Sengol in Parliament: राजदंड तो स्थापित हो रहा है, लेकिन 'राजा' को निमंत्रण क्यों नहीं?
नये संसद भवन में उस सेंगोल को स्थापित किया जा रहा है जो प्रतीकात्मक रूप से 1947 में सत्ता हस्तांतरण का राजदंड था। लेकिन इस अवसर पर उस 'राजा' को निमंत्रण नहीं दिया गया है जो सभी प्रशासनिक कार्यों की 'सील' या 'मोहर' है।

Sengol in Parliament: राजनीति अगर राज करने की नीति है तो इस राज के शीर्ष पर राजा होता है। राजा ही वह सील या मोहर है जिसके नाम पर राज्य की राजनीति संचालित होती है। 1947 में भारत को एक संप्रभु गणराज्य बनाने का जो कार्य हुआ उस समय भी संभवत: यह सवाल उन लोगों के मन में रहा होगा। बिना राजा के राज्य कैसे संचालित होगा? लेकिन सवाल यह भी जरुर उठा होगा कि लोकतंत्र में तो प्रजा ही राजा है तो फिर किसी और राजा की जरूरत क्या है?
फिर भी राजा विहीन राज्य की स्थापना नहीं की जा सकती थी। इसलिए राष्ट्रपति को प्रतीकात्मक राजा माना गया। वह सील या मोहर जिसके नाम पर समस्त राज काज संचालित होंगे। राज की समस्त शक्तियां उसमें निहित की गयीं और फिर उसके ही नाम पर उन शक्तियों का बंटवारा करते हुए मंत्रिमंडल, संसद, नौकरशाही और न्यायपालिका के कार्यों का बंटवारा हुआ। उन्हें राजा कहने की बजाय प्रथम नागरिक कहा गया लेकिन उनके लिए जिस प्रधान मंत्री को नियुक्त करने की व्यवस्था की गयी लोकतंत्र की अधिकांश कार्यदायी शक्तियां उसको प्रदान कर दी गयीं।
मोटे तौर पर भारत के संसदीय लोकतंत्र का यही स्वरूप है। बहुदलीय प्रणाली होने के कारण जिस दल का बहुमत होता है राष्ट्रपति उसे अपनी सरकार गठित करने के लिए बुलाते हैं। फिर वह दल अपने यहां संसदीय दल का एक नेता चुनता है जिसे राष्ट्रपति अपना प्रधानमंत्री नियुक्त करते हैं। उसके बाद राष्ट्रपति की अनुमति से ही प्रधानमंत्री अपनी मंत्रिपरिषद का गठन करते हैं। बीते 75 सालों से भारत में लोकतंत्र की यही राज्य प्रणाली संचालित हो रही है जिसके शिखर पर प्रतीकात्मक राजा के रूप में राष्ट्रपति विराजमान हैं। यह निर्विवाद सत्य है। इस पर कोई विवाद हो ही नहीं सकता।
अब आते हैं दूसरे तथ्य पर। स्वतंत्रता के अमृत काल में 28 मई को नये संसद भवन का लोकार्पण होने जा रहा है। इस लोकार्पण से पहले दो बातों की चर्चा सर्वाधिक है। पहली, विपक्ष की 19 पार्टियों द्वारा इस लोकार्पण से अपने आप को यह कहते हुए दूर रखने की घोषणा है कि लोकार्पण राष्ट्रपति के हाथ से होना चाहिए। दूसरी चर्चा उस सेंगोल की है जिसे राजदंड के रूप में लोकसभा कक्ष में स्थापित किया जाएगा।
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इसे संयोग ही कहा जाएगा कि अचानक से यह सेंगोल चर्चा में आ गया। हाल में ही वाराणसी में हुए तमिल संगमम में इस बात की चर्चा हुई थी कि 1947 में माउण्टबेटन ने प्रधानमंत्री नेहरु को जब शक्तियों का हस्तांतरण किया था तो एक राजदंड सौंपा था। यह राजदंड तमिलनाडु के एक मठ से लाया गया था। वह आजकल कहां है? पता चला कि यह प्रयागराज स्थित आनंद भवन म्यूजियम में नेहरु की निजी विरासत के रूप में सुरक्षित रखा हुआ है। अब क्योंकि तमिल संगमम् का उद्घाटन स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने किया था इसलिए यह नयी संसद के लोकसभा कक्ष तक कैसे पहुंचा, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है।
इस सेंगोल या राजदंड की कहानी यह है कि वॉयसरॉय लार्ड माउण्टबेटन रानी विक्टोरिया के प्रपौत्र थे। 1947 में सिर्फ कागजी लिखा पढ़त से ट्रांसफर ऑफ पॉवर हो जाए ये बात उन्हें कुछ जम नहीं रही थी। वो प्रतीकात्मक रूप से कुछ करना चाहते थे। अपनी यह दुविधा उन्होंने नेहरु के सामने रखी तो नेहरु ने इस समस्या का निदान सी. राजगोपालाचारी से पूछा। राजगोपालाचारी या राजाजी ने इस समस्या का समाधान चोल राजाओं की परंपरा में पाया। चोल राजा अपने उत्तराधिकारी को राजदंड देकर राज काज सौंपते थे। इसे सेंगोल कहा जाता था जो तमिल के एक शब्द सेम्मई से प्रेरित था। जिससे अर्थ बनता है सम्यक हाथों में हस्तांतरण।
राजाजी ने थिरुवारतुरई मठ से संपर्क किया। मठ चोला राजवंश से भी पांच सौ वर्ष पुराना है। मठ ने मद्रास के प्रसिद्ध स्वर्णकार उम्मीरी बंगारु चेट्टी से संपर्क किया। चांदी से बने सेंगोल पर सोने का पानी चढ़ाया गया जिसे मठ के उप महंत और विद्वान लेकर दिल्ली आये और इसे वाइसरॉय को सौंप दिया। वाइसरॉय ने अपने हाथों में इसे धारण करने के बाद दोबारा मठ के प्रतिनिधियों को वापस कर दिया। इसके बाद उस सेंगोल (राजदंड) को गंगाजल और मंत्रोच्चार से पवित्र करके मठ के उप आचार्य द्वारा 14 अगस्त 1947 की रात को पंडित जवाहरलाल नेहरु को सौंप दिया गया। इस राजदंड के शीर्ष पर नंदी विरामजमान हैं तो मध्य में श्री की प्रतीक लक्ष्मी जी को उकेरा गया है। ये दोनों ही प्रतीक समृद्धि को दर्शाते हैं। इस पर तमिल भाषा में लिखा है "यह हमारा आदेश है कि ईश्वर का प्रतिनिधि राजा स्वर्ग के समान शासन करे।"
लेकिन यह सेंगोल या उत्तराधिकार का राजदंड वायसरॉय द्वारा नेहरु को नहीं सौंपा गया। यह कार्य मठ से आये प्रतिनिधियों ने ही किया। लेकिन वायसरॉय जिस प्रतीकात्मक रूप में सत्ता का हस्तांतरण करना चाहते थे, वह कार्य संपन्न हो गया। उस समय तक राष्ट्रपति का निर्वाचन नहीं हुआ था। वायसरॉय ही गवर्नर जनरल के रूप में स्वतंत्रता के क्रांतिकारियों को जनता की सेवा की शपथ दिला रहे थे। इसलिए वायसरॉय के तुरंत बाद गवर्नर जनरल के पद पर एक ही व्यक्ति विराजमान थे और वो थे लुई माउण्टबेटन।
लार्ड माउण्टबेटन ने वायसरॉय के रूप में भले ही प्रतीकात्मक रूप से नेहरु को 'सम्यक उत्तराधिकार' का राजदंड सौंपकर सत्ता हस्तांतरण कर दिया हो लेकिन भारत को अभी अपने लिए लोकतंत्र की व्यवस्था बनानी थी। 1950 में जब संविधान बनकर तैयार हुआ और 26 जनवरी को उसे लागू किया गया तब जाकर हम कह सकते हैं कि हमारे लिए राज्य की रुपरेखा निर्मित हो पाई थी। तो क्या 26 जनवरी 1950 को राष्ट्रपति नियुक्त होने के बाद नेहरु ने वह राजदंड राष्ट्रपति या संसद को समर्पित कर दिया था?
नहीं। 1950 में सैंद्धांतिक रूप से राष्ट्रपति को भले ही भारत गणराज्य का सर्वोच्च प्रशासक या घोषित 'मोहर' मान लिया गया हो लेकिन 'उत्तराधिकार का राजदंड' नेहरु के पास ही रहा। यह उनके व्यक्तिगत कलेक्शन का हिस्सा हो गया। इसके पीछे यह तर्क दिया जा सकता है कि राष्ट्रपति तो मोहर है लेकिन उनकी शक्तियों का 'इस्तेमाल' तो प्रधानमंत्री ही करता है। इसलिए व्यावहारिक तौर पर भारत में लोकतंत्र का राजा तो प्रधानमंत्री ही कहा जाएगा।
अब इसी तर्क से अगर नये संसद भवन का प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटन को सही ठहाराया जाए तो किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए? राज काज से जुड़े जो व्यवहार संविधान में अलिखित रह गये उसके लिए हमें परंपरा पर ही निर्भर रहना होगा। कोई नया संसद भवन बने तो उसका उद्घाटन राष्ट्रपति करेगा इसका उल्लेख संविधान में नहीं है। यह लोकतांत्रिक मर्यादा और परंपरा का हिस्सा है। यह तो राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त प्रधानमंत्री के विवेक पर निर्भर करता है कि वो राष्ट्रपति को वह स्थान देते हैं या नहीं। राष्ट्रपति तो अपनी संवैधानिक शक्तियां प्रधानमंत्री को देकर मूकदर्शक बन गया है।
नये संसद भवन के उद्घाटन में निमंंत्रित न किये जाने पर राष्ट्रपति भी उसी तरह कुछ नहीं कहेंगी जैसे आधी सदी तक आनंद भवन में रखे राजदंड ने कुछ नहीं कहा। यह तो हमारे विवेक पर निर्भर है कि हम अपने 'राजा और राजदंड' का कितना सम्मान करते हैं। सेंगोल अब मोदी के हाथों में उसी तरह विधि विधान से सौंपा जाएगा जैसे 1947 में नेहरु को सौंपा गया था। नेहरु के निजी तहखाने से निकालकर अब उसे लोकसभा कक्ष में स्थापित किया जाएगा जहां 28 मई को वह लगभग विपक्ष विहीन उत्सव का मूक साक्षी बनेगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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