Hindi vs Urdu: बधाई दें या मुबारकबाद कहें?
नववर्ष पर वही पुराना हिंदी-उर्दू का सवाल फिर से उभर आया। ये बहस कुछ वैसी ही है जैसे स्वदेशी बनाम विदेशी की। गाँधी-मालवीय इत्यादि के समय से स्वदेशी के लिए चल रहे आन्दोलन आज भी रह-रह कर जोर पकड़ते हैं।

Hindi vs Urdu: क्या स्वदेशी वाले पूरी तरह सफल हो गए, या विदेशी प्रभाव भारत से पूरी तरह बाहर हो गया? नहीं ये तो घर की सफाई जैसा या कहिये नहाने जैसा काम है! एक दिन करके निश्चिन्त तो हुआ ही नहीं जा सकता। अपेक्षित ही है कि इसे हर दिन करना होगा।
कथित रूप से पूंजीपतियों के हाथों बिक गयी एनडीटीवी के ब्लॉग पर, किसी दौर का एक जाना माना नाम, अपने एक लम्बे से आलेख में बताता है कि उसे नए साल पर एक मित्र का फोन आया। जब उसने नए साल की बधाई जैसा कुछ कहा, तो उनके मित्र ने चुटकी ली, आप तो मुबारकबाद वाले हैं, ये बधाई क्यों? उन्होंने कथित तौर पर बताया कि दोनों शब्दों के अर्थ बिलकुल एक हैं। कहीं अगर अंतर है तो उनके दिमाग में है।
बात बिलकुल सही भी है। अंतर दिमाग में है, और इस अंतर का बना रहना आवश्यक है। अंतर का बना रहना आवश्यक क्यों है, इसके उदाहरण के लिए आप अहिंसा शब्द देखिये। ये परिचित शब्द है जिसका अर्थ समझने में किसी भारतीय को अधिक कठिनाई नहीं होगी। इस शब्द के अर्थ को उर्दू में प्रेषित करना चाहें तो क्या होगा? उर्दू में अलग से इसके लिए कोई शब्द नहीं आता।
थोड़े प्रयास से हो सकता है कि कुछ विद्वान इसके लिए नया शब्द गढ़ लें, लेकिन तब भी वो कुछ वैसा ही होगा जैसे हिंदी में सिगरेट को "श्वेतधूम्रदंडिका" कहना अथवा रेलवे स्टेशन को "धूम्रसकट- विश्रामालय" बना देने का प्रयास करना। भाषा का प्रवाह नदी के पानी जैसा ऊपर से नीचे नहीं होता। अभिजात्य शब्द गढ़कर आमजन को नहीं देते बल्कि उल्टा आमजन की भाषा पर थोड़े-बहुत सुधारों के साथ अभिजात्य मुहर लगाता है।
इसलिए जब अभिजात्य कहता है कि अंतर केवल दिमाग में है, तो उसका बोलना ही बेमानी है। यदि आमजन ने ये तय कर लिया है कि मस्तिष्क जिस तरह भाषा के शब्दों का अर्थ समझता है, वो अलग है, तो अभिजात्य के लिए सिर्फ "जी हुजूर" कहने का विकल्प बचता है। संस्कृति के उत्थान के परिवर्तन काल में ये होना ही था। अहिंसा जैसे ही अष्टांगयोग से जुड़े अन्य शब्दों जैसे अस्तेय और अपरिग्रह के अर्थ में भी यही होता दिखेगा।
इसका उल्टा "ईमानदारी" शब्द में कर लीजिये। आप भले ही इसका अर्थ निष्ठा लगाते रहें, चोरी-कपट न करने से जोड़ें, लेकिन वास्तविक "ईमानदारी" को उससे कोई लेना-देना ही नहीं। केवल एक इस्लामी किताब और उस किताब के पैगंबर पर जो निष्ठा होती है, वो "ईमान" कहलाती है। भारत में विविधताओं को केवल स्वीकारा ही नहीं जाता बल्कि उनका उत्सव मनाया जाता है। इसलिए भारत में "ईमानदारी" का उचित पर्यायवाची शब्द अधिक से अधिक निष्ठा किया जा सकता है, जो सभी स्थितियों में ठीक नहीं होगा।
भाषा को केवल मस्तिष्क की उपज मानते हुए लेखक महोदय आगे विष्णु खरे की किसी कविता "गुंग महल" का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। इस कविता का विषय था कि कभी अकबर के दरबार में इस बात पर बहस छिड़ी कि ईश्वरीय भाषा कौन सी है? पंडितों का कहना था कि देवभाषा संस्कृत है और मुल्लों की जिद थी कि अरबी होगी। जांच के लिए कुछ बच्चों को पकड़कर एक महल में बंद कर दिया जाता है। वहाँ कोई बोलता नहीं था तो बच्चे भी बोलना नहीं सीख पाए। जब उन्हें निकाला गया वो केवल गों-गों कर पा रहे थे।
वैसे तो अकबर जैसा क्रूर शासक ही बच्चों को उनके माता-पिता से अलग करके बंद करने की ऐसी क्रूरता कर सकता है, लेकिन करे भी तो संभवतः परिणाम ये नहीं निकलेंगे। मनुष्यों की बोलने की क्षमता का विकास होगा, और वो इस कविता जैसा गूंगा तो बिलकुल नहीं होगा।
भाषा पर विदेशी प्रभाव से जब आप मनुष्यों को इंसानियत या आदमियत सिखाना शुरू करते हैं, गलती तभी हो जाती है। भारत में आदमी किसी आदम-हव्वा की संतान नहीं होती। उसकी निष्ठा किसी अरब देश के रेगिस्तानों में बलात ले जाने का प्रयास क्यों हो? मनु-शतरूपा की संतानों को मनुष्य रहने देने में, उनमें मनुष्यता बची रहने देने पर इतनी आपत्ति तो किसी सांस्कृतिक उपनिवेशवादी को ही हो सकती है।
जब ऐसे किसी उपनिवेशवादी को विचारक माना जाने लगता है, तभी राष्ट्रवाद भी लुच्चों की अंतिम शरणस्थली (लास्ट रिफ्यूज ऑफ द स्काउन्ड्रल) लगने लगता है। बड़ा प्रश्न ये है कि विचारों को हमें किसी उपनिवेशवादी से उधार लेने की आवश्यकता ही क्या है? हमें अपनी परिभाषाएँ स्वयं गढ़नी होगी। जबतक शिकार की कथाएँ शिकारी सुनाएगा तबतक शेर का नहीं शिकारी का ही महिमामंडन होता रहेगा (चिनुआ अचेबे)।
यहाँ प्रश्न ये भी है कि क्या भाषाई शुचिता की ये समस्या एक दिन में सुलझ जाएगी? इसका उत्तर है नहीं, ये एक दिन का काम नहीं। ये गंगा की सफाई जैसा काम है। हमें हर दिन प्रयास करने होंगे। हर दिन कुछ नया कचरा इसमें आ मिलेगा और हर दिन किसी न किसी को अपने हाथ गंदे करने पड़ेंगे, ताकि सफाई जारी रहे। अगर कोई इसके लिए ये तर्क देता है कि वर्षों से ऐसा ही होता आया है और ऐसा ही होते रहने देना चाहिए, तो उसका तर्क माना नहीं जा सकता। जैसे 128 वर्ष पुराने सीसामऊ नाले से गंगा में गिरने वाले 14 करोड़ लीटर गंदे पानी को अब परिशोधन के बाद गंगा में छोड़ा जाता है, वैसे ही थोड़ा-थोड़ा करके इस काम को भी करना होगा।
जैसे "स्वदेशी की प्रशंसा करती पोस्ट भी चाइनीज मोबाइल से टाइप की गयी" का व्यंग पहले होता था, वैसे ही विदेशी को हटाकर स्वदेशी शब्दों की बात करने वालों पर अब भी व्यंग होंगे। मगर फिर जैसा अक्सर गाँधी जी के नाम से कहा जाता है - "पहले वो आपको अनदेखा करते हैं, फिर वो आपकी खिल्ली उड़ाते हैं, उसके बाद वो आपसे लड़ने आएंगे, और अंततः आप विजयी होंगे।"
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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