Neena Bansal Krishna: कौन हैं जस्टिस नीना बंसल कृष्णा? खान सर विवाद में अंजना ओम कश्यप को नहीं दी राहत
Neena Bansal Krishna: देश के चर्चित शिक्षक खान सर और वरिष्ठ पत्रकार अंजना ओम कश्यप (Khan Sir vs Anjana Om Kashyap) के बीच चल रहे मानहानि विवाद ने इन दिनों सोशल मीडिया से लेकर न्यूज चैनलों तक खूब सुर्खियां बटोरी हैं। इस मामले की सुनवाई दिल्ली हाई कोर्ट में पहुंचने के बाद एक और नाम तेजी से चर्चा में आ गया है। यह नाम है जस्टिस नीना बंसल कृष्णाा (Justice Neena Bansal Krishna) का। लोग इंटरनेट पर यह खोज रहे हैं कि आखिर वह कौन हैं, जिनकी अदालत में यह हाई-प्रोफाइल मामला पहुंचा है।
आमतौर पर न्यायाधीशों के नाम केवल कानूनी जगत तक ही सीमित रहते हैं, लेकिन जब कोई चर्चित मामला अदालत में पहुंचता है तो सुनवाई करने वाले जज भी लोगों की दिलचस्पी का विषय बन जाते हैं। यही वजह है कि जस्टिस नीना बंसल कृष्णा इन दिनों चर्चा के केंद्र में हैं। हालांकि उनका न्यायिक सफर किसी एक मामले तक सीमित नहीं है। तीन दशक से ज्यादा लंबे करियर में उन्होंने निचली अदालतों से लेकर हाई कोर्ट तक कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली हैं और कानून के अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई है।

खान सर और अंजना ओम कश्यप विवाद से कैसे जुड़ा नाम?
हाल ही में पत्रकार अंजना ओम कश्यप और टीवी टुडे नेटवर्क ने खान सर, जिनका वास्तविक नाम फैसल खान है, समेत कुछ अन्य लोगों के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में 2 करोड़ रुपये का मानहानि मुकदमा दायर किया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि कुछ बयानों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर साझा की गई सामग्री के कारण उनकी छवि को नुकसान पहुंचा है।
मामला अदालत पहुंचने के बाद इसकी सुनवाई जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की बेंच के सामने हुई। शुरुआती सुनवाई के दौरान अदालत ने तत्काल किसी सामग्री को हटाने या अंतरिम रोक लगाने का आदेश नहीं दिया और संबंधित पक्षों से जवाब मांगा। इसके बाद यह मामला मीडिया और सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया। इसी के साथ लोगों की नजरें उस जज पर भी गईं जो इस पूरे मामले की सुनवाई कर रही हैं।
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कौन हैं नीना बंसल कृष्णा, कहां से की है पढ़ाई?
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की शुरुआती शिक्षा पूरी होने के बाद उन्होंने कानून के क्षेत्र में करियर बनाने का फैसला किया। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित कैंपस लॉ सेंटर से LLB की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के विधि संकाय से LLM की डिग्री भी हासिल की।
कानून की पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने न्यायिक सेवा में जाने का लक्ष्य तय कर लिया था। यही कारण रहा कि वकालत के पारंपरिक रास्ते पर आगे बढ़ने के बजाय उन्होंने न्यायिक सेवा को चुना और बहुत कम उम्र में ही अदालतों से जुड़ गईं। उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि ने आगे चलकर उनके न्यायिक करियर की मजबूत नींव तैयार की।
1992 में शुरू हुआ न्यायिक सफर
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने वर्ष 1992 में दिल्ली न्यायिक सेवा में सिविल जज के रूप में अपना करियर शुरू किया। उस समय से लेकर आज तक उन्होंने न्यायपालिका के लगभग हर स्तर पर काम किया है। शुरुआती वर्षों में उन्होंने दीवानी और आपराधिक मामलों की सुनवाई की और धीरे-धीरे अपनी कार्यशैली तथा कानूनी समझ के कारण पहचान बनाई।
अदालतों में लंबे अनुभव और बेहतर प्रदर्शन के आधार पर उन्हें वर्ष 2003 में दिल्ली उच्च न्यायिक सेवा में पदोन्नत किया गया। इसके बाद उनके करियर में कई महत्वपूर्ण पड़ाव आए और उन्हें लगातार बड़ी जिम्मेदारियां सौंपी जाती रहीं। न्यायिक सेवा में उनका सफर इस बात का उदाहरण माना जाता है कि निरंतर काम और अनुभव किस तरह किसी व्यक्ति को व्यवस्था के सर्वोच्च स्तर तक पहुंचा सकता है।
कई महत्वपूर्ण पदों पर संभाली जिम्मेदारी
अपने लंबे करियर के दौरान जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक और न्यायिक पदों पर काम किया है। वह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में प्रेजेंटिंग ऑफिसर के रूप में भी सेवाएं दे चुकी हैं, जहां मानवाधिकार से जुड़े मामलों पर काम करने का अवसर मिला। इसके अलावा उन्होंने दिल्ली न्यायिक अकादमी में अकादमिक निदेशक की जिम्मेदारी भी निभाई, जहां न्यायिक अधिकारियों के प्रशिक्षण और कानूनी शिक्षा से जुड़े कार्यक्रमों का संचालन किया गया।
हाई कोर्ट में नियुक्ति से पहले वह नई दिल्ली स्थित साकेत कोर्ट की प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज थीं। यह पद दिल्ली की न्यायिक व्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण पदों में से एक माना जाता है और इस जिम्मेदारी को संभालना उनके अनुभव और क्षमता को दर्शाता है।
अलग-अलग तरह के मामलों में है व्यापक अनुभव
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने अपने करियर में केवल एक या दो तरह के मामलों तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने आपराधिक मामलों, पारिवारिक विवादों, महिला और बाल सुरक्षा से जुड़े मामलों, आर्थिक अपराध, धन शोधन, विशेष कानूनों के तहत दर्ज मामलों और मध्यस्थता से जुड़े विवादों की सुनवाई की है।
यही वजह है कि उन्हें कानून के कई क्षेत्रों में अनुभव रखने वाली न्यायाधीश के रूप में देखा जाता है। अदालतों में उनके सामने आने वाले मामलों की विविधता ने उन्हें अलग-अलग कानूनी पहलुओं को समझने और उन पर निर्णय देने का अवसर दिया। कानूनी विशेषज्ञ भी उन्हें एक ऐसी जज के रूप में देखते हैं जिनकी पकड़ कानून के विभिन्न क्षेत्रों पर मजबूत रही है।
विवाद समाधान की व्यवस्था को बढ़ावा देने में भी निभाई भूमिका
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा केवल पारंपरिक अदालतों तक ही सीमित नहीं रहीं। उन्होंने मध्यस्थता और वैकल्पिक विवाद समाधान व्यवस्था को बढ़ावा देने में भी योगदान दिया। न्यायपालिका में लंबे समय से यह प्रयास होता रहा है कि छोटे और आपसी सहमति से सुलझाए जा सकने वाले मामलों का निपटारा अदालत के बाहर ही हो सके, ताकि लोगों को जल्दी राहत मिले और अदालतों पर बोझ कम हो। जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ऐसे प्रयासों से जुड़ी रही हैं और न्यायिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भी सक्रिय भूमिका निभाती रही हैं।
दिल्ली हाई कोर्ट में नियुक्ति के बाद बढ़ी पहचान
करीब तीन दशक तक न्यायिक सेवा में काम करने के बाद 28 फरवरी 2022 को उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट का स्थायी न्यायाधीश नियुक्त किया गया। हाई कोर्ट में आने के बाद उन्होंने कई महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई की और उनकी कई टिप्पणियां राष्ट्रीय स्तर पर खबरों में भी रहीं। पर्यावरण, जनहित और सामाजिक मुद्दों से जुड़े मामलों में उनके विचारों को अक्सर मीडिया में प्रमुखता से जगह मिली। दिल्ली में हरित क्षेत्रों और बढ़ते प्रदूषण को लेकर की गई उनकी टिप्पणियां भी काफी चर्चा में रही थीं।
क्यों चर्चा में बनी हुई हैं जस्टिस नीना बंसल कृष्णा?
खान सर और अंजना ओम कश्यप के बीच चल रहा विवाद इस समय देश के सबसे चर्चित कानूनी मामलों में से एक बन चुका है। जैसे-जैसे इस मामले की सुनवाई आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे लोगों की दिलचस्पी अदालत की कार्यवाही और उससे जुड़े लोगों में भी बढ़ रही है। जस्टिस नीना बंसल कृष्णा का नाम इसी वजह से लगातार चर्चा में है। हालांकि उनकी पहचान केवल इस एक मामले तक सीमित नहीं है।
तीन दशक से अधिक के न्यायिक अनुभव, विभिन्न अदालतों में निभाई गई जिम्मेदारियों और कानून के कई क्षेत्रों में काम करने के कारण उन्होंने भारतीय न्यायपालिका में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। आज वह दिल्ली हाई कोर्ट की उन न्यायाधीशों में शामिल हैं जिनके पास निचली अदालतों से लेकर उच्च न्यायालय तक काम करने का व्यापक अनुभव है और जिनके फैसलों तथा टिप्पणियों पर कानूनी जगत की नजर बनी रहती है।
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