Surha Tal: कैसे बचेगा बलिया का सुरहा ताल पक्षी विहार
उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िला स्थित जयप्रकाश नारायण पक्षी अभयारण्य (सुरहा ताल) में अतिक्रमण के चलते कभी भारी तादाद में पाए जाने वाले सारस, क्रेन, कैटल इग्रेट, लिटिल इगेट, मोर, ग्रे हैरान, पीले पैरों वाले हरे कबूतर अब नदारद हैं। वही साइबेरिया आदि जगहों से हजारों मील का सफर तय कर आने वाले रेडक्रस्टेड पोचार्ड, एशियन वुलीनेक, ग्रे हेरान, पर्पल हेरान, इंडियन पॉन्ड हेरान, ब्लैक क्राउन नाइट हेरान जैसे प्रवासी पक्षियों की आवक भी बहुत कम हो गई है।

जियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया, मुंबई नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी, और वाइल्ड लाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया की ओर से प्रकाशित एक ताजा रिपोर्ट में यह बात उभर कर आई है कि भारत में पक्षियों की 60% प्रजातियों की संख्या में भारी कमी आई है। वहीं स्टेट ऑफ इंडियाज बर्ड्स के ताजा अध्ययन के अनुसार पिछले 5 सालों में रैप्टर प्रवासी समुद्री पक्षी और बत्तखों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है। लगभग 30 हजार पक्षी प्रेमियों के आंकड़ों पर आधारित एक रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया है कि अगर यही स्थिति बनी रही तो सैंकड़ों पक्षी प्रजातियां धीरे-धीरे विलुप्त हो सकती हैं।
रिपोर्ट में 942 पक्षी प्रजातियों के मूल्यांकन में पाया गया कि 142 पक्षी प्रजातियां धीरे-धीरे समाप्त होने की कगार पर है। सुरहा ताल में लालसर पक्षी अब कभी नहीं दिखते। पखार, पिहुला, कर्म, मलकी, पुटियारी, कसाई, सारस, बदरटीका, अंजना, जाघील, गिरना प्रजाति के पंछियों में भी कमी आ गई है।
सुरहा ताल झील उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की सबसे बड़ी बाढ़ क्षेत्र की झील है। बताते हैं कि राजा सूरथ ने जहां तपस्या की थी। वहां गंगा और स्थानीय नाले के मिलन से एक नदी बहती थी। उसी नदी में स्नान करने से राजा और वैश्य को अनेक कष्टों से मुक्ति मिली थी, इसीलिए उसका नाम कष्टहर नाला पड़ा था, जो आज कटहर नाला के नाम से मशहूर है। विशाल ताल का नाम राजा सूरथ के नाम पर ही सुरहा ताल पड़ा था। राजा सूरथ ने इस ताल के नजदीक पांच शिव और शक्ति को समर्पित मंदिरों की स्थापना की, जिसमें शंकरपुर का भवानी मंदिर, बरमाईंन का ब्रह्माणी देवी मंदिर, असेगा का अशोक हरण नाथ महादेव, अवनी नाथ का मंदिर और बलखंडी नाथ महादेव का मंदिर शामिल है।
यह गंगा और घाघरा नदी के बीच के बाढ़ क्षेत्र में खादर से बनी एक धनुष झील की तरह है। लगभग 35 वर्गकिलोमीटर क्षेत्रफल में फैले सुरहा ताल को वर्ष 1991 में जयप्रकाश नारायण पक्षी अभ्यारण्य घोषित किया गया। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार पक्षी अभ्यारण्य विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों और जीवन के लिए अच्छा आवास प्रदान करते हैं। अच्छे भोजन और आवास की सुविधा के कारण पक्षियों की प्रजातियां सहज आती हैं।
सुरहा ताल अभ्यारण नीलगाय, एशियाई सियार, हनी बेजर, मछली पकड़ने वाली बिल्ली, ग्रे नेवला, बंगाल लोमड़ी, पांच धारीदार पाम गिलहरी, भारतीय कलगीदार शाही, रॉक अजगर चश्मा धारी कोबरा बंगाल मॉनिटर और कछुआ की कई प्रजातियां जैसे नदी कछुआ, तीन धारी छत वाला कछुआ, भारतीय आंख वाला कछुआ, लाल मुकुट वाला वाला कछुआ, भूरी छत वाला कछुआ, भारतीय छत वाला कछुआ, भारतीय तंबू कछुआ, चित्तीदार तालाब कछुआ, दक्षिणी भारतीय फ्लैपसेल कछुआ, बत्तख, भारतीय संकीर्ण सर वाले नरम खोल का कछुआ भारी तादाद में पाया जाता रहा है।
सुरहा ताल में सारस क्रेन, कैटल इग्रेट, लिटिल इगेट, मोर, ग्रे हेरोन पीले पैर वाले हरे कबूतर जैसी पक्षी प्रजातियां भी भारी मात्रा में रहती हैं। इसी तरह रेड क्रेस्टेड पोचार्ड, एशियन बुलीनेक, ग्रे हैरान पर्पल हैरान इंडियन पॉन्ड हैरान और ब्लैक क्राउन नाइट हैरान जैसी प्रवासी प्रजाति के पक्षियों का आना-जाना लगा रहता है।
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने विशिष्टता से लबरेज सुरहा ताल को पर्यटन हब के रूप में विकसित करने का न सिर्फ सपना देखा था बल्कि उसे अमली जामा भी पहनाया था। उनका मानना था कि सुरहा ताल के विकास से न केवल इस क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा बल्कि इससे उद्योग विहीन बलिया एक बड़े पर्यटक केंद्र के रूप में विकसित होगा और युवाओं को बड़े पैमाने पर रोजगार मिलेगा तथा जनपद की अर्थव्यवस्था भी सुदृढ़ होगी। लेकिन उनके सपने धरे के धरे रह गए। लोकनायक जयप्रकाश के नाम पर घोषित सुरहा ताल पंछी अभ्यारण के भीतर अतिक्रमण करते हुए जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय का निर्माण विस्तार धड़ल्ले से हो रहा है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा निर्माण पर रोक लगाये जाने के बावजूद प्रतिबंधित ताल की आद्र भूमि पर भवन बनाए जा रहे हैं।
मालूम हो कि वीरों के बलिदान की गौरव गाथा से अगली पीढ़ी को परिचित कराने के उद्देश्य से बसंतपुर में शहीद स्मारक बनाने की घोषणा की गई। इसके लिए शहीद स्मारक ट्रस्ट द्वारा बसंतपुर गांव की 74 एकड़ जमीन अधिकृत की गई। बाद में इसी में से 51 एकड़ जमीन सरकार द्वारा जननायक विश्वविद्यालय को आवंटित कर दी गई। इसमें से अधिकांश भूमि पक्षी अभयारण्य के हिसाब से प्रतिबंध क्षेत्र में आती है इसलिए पर्यावरणविदों द्वारा इसे लेकर समय-समय पर आपत्ति दर्ज कराई गई।
इसी वर्ष मार्च महीने में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने सुरहा ताल में पक्षी विहार की भूमि पर बनाए जा रहे प्रशासनिक भवन, शैक्षणिक भवन और 100 बिस्तरों वाले एससी एसटी छात्रावास के निर्माण पर रोक लगाते हुए बलिया के जिला अधिकारी और वन अधिकारियों को निर्देश दिया कि इको सेंसेटिव जोन का सीमांकन करके वहां से अतिक्रमण तत्काल हटाया जाए और पक्षी विहार की हदबंदी करते हुए साइन बोर्ड लगाएं जाए।
पक्षी प्रजातियों की संख्या में होने वाली गिरावट को रोकने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है जो उनके आवास भोजन और प्रजनन के साथ-साथ उनके अस्तित्व से संबंधित विभिन्न खतरों का समाधान कर सके। अर्ध भूमि वन घास के मैदान और तटीय क्षेत्रों जैसे महत्वपूर्ण पक्षी आवासों की पहचान करके उनकी सुरक्षा की जानी चाहिए। इन प्रयासों में पुनर्नवीकरण, आर्द्र भूमि बहाली और आवास संरक्षण भी शामिल होना चाहिए।
जल और वायु प्रदूषण के साथ-साथ अन्य स्रोतों से होने वाले प्रदूषण को भी नियंत्रित करना बेहद जरूरी है क्योंकि प्रदूषण पक्षियों की आबादी को सीधे या उनके भोजन स्रोतों के माध्यम से नुकसान पहुंचा सकते हैं। एक अध्ययन में यह बात निकाल कर आई है कि तेज गर्मी पक्षियों को अपना व्यवहार बदलने पर मजबूर कर रहे हैं जिससे वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की बजाय एक ही जगह रहना पसंद करने लगे हैं।
वहीं बेतहाशा शहरीकरण और मानवीय अतिक्रमण के चलते पशु पक्षियों के आवास नष्ट हो रहे हैं। पेड़ पौधों और जंगलों के नष्ट होने से वहां पाई जाने वाली प्रजातियां खत्म हो जाती हैं। संरक्षित क्षेत्र में किए जा रहे अतिक्रमण को दृढ़ता के साथ रोकने के उपाय किए जाएं। पक्षियों के प्रवास को सुविधाजनक बनाने के लिए वन्य जीव गलियारे स्थापित करने तथा प्रवासी पक्षियों की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग का रास्ता सहज बनाना होगा। कृषि वानिकी और जैविक खेती जैसी सतत कृषि प्रथाओं को प्रोत्साहित करने से पक्षियों को भोजन की उपलब्धता तो होती ही है उनके आवास के भी अवसर उपलब्ध होते हैं।
संकटग्रस्त पक्षी प्रजातियों की विलुप्ति के खतरे से बचने के लिए उनके शिकार पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए, ताकि कलरव के लिए आने वाले पंछी शिकारियों का निवाला न बन सके। इसके लिए सभी स्तर पर संरक्षण तंत्र विकसित किए जाने की जरूरत है नहीं तो शिकारियों की नजर केवल पंछियों पर ही नहीं पूरे के पूरे अभयारण्य को डकारने की है।












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