Hindi and Tamil Nadu: हिन्दी विरोध की गैर जरूरी तमिल राजनीति
हाल ही में संसदीय राजभाषा समिति ने अपना ग्यारहवां प्रतिवेदन राष्ट्रपति को सौंपा है। इस प्रतिवेदन में समिति ने केंद्रीय नौकरियों में हिन्दी को स्थापित करने, अधिकारियों के लिए हिन्दी की जानकारी बढ़ाने, सरकारी कामकाज बुनियादी रूप से हिन्दी में करने, उच्च और तकनीकी शिक्षण में हिन्दी को बढ़ावा देने के साथ ही सरकारी नौकरियों में अंग्रेजी की अनिवार्यता को खत्म करने का सुझाव दिया है।

इसके साथ ही समिति ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी की बढ़ती ताकत के संदर्भ में भी अपना सुझाव दिया है। समिति ने कहा है कि हिन्दी को संयुक्त राष्ट्रसंघ की भाषा बनाने के लिए सरकार को अपने प्रयास तेज करने चाहिए।
राजभाषा अधिनियम के तहत गठित बीस लोकसभा और दस राज्यसभा सांसदों वाली इस समिति को हर पांच साल में राजभाषा को लेकर अपनी रिपोर्ट देनी होती है। लेकिन इस समिति ने महज तीन साल में ही अपनी दूसरी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी है।
संसदीय राजभाषा समिति के पदेन अध्यक्ष केंद्रीय गृहमंत्री होते हैं। इस नाते अमित शाह इसके अध्यक्ष हैं। लेकिन इसके उपाध्यक्ष हैं भर्तृहरि महताब। महताब बुनियादी रूप से उड़ियाभाषी हैं और बीजू जनता दल के सांसद हैं। समिति से जिन संस्थानों का पाला पड़ा है, उनके प्रमुखों की राय में महताब हिन्दी और राजभाषा के अनन्य भक्त हैं।
बहरहाल समिति की इसी रिपोर्ट के खिलाफ पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम उबल पड़े हैं। संसदीय राजभाषा समिति की रिपोर्ट को लेकर जो तर्क उन्होंने दिए हैं, वे गैर हिन्दीभाषियों के लिए भड़काऊ हो सकते हैं।
उन्होंने कहा है कि संसदीय समिति भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिन्दी, हिंदू, हिंदुस्तान की परिकल्पना को बढ़ावा दे रही है। उन्होंने यहां तक कहा है कि समिति की रिपोर्ट स्वीकार करके गैर हिन्दीभाषी लोगों को केंद्रीय नौकरियों से वंचित करने की कोशिश की जा रही है। जैसा कि तमिल राजनीतिज्ञ अक्सर हिन्दी को लेकर जैसे आरोप लगाते हैं, वैसे कई और आरोप चिदंबरम ने लगाए हैं।
यहां याद आता है, चिदंबरम का 2010 को हिन्दी दिवस पर दिया भाषण, जिसमें उन्होंने कहा था, "हिन्दी आमजन की भाषा है और अब रोजी-रोटी की भाषा बन गई है। हमें आम लोगों तक उन्हीं की भाषा में पहुंचना चाहिए।"।
चिदंबरम् जब गृहमंत्री थे, उस नाते उस वक्त तब वे राजभाषा विभाग के भी प्रमुख थे। इस वजह से उन्हें तब हिन्दी में ताकत नजर आती थी, तब उन्हें हिन्दी लोक की भाषा दिखती है। तब उसमें सहज संवाद की गुंजाइश नजर आती थी। तब वह देश को एक सूत्र में जोड़ने वाली भाषा थी।
सवाल यह है कि क्या उस समय के चिदंबरम सही थे या अब के चिदंबरम की राय ठीक है? सवाल यह भी उठता है कि क्या हिन्दी सचमुच ऐसी है कि अगर केशवचंद्र सेन, तिलक, गांधी और विनोबा के सपनों के मुताबिक उसे देश की आधिकारिक भाषा देने की व्यवस्था को अमलीजामा पहनाया जाए तो वह दूसरी भाषाओं को खा जाएगी?
हिन्दी की बात जब भी होती है, दक्षिण के विरोध का खूब हवाला दिया जाता है। कर्नाटक और केरल से भी इक्का-दुक्का आवाजें इस संदर्भ में उठती हैं। इस कोरस गान में कभी-कभी उत्तर पूर्व भी शामिल हो जाता है। लेकिन ये आवाजें सिर्फ रस्मी ही लगती हैं।
हां, तमिल राजनीति अपने राजनीतिक जीन के चलते इस राग को अलापने के लिए अपना समूचा सुर लगा देती है। इसकी वजह यह है कि जब 1937 में राजगोपालाचारी ने मद्रास प्रांत के प्रीमियर के नाते हिन्दी को लागू किया तो उसका विरोध सी ए अन्नादुरै ने किया।
जब संविधान के मुताबिक, हिन्दी को 26 जनवरी 1965 को राजभाषा का आधिकारिक स्थान ग्रहण करना था तो इसके ठीक एक दिन पहले 25 जनवरी 1965 को तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति इसके खिलाफ उतर आई थी।
तब तमिलनाडु में जगह-जगह इसके विरोध में काले झंडे फहराये गए थे। जब लोहिया ने अंग्रेजी हटाओ का नारा दिया तो उसे तमिलनाडु में हिन्दी थोपने के रूप में लिया गया और तब भी हिन्दी विरोध में तीव्र आंदोलन हुआ। हिन्दी के खिलाफ नई शिक्षा नीति लागू होते वक्त 1986 में भी तमिल राजनीति उबाल पर रही। इस बार भी तमिलनाडु विरोध में उतर आई है। तमिलनाडु विधानसभा ने बाकायदा संसदीय राजभाषा समिति की रिपोर्ट के खिलाफ प्रस्ताव पास किया है।
तमिलनाडु की स्थानीय राजनीति में हिन्दी विरोध वोट बैंक की खेती है। हालांकि हिन्दी को लेकर राज्य में भी स्थिति बदली हुई है। देश में बड़ी और अखिल भारतीय नौकरियां करने के इच्छुक लोग और अपने बच्चों को देश में आगे बढ़ाने की चाहत रखने वाले लोग भी इन दिनों अपने बच्चों को हिन्दी पढ़ा रहे हैं।
तमिलनाडु में हिन्दी विरोध में जो द्रविड़ राजनीति हमेशा आगे रहती है, उसके वर्तमान प्रमुख एम के स्टालिन के तमिलनाडु में कई प्रतिष्ठित स्कूल चलते हैं, और हर स्कूल में हिन्दी भी पढ़ाई जाती है। इन स्कूलों की फीस बड़ी ऊंची है। लेकिन स्टालिन हिन्दी विरोधी बयान देने से कभी नहीं चूकते। तमिलनाडु में हिन्दी विरोध का एक चेहरा यह भी है।
तमिलनाडु में हिन्दी विरोध निश्चित तौर पर अतीत में बहुत बड़ा मुद्दा रहा है। हिन्दी यहां के लिए संवेदनशील मुद्दा है। लेकिन सच यह भी है कि यहां हिन्दी को लेकर सोच बदल रही है। उत्तर भारत के हिन्दीभाषी राज्यों की जैसी शैक्षिक हालत है, वह छुपी नहीं है। इसकी वजह से दक्षिण भारतीय राज्यों में पढ़ाई के लिए उत्तर भारतीय छात्रों की आवक बढ़ी है। इसमें कर्नाटक और तमिलनाडु आगे है।
सवाल यह है कि इन छात्रों से संपर्क में आने के लिए क्या दक्षिण भारतीय लोगों को हिन्दी की जरूरत नहीं पड़ती है? निश्चित तौर पर इसका जवाब ही तमिलनाडु में हिन्दी को लेकर हो रही राजनीति का उत्तर है।
यह भी सच है कि केरल की राजनीति हिन्दी के विरोध में तमिल राजनीति की तरह नहीं खड़ी रही है। कमोबेश यही हाल आंध्र और तेलंगाना का भी है। शायद यही वजह है कि करीब तीन दशक पहले भी केरल के हिन्दी विद्वान एनई विश्वनाथन अय्यर पूरे आत्मविश्वास से हिन्दी के समर्थन में अपनी बात रख पाते थे।
संसदीय राजभाषा की समिति की रिपोर्ट के बाद भले ही राजनीतिक आसमान में गर्द उड़ाकर भाषा के संदर्भ में सियासी नजारे को धुंधला बनाने की कोशिश हो रही हो, लेकिन जिस तरह हिन्दी मजबूत कदमों से आगे बढ़ रही है, जिस तरह उदारीकरण से उभरे बाजार और सोशल मीडिया के नए मंचों ने उसे ताकत दी है, वह देश की सर्वमान्य भाषा बनेगी, राजनीति उसकी राह में कुछ पल के लिए भले ही रोड़े अटका ले।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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