Opposition Unity: विपक्षी एकता का महाराष्ट्र मॉडल कितना व्यावहारिक?
"सकाल" के सर्वेक्षण ने राजनीतिक दलों में हलचल पैदा कर दी है। इसमें गैर भाजपा दलों के गठबंधन के बारे में चर्चा की गई है।
शरद परिवार के परिवार का एक अखबार है "सकाल"। महाराष्ट्र में बहुत प्रतिष्ठित अखबार है। पवार परिवार का होने के बावजूद इस अखबार में कई बार एनसीपी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने वाली खबरें छपी हैं, जो अखबार की विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा को बढाती हैं। अखबार ने अपनी छवि निष्पक्ष बनाए रखने की हमेशा कोशिश की है।
इस अखबार ने अभी एक सर्वेक्षण किया है, जिसने महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल ला दिया है| यह सर्वेक्षण महाराष्ट्र के राजनीतिक तापमान का थर्मामीटर माना जा रहा है, इसलिए हर राजनीतिक महफिल में इसकी चर्चा हो रही है।

23 जून की सर्वदलीय बैठक में इस सर्वेक्षण को सेम्पल के तौर पर पेश करके बताया जाएगा कि जैसे महाराष्ट्र में महाविकास अघाडी का गठबंधन है, क्या सभी राज्यों में गैर भाजपा दलों के गठबंधन बन सकते हैं? क्या राज्यों के आधार पर गैर भाजपा दलों में लोकसभा और विधानसभा सीटों का बंटवारा हो सकता है? यानि राज्य स्तर पर हर पार्टी की जमीनी स्थिति के आधार पर सीटों का बंटवारा हो| राष्ट्रीय दल होने के नाते किसी को ज्यादा सीटें न दी जाएं| विपक्ष के नेताओं का मानना है कि ऐसा होने पर सीटों का वास्तविक बंटवारा होगा, विपक्ष के वोट भी एक दूसरे को ट्रांसफर हो जाएंगे और भाजपा को सत्ता से बाहर करना आसान हो जाएगा।
1967 के लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनावों में कुछ कुछ ऐसी स्थिति बनी थी। उससे पिछले तीनों आम चुनावों में कांग्रेस को करीब तीन चौथाई सीटें मिलती रहीं थीं। लेकिन 1967 में उसे 520 के सदन में सिर्फ 283 सीटें मिल पाई थी, जो बहुमत से सिर्फ 22 सीटें ज्यादा थीं। कांग्रेस के वोट प्रतिशत में भी भारी गिरावट आई थी। 1952 में 45 फीसदी, 1957 में 47.78 फीसदी और 1962 में 44.72 फीसदी वोट मिले थे, लेकिन 1967 मे उसका वोट घटकर 40.78 फीसदी रह गया था| स्वतंत्र पार्टी के 44, भारतीय जनसंघ के 35, भाकपा के 23 और माकपा के 19 सांसद जीत कर आए थे| प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी को 23-23 सीटें मिली थीं। क्षेत्रीय पार्टियों के भी 43 उम्मीदवार जीते थे, जिनमें से 25 द्रमुक सांसद थे, 35 निर्दलीय भी जीत गए थे।
उस समय गुजरात, राजस्थान और ओडिशा में स्वतंत्र पार्टी ने कांग्रेस को झटका दिया तो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दिल्ली मे जनसंघ ने, जबकि बंगाल और केरल में कम्युनिस्टों से कड़ी चुनौती मिली| लेकिन यह सब तब इसलिए हुआ था कि कांग्रेस के खिलाफ एंटी इनकम्बेंसी व्याप्त हो चुकी थी। 1963 में फर्रुखाबाद से उपचुनाव में डॉ राम मनोहर लोहिया का जीतना, मीनू मसानी का गुजरात की राजकोट सीट से जीतकर लोकसभा पहुंचना और 1964 में मधु लिमये का बिहार की मुंगेर लोकसभा सीट से उपचुनाव जीतना एंटी इनकम्बेंसी का प्रमाण था।

तब तक विधानसभाओं के चुनाव लोकसभा के साथ ही होते थे, लोकसभा के साथ साथ विधानसभाओं में कांग्रेस का ग्राफ गिरा था। कांग्रेस कई राज्यों में सत्ता से बेदखल जरूर हो गई थी, लेकिन कोई और पार्टी भी इतनी सीटें नहीं जीत सकी थी कि अपने दम सरकार बना सके। तब समाजवादी नेता डॉ. लोहिया और जनसंघ के नेता दीनदयाल उपाध्याय ने गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया। देश के नौ प्रमुख राज्यों मे पहली बार गैर कांग्रेसी संविद यानि संयुक्त विधायक दल की सरकारें बनीं।
कांग्रेस से अलग होकर उत्तर प्रदेश में चौधरी चरणसिंह ने भारतीय क्रांति दल (बीकेडी) बनाया, ओडिशा में बीजू पटनायक ने कांग्रेस से बगावत कर उत्कल कांग्रेस का गठन किया, पश्चिम बंगाल में अजय मुखर्जी ने बांग्ला कांग्रेस बनाई, समाजवादियों और जनसंघ के साथ मिलकर बिहार में भी गैर कांग्रेसी खेमे के पुराने कांग्रेसी महामाया प्रसाद बाहर आकर मुख्यमंत्री बने। गैर कांग्रेसी दलों ने अपनी विचारधारा से ज्यादा व्यावहारिकता को अहमियत दी| इसीलिए कम्युनिस्ट, सोशलिस्ट, जनसंघी और स्वतंत्र पार्टी सबके सब एक मंच पर आए और गैर कांग्रेसी संविद सरकारें बनाने को तैयार हुए। आज के गैर भाजपा विपक्षी दल भी कुछ उसी तरह सोच रहे हैं, और अपनी अपनी विचारधारा को किनारे रख कर गैर भाजपावाद का नारा लगा रहे हैं।
महाराष्ट्र का चुनाव सर्वेक्षण विपक्षी दलों को यह संदेश देता है कि अगर इस सर्वेक्षण के मुताबिक़ ही कांग्रेस, एनसीपी और उद्धव शिवसेना में सीटों का बंटवारा होता है, तो वे गैर भाजपा के नारे के साथ आपस में वोटों का ट्रांसफर आसानी से करवा सकेंगे। सर्वेक्षण का नतीजा यह है कि कांग्रेस को 19.9 प्रतिशत, एनसीपी को 15.3 प्रतिशत, उद्धव शिवसेना को 12.5 प्रतिशत वोट मिलेंगे। इस हिसाब से 20 सीटें कांग्रेस लड़े, 15 सीटें एनसीपी लड़े और 13 सीटें उद्धव ठाकरे को मिलें| इस सर्वेक्षण को अगर हम नतीजों में बदलें, तो महाविकास अघाड़ी 48 में से 30 सीटें जीत सकता है। जबकि बाकी 18 भाजपा और शिंदे की शिवसेना को मिलेंगी| पिछ्ला लोकसभा चुनाव भाजपा और शिवसेना ने मिल कर लड़ा था, भाजपा को 27.84 प्रतिशत वोट और 23 सीटें मिली थी, शिवसेना को 23.50 प्रतिशत वोट और 18 सीटें मिली थी| कांग्रेस और एनसीपी ने मिल कर चुनाव लड़ा था, एनसीपी को 15.66 प्रतिशत वोट और 4 सीटें, जबकि कांग्रेस को 16.41 प्रतिशत वोट और सिर्फ एक सीट मिली थी| एक सीट एआईएमआईएम जीत गई थी।
अगर हम इस चुनाव सर्वेक्षण को सही मानें तो भाजपा को 27.84 से बढ़ कर 33.8 प्रतिशत और शिंदे की शिवसेना को 5.5 प्रतिशत वोट बताए गए हैं| अगर हम इसी चुनाव सर्वेक्षण को ही आधार मान लें तो भाजपा के वोटों में छह प्रतिशत की बढ़ोतरी हो रही है। लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान शिव सेना को हो रहा है, जिसके वोट 23 प्रतिशत से घट कर सिर्फ 12.5 प्रतिशत दिखाए गए हैं। एनसीपी वहीं की वहीं खड़ी है और कांग्रेस को साढ़े तीन प्रतिशत का लाभ बताया गया है। लेकिन सब से बड़ा मुद्दा यह है कि वोट प्रतिशत कभी सीटों में नहीं बदलता, कांग्रेस को पिछली बार 16.41 प्रतिशत वोटों के बावजूद एक सीट मिली थी और एनसीपी को 15.66 प्रतिशत वोटों पर 4 सीटें मिली थीं। इसलिए किसी राजनीतिक दल को राज्य में मिले वोट प्रतिशत कभी सीटें जीतने का पैमाना नहीं बनते।
जो विश्लेषक कांग्रेस, एनसीपी और उद्धव शिवसेना के वोटों को जोड़ कर 2024 की तस्वीर का मॉडल पेश करने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें यह भी देखना चाहिए कि भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ रहा है, और महाराष्ट्र में इस समय जो राजनीतिक परिस्थिति है, उसमें मतदाता राज्य सरकार को सामने रख कर अपना मत व्यक्त करता है, लोकसभा चुनाव को सामने रख कर मत व्यक्त नहीं करता। इसका आभास इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब इसी चुनाव सर्वेक्षण में प्रधानमंत्री के बारे में सवाल पूछा गया तो 42 प्रतिशत वोटरों ने मोदी के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने का समर्थन किया, जबकि 40 प्रतिशत ने नहीं कहा। आप देखिए कि मोदी के नाम पर भाजपा का 33.8 प्रतिशत का आंकड़ा सीधा 8 प्रतिशत छलांग लगा 42 प्रतिशत हो गया। इसका एक कारण यह है कि 2019 में शिवसेना को जो वोट मोदी के नाम पर मिला था, वह इस बार बिलकुल नहीं मिलेगा।
उद्धव सेना विधानसभा चुनावों में शिंदे सेना को पटकनी दे सकती है, उद्धव के मुकाबले शिंदे का जमीनी आधार नहीं है, लेकिन लोकसभा चुनावों में उद्धव शिव सेना अपनी करीब करीब सारी सीटें गवा देगी और जिन सीटों पर शिवसेना के उम्मीदवार नहीं होंगे, वहां शिवसेना का वोट भाजपा को जाएगा, विकास आघाड़ी को ट्रांसफर नहीं होगा। विपक्षी एकता का सारा दारोमदार वोट ट्रांसफर पर निर्भर करता है, और अगर 23 जून की बैठक में महाराष्ट्र का मॉडल विपक्षी एकता का आधार बनता है, तो वह व्यावहारिक नहीं है। इसलिए अगर 1967 की तरह की एकता राज्य स्तर पर चुनाव पूर्व हो जाती है (1967 में चुनाव पूर्व नहीं थी), तब भी लोकसभा में भाजपा के जीतने के ही चांस ज्यादा होंगे, भाजपा की कुछ सीटें भले ही घट जाएं।
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