Himachal Pradesh: हिमाचल में कांग्रेस सरकार बची, लेकिन कितने दिन?

Himachal Pradesh: कहा जा रहा है कि हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बच गई है, लेकिन यह पूरा सच नहीं है| पूरा सच यह है कि स्पीकर ने अपने पद का दुरूपयोग करके सरकार को फिलहाल राहत पहुंचाई है|

इस राहत की वजह से कुछ समय के लिए युद्धविराम हुआ है| युद्ध बंद नहीं हुआ है| खुद हिमाचल प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष प्रतिभा सिंह मौजूदा स्थिति को अंतिम नहीं मानती| संकट की इस घड़ी में वीरभद्र सिंह की पत्नी और मंडी लोकसभा सीट से सांसद प्रतिभा सिंह को एकदम किनारे कर दिया गया था, जिससे उनके बेटे विक्रमादित्य सिंह का यह आरोप सही साबित हो गया कि उनके परिवार की अनदेखी की जा रही है|

himachal congress crisis

सुक्खू सरकार ने दस जनपथ (सोनिया गांधी का आवास) के इशारे पर शिमला के रिज पर वीरभद्र सिंह की मूर्ति लगाने की इजाजत नहीं देकर उनके परिवार के साथ खुद टकराव मोल लिया है| वीरभद्र सिंह जब तक जीवित थे, दस जनपथ उनका कुछ नहीं बिगाड़ सका| वीरभद्र सिंह जब 2012 से 2017 तक आख़िरी बार मुख्यमंत्री थे, तो उनकी दस जनपथ से खटपट शुरू हो गई थी|

सोनिया गांधी ने उनके विरोधी रहे सुखविंदर सिंह सुक्खू को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया था| जिस पर 2017 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हिमाचल कांग्रेस में घमासान शुरू हो गया| सोनिया गांधी के इशारे पर प्रदेश कांग्रेस की प्रभारी अंबिका सोनी ने सुक्खू को ज्यादा तरजीह देना शुरू कर दिया था, जो मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को रास नहीं आ रहा था|

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वीरभद्र लगातार सुक्खू को हटाने की मांग कर रहे थे, उन्होंने सुक्खू के साथ मुलाक़ात से भी इनकार कर दिया था| वह इतने खफा थे कि उन्होंने सोनिया गांधी को चिठ्ठी लिखकर साफ कह दिया था कि अब वह ना तो खुद चुनाव लड़ेंगे और ना ही चुनाव लड़वाने की जिम्मेदारी लेंगे|

तब अहमद पटेल ने बीच बचाव किया तो वीरभद्र सिंह ने अंबिका सोनी के घर पर सुक्खू से मुलाक़ात की| इस बैठक में अहमद पटेल ने वीरभद्र सिंह को आश्वासन दिया कि अगले चुनाव की जिम्मेदारी उन पर ही है, और वे ही कांग्रेस का चेहरा होंगे, बस सुक्खू को अध्यक्ष बने रहने दीजिए, वह आपके हिसाब से ही चलेगा, तब जा कर वीरभद्र सिंह माने थे|

हालांकि हिमाचल प्रदेश में एक बार भाजपा, एक बार कांग्रेस की रिवायत जारी रही और 2017 के चुनाव में भाजपा जीत गई, इसी बीच 2020 में वीरभद्र सिंह का देहांत हो गया| लेकिन उनका नाम इतना बड़ा था कि दस जनपथ चाह कर भी उनकी उपेक्षा नहीं कर सकता था|

मंडी लोकसभा सीट से भाजपा के निर्वाचित सांसद राम स्वरूप शर्मा का निधन हो गया, तो कांग्रेस ने इस सीट को जीतने के लिए वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह को चुनाव मैदान में उतारा, वह सफल भी रही| यह आश्चर्यजनक था, क्योंकि हिमाचल प्रदेश और केंद्र, दोनों जगह भाजपा की सरकार थी, लेकिन मंडी लोकसभा सीट का उपचुनाव प्रतिभा सिंह जीत गई|

वीरभद्र सिंह की लोकप्रियता और उनकी विरासत का लाभ उठाने के लिए कांग्रेस ने 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले प्रतिभा सिंह को ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया| लेकिन विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद वीरभद्र सिंह के विरोधी रहे सुखविंदर सिंह सुक्खू को मुख्यमंत्री बना दिया|

मुख्यमंत्री के चयन के समय भी प्रदेश कांग्रेस में बहुत बवाल हुआ था| वीरभद्र समर्थकों की मांग थी कि प्रतिभा सिंह को मुख्यमंत्री बनाया जाए, अगर उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाता, तो उनके बेटे विक्रमादित्य सिंह को उपमुख्यमंत्री बनाया जाए| लेकिन दोनों ही बातें नहीं हुई| जिससे वीरभद्र सिंह के परिवार में असंतोष कायम हो गया|

इस असंतोष की पहली झलक तब मिली थी, जब विक्रमादित्य सिंह ने श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर में रामलला के विग्रह में प्राण प्रतिष्ठा का न्योता स्वीकार करते हुए आरएसएस और विश्व हिन्दू परिषद का आभार जताया| वह प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल भी हुए, जहां उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने उन्हें राज्य अतिथि का दर्जा दिया था|

कांग्रेस ने राज्य से बाहरी अभिषेक मनु सिंघवी को हिमाचल प्रदेश की राज्यसभा सीट से उम्मीदवार बना कर वीरभद्र सिंह के परिवार को दस जनपथ पर पहला हमला करने का मौक़ा खुद दिया| मुख्यमंत्री सुक्खू इस आने वाले संकट को भांप गए थे, इसलिए उन्होंने सोनिया गांधी से आग्रह किया था कि अगर किसी स्थानीय को उम्मीदवार नहीं बनाना है, तो वह खुद हिमाचल से उम्मीदवार बनें, लेकिन सोनिया गांधी भी कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी|

भाजपा ने सिर्फ 25 विधायक होने के बावजूद जब कांग्रेस से भाजपा में आए वीरभद्र सिंह के ही वफादार रहे हर्ष महाजन को चुनाव मैदान में उतारा तभी समझ आ गया था कि पर्दे के पीछे से वीरभद्र समर्थक कांग्रेसी विधायकों का समर्थन मिल चुका है| छह विधायकों की क्रास वोटिंग के बाद जिस तरह विक्रमादित्य सिंह ने मंत्री पद से इस्तीफा दिया, उससे संकेत मिल गया था कि सिर्फ छह नहीं, कुछ अन्य विधायक भी पाला बदल कर सुक्खू सरकार गिराने का मन बना चुके हैं|

इसलिए विधानसभा स्पीकर कुलदीप सिंह पठानिया ने विपक्ष के 15 विधायकों को सस्पेंड करके आनन फानन में बजट पास करवाया, और विधानसभा को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया| विपक्ष अगर 28 फरवरी को ही अविश्वास प्रस्ताव ले आता, तो सरकार गिरना तय थी| स्पीकर ने सरकार को बचाने के लिए बड़ी तीव्रता से और होशियारी से काम किया|

सदन को अनिश्चितकाल तक स्थगित करने के बाद उन्होंने क्रास वोटिंग करने वाले छह विधायकों की सदस्यता रद्द कर दी| दलबदल क़ानून के अंतर्गत 24 घंटे में फैसला सुना कर हिमाचल के स्पीकर ने रिकार्ड बना दिया| हालांकि उनका फैसला कोर्ट में टिकने वाला नहीं है, क्योंकि राज्यसभा चुनाव में व्हिप जारी नहीं किया जाता, क्रॉस वोटिंग करने वालों पर पार्टी कार्रवाई करती है, लेकिन उसकी सदस्यता आज तक तो कभी भी रद्द नहीं गई थी| यह नया मामला है, जब राज्यसभा के चुनाव में व्हिप जारी किया गया, और उसके आधार पर स्पीकर ने सदस्यता रद्द कर दी|

अब सदन 68 से घटकर 62 का रह गया है, और कांग्रेस के सदस्य 34 रह गए हैं| यानी स्पीकर को निकाल दें, तो सिर्फ दो सदस्यों का बहुमत बचा है| उधर भाजपा के पास तीन निर्दलियों समेत 28 विधायक हैं| विक्रमादित्य सिंह चार विधायक भी साथ ले आएं, तो सरकार गिर सकती है| स्पीकर के फैसले के खिलाफ छह विधायक कोर्ट का रूख कर चुके हैं| अब सब कुछ कोर्ट के हाथ में है, अगर कोर्ट ने स्पीकर के फैसले पर स्टे लगा दिया, तो विधानसभा का सत्र बुलाने की मांग की जाएगी|

हालांकि विपक्ष के कहने पर या तीन निर्दलीय विधायकों के कहने पर राज्यपाल मुख्यमंत्री को बहुमत साबित करने के लिए नहीं कह सकते| ऐसी ही स्थिति में महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी ने उद्धव ठाकरे को बहुमत साबित करने को कहा था, तो सुप्रीमकोर्ट ने उनकी आलोचना की थी|

महाराष्ट्र के राज्यपाल ने विपक्षी दल भाजपा और निर्दलियों के कहने पर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से बहुमत साबित करने को कहा था| स्पीकर की तत्परता से सुक्खू सरकार को विधानसभा के अगले सत्र तक जीवनदान मिल गया है| लेकिन छह विधायकों को कोर्ट से राहत मिले या न मिले, सुखविंदर सुक्खू की सरकार का गिरना तय है|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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