इंडिया गेट से : ठाकरे परिवार रहित शिवसेना का राजनीतिक महत्व
शिवसेना को तोड़ कर उद्धव ठाकरे का घमंड तोड़ना भाजपा की प्राथमिकता बन गई थी। शिवसेना विधायक दल के बाद अब शिवसेना संसदीय दल भी टूट गया है। शिवसेना के 18 में से दो तिहाई 12 सांसदों ने 18 जुलाई को लोकसभा स्पीकर को लिखित में सूचना दे दी कि उन्होंने राहुल शिवाले को अपना नेता चुना है और भावना गवली मुख्य सचेतक बनी रहेगी। शिवसेना की 19वीं सांसद कालाबेन देलकर शिवसेना के टिकट पर नहीं जीती थीं, इस लिए तकनीकी तौर पर शिवसेना के सदन में 18 सदस्य ही हैं।

इसलिए दलबदल क़ानून के तहत स्पीकर एक-आध दिन में औपचारिकता पूरी कर के शिंदे गुट को शिवसेना की मान्यता दे देंगे। इस के बाद चुनाव आयोग में शिवसेना के चुनाव निशान तीर कमान की लड़ाई शुरू होगी। दोनों सदनों के दो तिहाई सदस्यों को तोड़ना कोई आसान काम नहीं था। विधानसभा के 55 में 39 विधायक और लोकसभा के 18 सांसद तोड़ने के लिए भाजपा ने दिन-रात एक किया। ठाकरे परिवार रहित शिवसेना महाराष्ट्र में भाजपा के लिए भविष्य की राजनीति का रास्ता खोलती है, वहीं गैर भाजपा दलों कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस को भी सूट करती है।
शायद यह उद्धव ठाकरे और संजय राउत को अभी भी समझ नहीं आ रहा कि उन्होंने क्या गलती की। जबकि एक सामान्य समझ वाला व्यक्ति भी समझ सकता है कि हर निर्वाचित प्रतिनिधि को अगले निर्वाचन की चिंता होती है। उद्धव ठाकरे और संजय राउत दोनों ने कभी कोई चुनाव नहीं लडा। दोनों आज जो कुछ भी हैं, वे बाला साहेब ठाकरे की कृपा से हैं।
संसद के सेंट्रल हाल में बैठ कर कोई राजनीति का धुरंधर नहीं हो सकता, धुरंधर बनने के लिए जमीन पर जाना पड़ता है, लेकिन संजय राउत ने उद्धव ठाकरे के दिमाग में यह डाल रखा था कि वह राजनीति के धुरंधर हैं और भाजपा को सबक सिखा देंगे। जबकि चुनाव लड़ने वाले विधायक और लोकसभा सांसद यह जानते हैं कि उन की चाबी भाजपा-शिवसेना गठबंधन के पास ही है, क्योंकि दोनों का आधार हिंदुत्व है। अगर वे लोकसभा का चुनाव कांग्रेस एनसीपी के साथ मिल कर लड़ेंगे, तो भाजपा की जमीन ज्यादा मजबूत होगी, क्योंकि शिवसेना का हिंदुत्व आधारित वोट एकतरफा भाजपा को चला जाएगा।
ऐसा नहीं है कि चुने हुए विधायकों और सांसदों ने समय-समय पर उद्धव ठाकरे को यह बात नहीं समझाई। जब उद्धव ठाकरे कांग्रेस एनसीपी के साथ मिल कर सरकार बना रहे थे, तब भी विधायकों और सांसदों ने यह बात रखी थी, लेकिन उद्धव ठाकरे की आँखों पर संजय राउत का पर्दा पड़ा था।
शिवसेना विधायकों ने खून का घूँट पीकर गठबंधन स्वीकार किया था, क्योंकि जिन बाला साहेब ठाकरे की बदौलत वे विधायक बने हैं, उनका बेटा मुख्यमंत्री बन रहा था। लेकिन उनके दिमाग में शुरू से ही यह बात थी कि जैसे लालू-नीतीश का गठबंधन ज्यादा दिन नहीं चला, वैसे ही यह गठबंधन भी जल्द ही टूट जाएगा और दुबारा भाजपा के साथ गठबंधन होगा। उद्धव ठाकरे चाहते तो ढाई साल खत्म होते ही नीतीश कुमार की तरह पलटी मार कर अपने विधायकों और सांसदों के अगले चुनाव को सुरक्षित करते।
जब ढाई साल बाद भी उद्धव ठाकरे सत्ता से चिपके रहे तो विधायकों ने उनका लिहाज करना छोड़ कर अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित करने के लिए उद्धव ठाकरे और संजय राउत को अलग-थलग करने का फैसला किया। एकनाथ शिंदे की रहनुमाई में जब शिवसेना विधायक दल टूट रहा था, तब शिवसेना के सांसद भी टूट रहे थे। वे अब तक अलग इसलिए नहीं हो रहे थे, क्योंकि इसकी तुरंत जरूरत नहीं थी। अब जबकि संसद का मानसून सत्र शुरू हो चुका है तो आए दिन बिलों पर सदन में मतविभाजन के लिए व्हिप जारी होगा।
शिवसेना संसदीय दल के नेता संजय राउत ने लोकसभा की चीफ व्हिप भावना गवली को हटा कर राजन विचारे को चीफ व्हिप बनाने की लिखित सूचना दी थी, लेकिन अब 18 में से 12 सांसदों ने लिख दिया है कि उनके नेता राहुल शिवाले और चीफ व्हिप भावना गवली ही है, तो स्पीकर जब इन 12 सांसदों को शिवसेना की मान्यता दे देंगे, तो भावना गवली का व्हिप ही मानी होगा, तब बाकी बचे उद्धव गुट के छह सांसदों विनायक राउत, अरविन्द सांवत, गजानन किर्तिकार, संजय जाधव, ओम निबालकर और राजन विचारे की सदस्यता दांव पर होगी। अब या तो वे भी मजबूरी में शिंदे गुट में मिल जाएंगे या व्हिप के उलंघन में सदस्यता को दाव पर लगा कर अपना राजनीतिक भविष्य चौपट करेंगे।
उद्धव ठाकरे के पास 20 दिन का लंबा समय था कि वह विधायकों व सांसदों की राय से फैसले लेने शुरू करके शिवसेना में अपनी हैसियत बनाए रखते और देर सबेर उन का भाजपा से दुबारा पैच-अप हो जाता। राष्ट्रपति पद के चुनाव में उन्होंने सांसदों की राय मान कर जब एनडीए उम्मीदवार द्रोपदी मुर्मू को वोट देने का फैसला किया था, तो इसे सही दिशा में उठाया गया पहला कदम माना गया था। इसके बाद संजय राउत को विपक्ष की बैठकों में जाने से रोक दिया जाता और उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में भी एनडीए उम्मीदवार का समर्थन कर दिया जाता तो धीरे-धीरे बात बननी शुरू हो जाती।
जैसे ही संजय राउत उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार का फैसला करने के लिए बुलाई गई विपक्ष की बैठक में गए और उन्होंने विपक्ष की उम्मीदवार को समर्थन का एलान किया, उसी क्षण तय हो गया था कि अब दो-तिहाई सांसद साथ लेकर शिंदे गुट संसदीय दल का नया नेता और चीफ व्हिप चुन लेंगे। अठारह जुलाई को 12 सांसदों ने लोकसभा स्पीकर को चिठ्ठी दे दी थी, इसके बावजूद उपराष्ट्रपति के लिए मारग्रेट अल्वा का पर्चा भरते समय संजय राउत मौजूद थे। पता नही किस गलतफहमी में वह अभी भी घमंड भरी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। सोमवार रात को जब बाजी उनके हाथ से निकल चुकी थी, तब भी उन्होंने ट्विट में कहा कि किया -"फन कुचलने का हुनर भी सीखिए, सांप के खौफ से जंगल नहीं छोड़ा करते।"
एकनाथ शिंदे कानूनी सलाह से पार्टी को विभाजित कर रहे हैं। अब उन्होंने पार्टी की नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी घोषित कर दी है, लेकिन उद्धव ठाकरे को पक्ष प्रमुख पद पर बरकरार रखा है। एकनाथ शिंदे खुद पार्टी प्रमुख बन गए हैं। उदय सामंत, गुलाब राव पाटिल, आढ़वराव पाटिल, विजय नाहटा और यशवंत जाधव को उपनेता नियुक्त किया गया है। उद्धव ठाकरे को पक्ष प्रमुख पद से तब हटाया जाएगा, जब चुनाव निशान पर दावे का मामला चुनाव आयोग पहुंचेगा।
संजय राउत अभी भी गलतफहमी में हैं और सुप्रीमकोर्ट पर आस लगा कर बैठे हैं कि वहां से सब ठीक हो जाएगा। इसलिए वह अभी भी सरकार को अवैध कह रहे हैं, जबकि दो-तिहाही विधायकों और सांसदों का टूटना दलबदल क़ानून में वैध है। अब उन्होंने यह तो मान लिया कि शिवसेना में शिंदे गुट है, लेकिन उन्हें पार्टी के फैसले लेने का हक नहीं है। संजय राउत शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादक भी है, और वह उसी के जरिए शिवसेना पर असली काबिज मान रहे हैं। सोमवार को सामना के संपादकीय में राउत ने शिंदे-फडनवीस सरकार की तुलना फिल्म 'एक दूजे के लिए' के पात्रों से की है।
(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)
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