IFFI 2022: सबका साथ, फिल्म इंडस्ट्री का विकास
IFFI 2022: इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया (IFFI) एशिया का सबसे पुराना फिल्म फेस्टिवल है और भारत का सबसे बड़ा व सबसे लंबा चलने वाला फिल्मी जमावड़ा भी।

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय से अब हर साल इसे गोवा में आयोजित किया जाता है। इस बार भी 20 नवंबर से शुरु हुआ फिल्म फेस्टिवल 28 नवंबर तक चलेगा। पूरे 9 दिन तक फिल्म जगत की हर एक विधा और भाषा से जुड़े संघर्षरत चेहरों से लेकर सुपर स्टार तक यहां अपनी हाजिरी लगाना जरूरी समझते हैं।
ऐसे में फिल्म जगत में मोदी को नापसंद करने वाले चेहरों में से कइयों को ऐसा अंदेशा था कि उनकी फिल्मों को शायद IFFI में जगह ना मिले, लेकिन 2014 से ऐसी आशंकाएं गलत साबित हुई हैं। 2022 के इंडियन पैनोरमा में पीएम मोदी के धुर विरोधियों की फिल्मों का चुना जाना ये बताता है कि केन्द्र सरकार इन मामलों में विचारधारा के आधार पर दखल नहीं देती है।
क्या आप यकीन करेंगे कि आरएसएस से जुड़े छात्र संगठन एबीवीपी के धुर विरोधी वामपंथी छात्र संगठन एसएफआई के छात्र नेता रहे एक निर्माता की फिल्म भी इंडियन पैनोरमा में चुनी जा सकती है? क्या आप यकीन कर सकते हैं इस बार तमिल सिनेमा के उस निर्देशक की फिल्म भी चुनी जा सकती है, जिसे जब मौका मिलता है पीएम मोदी पर अपनी भड़ास निकालता है?
क्या आप यकीन कर सकते हैं कि एक ऐसी फिल्म को IFFI में इंडियन पैनोरमा की सूची में जगह मिली है जिसमें एक बंगाली लेखक गुजराती बिजनेसमैन के धोखे को भांपकर उसको सबक सिखाता है? क्या आप मान सकते हैं कि इस बार IFFI के इंडियन पैनोरमा में ओपनिंग फिल्म वो कन्नड फिल्म चुनी गई है जिसमें एक दलित लड़की का एक आपत्तिजनक वीडियो वायरल होता है। उसके बाद उसके समर्थन में मुस्लिम टीचर और क्रिश्चियन एक्टिविस्ट आते हैं। यानी इस मूवी का मैसेज ये है कि हिंदू ही दलित लड़की के खिलाफ हैं। फिर भी यह मूवी इस बार फिल्म फेस्टिवल की ओपनिंग मूवी बनी है।
कुल मिलाकर ऐसी तमाम फिल्में इस बार ज्यूरी ने इंडियन पैनोरमा के लिए अलग अलग भाषाओं की चुनी हैं, जो बीजेपी के एजेंडे के खिलाफ लगती हैं, बावजूद इसके उन्हें ज्यूरी ने पास किया। 'जय भीम' को लेकर भी ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही थी कि इसको खारिज किया जा सकता है, लेकिन वो भी ज्यूरी ने चुन ली।
यहां तक कि ज्यूरी ने एक ऐसी बंगाली फिल्म भी चुनी है, जिसका हीरो ही TMC का सांसद है। देखा जाए तो कश्मीर फाइल्स या अखंडा जैसी गिनती की फिल्में हैं जो हिंदूवादी एजेंडे की संवाहक मानी जा सकती हैं।
सरकार का किसी तरह का दवाब ज्यूरी पर होता तो मनीष मूंदड़ा की फिल्म सिया का इंडियन पैनोरमा की ज्यूरी में होना आसान नहीं था, भले ही निर्देशक इसे ना माने लेकिन जानकार मानते हैं कि ये मूवी उन्नाव के रेप केस की कहानी है। इसी तरह सऊदी वेलक्का मलयालम की फिल्म टॉप 20 में चुनी गई है। उसमें भी एक सीन है, जिसमें हिंदी में बयान देने पर एक महिला कहती है कि हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा है, तो इस पर ऐतराज होता है। यूं इस सीन की जरूरत नहीं थी, लेकिन मलयालम या तमिल फिल्मों में आम है।
फिर भी ज्यूरी ने उसे टॉप मूवीज में रखा और इन सब बातों के बजाय फिल्म के विषय, मेकिंग, एक्टिंग, तकनीकी पहलुओं पर ध्यान दिया। इसी तरह महाश्वेता देवी को लेकर बनी बंगाली मूवी महानंदा को टॉप 20 भारतीय फिल्मों में चुना गया है, जबकि वो खुद वामपंथी पार्टियों से जुड़ी रही थीं। इस मूवी को एक पूर्व एसएफआई नेता ने प्रोड्यूस किया है।
इसी तरह तमिल मूवी कीडा के निर्देशक को भी धुर मोदी विरोधी के तौर पर जाना जाता है। मोदी सरकार में ही कुछ साल पहले एक और धुर मोदी विरोधी हिंदी पत्रकार की मूवी को ओपनिंग फिल्म बनाया गया था, जबकि इस बार की ओपनिंग फिल्म कन्नड़ की हदिनेलेन्टू थी। इस मूवी में दलित लड़की की मदद के लिए एक मुस्लिम टीचर और क्रिश्चियन एक्टिविस्ट का आना भी एजेंडे का हिस्सा लगता है। बावजूद इसके उसे इस ज्यूरी ने ओपनिंग फिल्म के तौर पर चुना।
तृणमूल सांसद वाली मूवी है बंगाली भाषा की टॉनिक जबकि गुजराती बिजनेसमैन व बंगाली राइटर के रोल वाली मूवी का नाम है स्टोरी टेलर। इस फिल्म में बंगाली राइटर का रोल बीजेपी सांसद परेश रावल ने किया है।
मोदी सरकार के आने के बाद IFFI में बड़े बदलाव हुए, खास तौर पर कोरोना के बाद दिल्ली फिल्म निदेशालय (DFF) को खत्म करके अब तक केवल फिल्म बाजार लगा रहे नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (NFDC) को जिम्मा सौंपा गया। इस बार की ओपनिंग सेरेमनी में इसका असर भी दिखा। अब तक इस सेरेमनी में बॉलीवुड के सितारे कार्यक्रम में हावी रहते थे लेकिन इस बार मराठी, बंगाली, साउथ के कई गानों पर परफॉर्मेंस आदि प्रमुखता से हुई। साथ में ओपेरा जैसे कुछ विदेशी परफॉर्मेंस भी हुए।
इससे IFFI का जो इंटरनेशनल लुक सामने आया,वो उसके मूल उद्देश्य को परिभाषित भी करता है। इस बार कोविड ब्रेक के बाद फिल्म बाजार भी लगा। पणजी के आईनॉक्स परिसर में भी एक दिन में ही इतनी भीड़ हो गई कि रजिस्ट्रेशन को रोकना पड़ गया।
यूं केंद्र और गोवा सरकार के संयुक्त प्रयास से होने वाला IFFI शुरू से ही अपने उदार रवैए के लिए जाना जाता है। लेकिन मोदी सरकार में जिस तरह से समर्थन विरोध की बजाय कला के तौर पर फिल्मों का चयन किया गया है उससे साफ है क्रिएटिव फील्ड के लोगों को सरकार किसी भी तरह के बंधन में बांध कर रखना नहीं चाहती।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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