ चलने के लिए उद्यत हो। हालांकि इसमें वो पूरी तरह सफल नहीं रहे क्योंकि कांग्रेस पर धर्मनिष्ठ परम्परावादियों का भी प्रभाव था। फिर भी उन्होंने आधुनिकता की जो आधारशिला रखी वह उसके पहले के ब्रिटिश शासकों की अंग्रेजीयत का समाजवादी नवीनीकरण ही था।

हमने वहां से यह मानना शुरु कर दिया कि भारत को उन्नत राष्ट्र होना है तो हमें कुछ बाहरी प्रगतिशील और उन्नत राजनीतिक विचार चाहिए होगा। इसलिए भारत में राज और शासन की जो विधियां थीं, उसकी ओर देखने की कोशिश नहीं की गयी। हालांकि अमेरिकी लेखक विल डुरांट जैसे लोगों को यह बात तो दिखी कि भारत की ग्राम्य व्यवस्था लोकतंत्र की सबसे सशक्त ईकाई जैसी है लेकिन नेहरु या उनके आधुनिकतावादी सलाहकर ये सब न देखना चाहते थे और न सुनना।

हालांकि अनेक सतहों में लिपटे भारत को जब 200 साल में अंग्रेज पूरी कोशिश करके बहुत नहीं बदल पाये तो डेढ दशक में नेहरु कितना बदल पाते, लेकिन अतीत से व्यवस्था चली आ रही थी उस व्यवस्था को बदलने की उस समय उनके पास न फुर्सत थी और न हिम्मत। शासन का एक बना बनाया ढांचा जब किसी को मिल जाता है तो उसमें बदलाव करना उसे असुविधाजनक लगता है। फिर नेहरु के सामने तो चुनौतियां ही चुनौतियां थीं। सबसे बड़ी चुनौती बंटवारे से उपजी त्रासदी थी जो कुछ और सोचने का समय नहीं दे रही थी।

बाद के प्रधानमंत्रियों और सरकारों ने उसी ब्रिटिश व्यवस्था में थोड़ा बहुत बदलाव करने से अधिक कुछ नहीं किया। इधर मॉडर्निटी या आधुनिकता का दबाव बना ही हुआ था। नेहरु के बाद इंदिरा गांधी से होते हुए राजीव गांधी तक एक ही परिवार का शासन रहा। कोई अपने बाप या नाना की नीति को भला क्योंकर चुनौती देता। इनके बाद नब्बे के दशक में जो सरकारें आयीं वो भी यही मानती थीं कि इंडिया को मॉडर्न स्टेट बनाये रखने के लिए हमें निरंतर बाहर से वस्तु ही नहीं विचारों और तकनीकी का आयात जारी रखना होगा।

नब्बे के दशक की शुरुआत में पीवी नरसिंहराव ने जब आर्थिक बाजारवाद का रास्ता खोला तब आधुनिकता का गोल पोस्ट बदल गया। अभी तक आधुनिकता का प्रेरणास्रोत रहा सोवियत यूनियन और सुनहरा समाजवाद पीछे धकेल दिया गया। अब अमेरिका और पूंजीवाद भारत में आधुनिकता के नये वाहक बन गये। उसके बाद स्थिर सरकारों में अटल बिहारी वाजपेयी रहे हों, मनमोहन सिंह रहे हों या अब नरेन्द्र मोदी। विदेशी पूंजी, विदेशी विचार और विदेशी तकनीकी वाली आधुनिकता के ये मानक किसी ने नहीं बदले।

इन सब नेताओं ने जो कुछ किया वह देश की आर्थिक प्रगति के लिए किया है। एक ऐसा समाज जिसका सामाजिक जीवन ऐसा रहा हो कि उसमें बाजार के लिए बहुत सीमित जगह हो, उसे बदले बिना बाजार की मांग नहीं बढ सकती थी। नब्बे के दशक तक ग्रामीण क्षेत्रों में भारत अपनी सामाजिक जीवन शैली को लगभग पूरी तरह पकड़े हुए था। खेती और अर्थव्यवस्था, रहन सहन, पारिवारिक संबंध सबमें सामाजिकता का इतना गहरा असर था कि एक दूसरे की मदद करके हम बड़े से बड़ा काम कर लेते थे। न हमें सरकार की जरूरत होती थी और न बाजार की।

लेकिन नब्बे के दशक से इसमें आने वाली टूटन तेज हो गयी। गांव के लोगों को उनके अपने संसाधनों के इस्तेमाल पर कानूनी रोक लगनी शुरु हुई ताकि वो अपनी जरुरतों के लिए बाजार का रुख करें। वह ग्राम्य व्यवस्था जिसे गांधी जीवन की मुक्ति का मार्ग मानते थे उसकी व्यवस्थाओं को नष्ट किये बिना बाजार की बात नहीं बनने वाली थी। दातुन कोई व्यापार पैदा नहीं करता। व्यापार पैदा करने के लिए जरूरी था कि लोगों को टूथपेस्ट पर लाया जाए। स्थानीय संसाधनों और आपसी सहयोग से बननेवाले मकान भी कोई व्यापार पैदा नहीं करते। व्यापार पैदा करने के लिए जरूरी था कि लोग सीमेन्ट कंक्रीट वाले मकान की ओर आयें। इसलिए हर परंपरागत जीवनचर्या और व्यवहार को पुराना तथा बाजार आधारित वस्तुओं के इस्तेमाल को आधुनिक करार दिया जाने लगा।

इससे आर्थिक रुप से भारत संसार के मानचित्र पर तो उभरने लगा लेकिन उसके सामने एक सांस्कृतिक संकट खड़ा हुआ है। 200 साल में अंग्रेज जितना नहीं बदल पाये उससे अधिक 20-25 साल की बाजार वाली मॉडर्निटी ने हमें बदल दिया है। चाहे भाषा हो, पहनावा हो, खान पान हो, शिक्षा हो, जीवनशैली हो या फिर सोचने का तरीका हो हर जगह हमारी पहली प्राथमिकता भारत को छोड़कर अभारतीय हो जाने की है। हमारे सामने भारतीय होते ही पिछड़ा कहे जाने का संकट हमेशा मुंह बाये खड़ा है। अच्छी अंग्रेजी बोलकर मॉडर्न होने का जो चलन शुरु हुआ था अब वह सोच विचार और जीवन शैली तक पहुंच गया है। संक्षेप में कहें तो अभारतीयता ही हमारे लिए आधुनिकता की कसौटी बन गया है।

अब हम रातों रात इससे पीछे नहीं जा सकते। भारत में जो समय की अवधारणा है उसके अनुसार समय वर्तुल होता है। यह एक गोल परिधि में चलता है। इसके अनुसार हम जहां से चलते हैं वहीं लौटकर पुन: आते हैं। इसलिए हमारे लिए कुछ भी आधुनिक पुरातन नहीं होता। जो है सब सनातन है। एक निरंतर प्रवाह जिसमें उतार चढाव आता है लेकिन उसकी गति नहीं रुकती। जीवन का एक वर्तुल या चक्र वैसे ही निरंतर चलता रहता है जैसे ग्रह नक्षत्र अपनी अपनी धुरी पर घूम रहे हैं। इसलिए हम सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग के चतुर्युग में काल को बांटते हैं जो आते जाते रहते हैं।

इसलिए भारतीय लोगों के जीवन और चिंतन में अभारतीय होने का यह जो चलन है यह कितना लंबा चलेगा कह नहीं सकते। पुन: परंपरा से पैदा हुई भारतीयता पर कब लौटेंगे इसकी भविष्यवाणी कौन कर सकेगा? कभी लौटेंगे भी या नहीं, इसका भी ठीक ठीक अनुमान लगाना अभी तो कठिन ही है। धीरे धीरे ही सही हम निरंतर अपनी धुरी से दूर जा रहे हैं। हमारे लिए अपनी धुरी से यह विस्थापन ही आधुनिकता हो गयी है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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