लालकिले से परिवारवाद पर निर्णायक जंग का संकल्प
लालकिले की प्राचीर से चाहे कोई भी प्रधानमंत्री हो, वह जहां देश को समावेशी संदेश देने की कोशिश करता है, वहीं दुनिया के सामने अपने देश के दर्प और सम्मान का बखान भी करता है। इसके साथ ही वह अपनी सरकार की आगामी नीतियों और कार्यक्रमों की झलक भी प्रस्तुत करता है।

इन अर्थों में देखें तो 76वें स्वतंत्रता दिवस के मुख्य समारोह में लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन सभी कसौटियों पर खरा और समावेशी भाषण दिया। लेकिन इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने एक और बड़ी बात कह दी। उन्होंने परिवारवाद पर जोरदार हमला बोला। इतना ही नहीं, उन्होंने इसे बुराई बताते हुए देश का सहयोग मांग लिया। इसका संदेश साफ है। संदेश यह कि आने वाले दिनों में राजनीति में गहरे तक पैठ चुकी इस बुराई से सरकारी स्तर पर भी निबटा जाएगा और भारतीय जनता पार्टी इससे राजनीतिक स्तर पर भी जूझेगी।
राजनीति में परिवारवाद पर प्रधानमंत्री मोदी का हमला कोई नई बात नहीं है। साल 2013 में भारतीय जनता पार्टी द्वारा प्रधानमंत्री पद के दावेदार बनाए जाने के बाद से ही उन्होंने परिवारवाद पर हमला तेज कर दिया था। चूंकि उन दिनों कांग्रेस सत्ता में थी और सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर भ्रष्टाचार के तमाम आरोप थे, इसलिए उन दिनों मोदी ने सीधे कांग्रेस के परिवारवाद पर हमला बोलते हुए, दामादजी शब्द को परिवारवाद की बुराई के प्रतीक के रूप में स्थापित कर दिया था।
इसके बाद से वे परिवारवाद पर लगातार हमले बोलते रहे हैं। लेकिन जिस तरह से उन्होंने लालकिले की प्राचीर से परिवारवाद पर हमला बोला है, उससे स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में भारत में राज्यों में हों या फिर 2024 का लोकसभा चुनाव, एक तरह से भारतीय जनता पार्टी का एजेंडा स्पष्ट हो गया है। अब पार्टी हर जगह इसे मुद्दा बनाएगी और इस बहाने राजनीति के क्षत्रपों के परिवारवाद पर निशाना साधेगी।
लालकिले पर प्रधानमंत्री ने अपने समावेशी भाषण में बड़ी चतुराई से राजनीति के परिवारवाद को जोड़ दिया। उन्होंने जो कहा, 'जब मैं भाई भतीजावाद, परिवारवाद की बात करता हूं तो लोगों को लगता है कि मैं सिर्फ राजनीतिक क्षेत्र की बात कर रहा हूं। दुर्भाग्य से राजनीति की इस बुराई ने हिन्दुस्तान की सभी संस्थाओं में परिवारवाद को पोषित कर दिया है। इससे मेरे देश की प्रतिभा को नुकसान होता है। मैं भाई भतीजावाद के खिलाफ जंग में युवाओं का साथ चाहता हूं।'
लालकिले से परिवारवाद पर हमला करते हुए प्रधानमंत्री ने बेशक राजनीति के साथ ही दूसरे क्षेत्रों में जारी परिवारवाद पर भी निशाना साधा, लेकिन यह भी सच है कि जब तक राजनीति से इस बुराई को दूर नहीं किया जाएगा, समाज के अन्य क्षेत्रों से इसे दूर करना आसान नहीं होगा। यह भी सच है कि अब सरकारी तंत्र में परिवारवाद गहरे तक जड़ें जमा चुका है।
सरकारी तंत्र का प्रभावी तबका अपने बच्चों को ऊंची नौकरियां दिलाने के लिए ऐसा इंटरव्यू बोर्ड गठित कराता है, जो उसके बच्चे के प्रति नरम रूख रखे और उदारतापूर्वक अंक देकर आगे बढ़ाए। सरकारी तंत्र में अब पक्की नौकरियां कम होती गई हैं। लेकिन यह भी सच है कि तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की अब भी अस्थायी तौर पर जितनी नौकरियों की जगह बनती हैं, उनमें सामान्य नागरिक को मौका कम मिलता है, उस दफ्तर विशेष में पहले से जमे लोग अपने परिवार और रिश्तेदारों के बच्चे-बच्चियों के लिए जुगाड़ कर लेते हैं।
उच्च न्यायपालिका में जो कॉलेजियम व्यवस्था है, उसे ध्यान में रखकर न्यायतंत्र के रसूखदार लोग अपने परिवारजनों की कानून की पढ़ाई और प्रैक्टिस शुरू कराते हैं और इसी व्यवस्था का फायदा उठाकर अपने बच्चों को उच्च न्यायपालिका में स्थापित करने में किंचित सफल भी हो जाते हैं।
राजनीति में परिवारवाद तो खुला खेल हो गया है। देश की सबसे पुरानी पार्टी में यह धारणा स्थापित ही हो गई है कि कांग्रेस को कोई एक रख सकता है तो वह गांधी-नेहरू परिवार का ही व्यक्ति हो सकता है। यही वजह है नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी होते हुए राजीव गांधी, संजय गांधी और सोनिया गांधी से लेकर राहुल गांधी में ही कांग्रेस की उम्मीद दिखती है। आगे प्रियंका गांधी से होते हुए यह बात उनके बच्चों तक जाने वाली है। दिलचस्प यह है कि उसका समर्थक वर्ग भी राजतंत्र की प्रजा की भांति भक्तिभाव से इस परिवारवादी व्यवस्था के प्रति नतमस्तक नजर आता है।
रही बात क्षेत्रीय और छोटी राजनीतिक पार्टियों की, तो वे अब प्रोपराइटरशिप कंपनी की तरह चल रही हैं। समाजवादी पार्टी हो या राष्ट्रीय जनता दल या द्रविड़ मुनेत्र कषगम् , राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी हो या तेलंगाना राष्ट्र समिति या फिर वाइएसआर कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस हो या फिर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, इंडियन नेशनल लोकदल हो या तृणमूल कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा हो या फिर तेलुगू देशम, या जनता दल सेक्युलर, देश में जिधर भी नजर दौड़ाइए, सभी स्थानीय और क्षेत्रीय पार्टियों पर उनके संस्थापकों के परिवार या बेटे-बेटियों का कब्जा है।
दिलचस्प यह है कि इनके समर्थक वर्ग को भी अपनी पार्टी का तारण परिवारों के लोगों में ही नजर आता है। चाहे वे कितने भी अयोग्य, अनपढ़ या भ्रष्ट क्यों ना हों। उन्हीं पार्टियों में एक से एक दिग्गज और तपे-तपाए लोग हैं। लेकिन वे कभी नेतृत्व नहीं कर सकते। उनकी नियति सिर्फ लोकतांत्रिक राजतंत्र का गुणगान करना और उसका कृपापात्र बनना भर रह गया है।
इसमें दो राय नहीं है कि इस लोकतांत्रिक राजतंत्र या कुलीनतंत्र की वजह से भ्रष्टाचार को बढ़ावा भी खूब मिला है। आखिर क्या वजह है कि ज्यादातर पार्टियों के संस्थापक भड़भूजा फांककर जी रहे थे, लेकिन सत्ता में आने के बाद उनके परिवार की संपत्ति में हजारों नहीं, लाखों गुना का अंतर आ गया। सवाल यह है कि इस पर जब भी सवाल उठता है तो इन पार्टियों का समर्थक वर्ग इसे बदले की कार्रवाई मानता है, भले ही वह खुद अपमान और गरीबी में ही जीने को अभिशप्त हो।
लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री ने बड़ी समझदारी से परिवारवाद पर निशाना साधने के साथ ही भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया और इस तरह यह जताने की कोशिश की कि परिवारवाद और भ्रष्टाचार एक सिक्के के ही दो पहलू हैं। उन्होंने कहा, कि अगर समय रहते हम नहीं चेते तो हमारी चुनौतियों, विकृतियों, बीमारियों के कारण 25 साल के अमृत काल में विकराल रूप ले सकते हैं। इनमें दो विकृतियां शामिल हैं, भ्रष्टाचार और परिवारवाद।
प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले से जो कहा, उस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, 'भारत जैसे लोकतंत्र में लोग गरीबी से जूझ रहे हैं। एक तरफ वे लोग हैं, जिनके पास रहने के लिए जगह नहीं है। दूसरे वे लोग हैं, जिनके पास लूटी हुई रकम रखने की जगह नहीं है। हमें भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना है। जो लोग पिछली सरकारों में बैंकों को लूट लूट कर भाग गए, हम उनकी संपत्ति जब्त कर रहे हैं। कई लोग जेल में हैं। हमारी कोशिश है कि जिन लोगों ने देश को लूटा है, उनके लिए ऐसी स्थिति बनाई जाए कि उन्हें लूटा हुआ पैसा लौटाना पड़े। भ्रष्टाचार देश को दीमक की तरह खोखला कर रहा है मुझे इसके खिलाफ लड़ना है। मुझे इसके खिलाफ लड़ाई को तेज करना है। मुझे 130 करोड़ भारतीयों का साथ चाहिए, ताकि मैं इस भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ सकूं।'
प्रधानमंत्री को भान है कि राजनीतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ चेतना राजनीतिक दलों के समर्थकों की उस परिवार के प्रति सहानुभूति के चलते नहीं जाग पाती, शायद यही वजह है कि उन्होंने कह दिया कि उनके लिए चिंता का विषय है कि देशवासियों में भ्रष्टाचार के खिलाफ नफरत तो दिखती है, लेकिन भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कोई चेतना नहीं दिखती। प्रधानमंत्री ने लालकिले के अपने भाषण से यही चेतना जगाने की कोशिश की है।
यह पहला मौका नहीं है, जब उन्होंने राजनीति में परिवारवाद पर हमला बोला है। अभी कुछ ही महीने पहले पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के गांव में हुए एक समारोह को संबोधित करते हुए परिवारवाद पर हमला बोला। हैदराबाद में हुई भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में भी उन्होंने परिवारवाद पर निशाना साधा। उत्तर प्रदेश के हालिया विधानसभा चुनाव हों या फिर कोई अन्य चुनाव हर बार उन्होंने परिवारवाद पर जोरदार हमला बोला। लेकिन लालकिले से बोलने का विशेष महत्व है। लालकिले से बोलने का मतलब है कि अब प्रधानमंत्री इस बुराई के खिलाफ निर्णायक लड़ाई की मन:स्थिति में हैं। जाहिर है कि आने वाले दिनों में इसके नतीजे और गहरे दिखेंगे।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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