Modi on Manipur: क्या बीजेपी को भारी पड़ गयी मणिपुर पर मोदी की चुप्पी?
Modi on Manipur: मई के पहले हफ्ते में मणिपुर में शुरु हुई ताजा हिंसा के करीब डेढ़ महीने बाद 21 जून को अचानक से कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी का एक वीडियो संदेश जारी किया जाता है। सवा दो मिनट के इस वीडियो संदेश में वो मणिपुर में जारी हिंसा पर चिंता व्यक्त करती हैं और सभी धर्मों के साथ मिलजुलकर रहने की याद दिलाती हैं। लेकिन अपने इस वीडियो संदेश में वो मणिपुरी महिलाओं की हिम्मत की प्रशंसा करती हैं। यह थोड़ा सा चौंकानेवाला था। मणिपुर में जो हिंसा हो रही थी उसमें मुख्य रूप से कुकी और मेइती जनजाति के बीच ही हिंसा की खबरें आ रही थीं।
उस समय तक हिंसक प्रदर्शनों, आगजनी, गोलीबारी के बाद भी 'ब्रेव मदर्स' वाला कोई एंगल सामने नहीं आया था। फिर सोनिया गांधी के पास ऐसा क्या इन्पुट था जो अचानक से ही वो मणिपुर पर न सिर्फ बयान देने के लिए सामने आती हैं बल्कि ब्रेव मदर्स का जिक्र भी करती हैं? दिल्ली में जो महिलाएं अपनी बात सबके सामने रखने के लिए आ रही थीं वो सब मेइती समुदाय की महिलाएं थीं और बार बार न केवल मीडिया बल्कि प्रधानमंत्री मोदी से भी हस्तक्षेप की मांग कर रही थीं। लेकिन मणिपुर में जिन तीन महिलाओं के उत्पीड़न का वीडियो सामने आया वह कुकी समुदाय की महिलाएं थीं जिसके बाद से दिल्ली में मणिपुर का मुद्दा संसद में गतिरोध का कारण बना हुआ है।

परन्तु सवाल यह है कि सोनिया गांधी ने अगर मणिपुर हिंसा के बीच विशेष रूप से महिलाओं का मुद्दा उठाया तो क्या उस समय तक उनके पास कुकी महिलाओं के साथ की गई अभद्रता की सूचनाएं पहुंच चुकी थीं? क्या इन्हीं सूचनाओं के मद्देनजर उन्होंने मणिपुर हिंसा शुरु होने के करीब डेढ़ महीने बाद अपना वीडियो संदेश जारी किया? क्या इसके पीछे महिलाओं के प्रति वास्तविक संवेदना थी या फिर मणिपुर में अपने वोटबैंक की चिंता?
नेता वोटबैंक के हिसाब से ही बोला करते हैं। इसमें न तो कोई आश्चर्य है और न ही कुछ गलत। लेकिन सोनिया गांधी द्वारा मणिपुर पर बयान दिये जाने के बाद मणिपुर का मुद्दा दिल्ली में अहम बन गया। इसके एक हफ्ते बाद 29 जून को राहुल गांधी मणिपुर पहुंच गये। वो न सिर्फ चूराचांदपुर गये जहां कुकी ईसाइयों ने हिंसा की शुरुआत की थी बल्कि मेइती विस्थापितों के कैम्प में भी जाते हैं। कांग्रेस के लिए मणिपुर का मुद्दा अहम हो चुका था। ऊपरी तौर पर वो हिन्दू बनाम ईसाई तो नहीं कर रहे थे लेकिन उनके दौरे की प्रशंसा ईसाईयों ने ही अधिक की। केरल के सीरियो-मालाबार चर्च की साप्ताहिक पत्रिका सत्यदीपम ने 7 जुलाई के अंक में लिखा कि "उनकी (राहुल गांधी) की यात्रा ने दंगा पीड़ित लोगों (ईसाइयों) में नया आत्मविश्वास पैदा किया है।"
चर्च की पत्रिका सत्यदीपम ने न केवल राहुल गांधी के मणिपुर दौरे की प्रशंसा की बल्कि केन्द्र की मोदी सरकार की आलोचना करते हुए लिखा कि अमित शाह गये तो कोर्ट के आदेश को हिंसा के लिए जिम्मेवार ठहराकर वापस आ गये। पत्रिका ने लिखा था कि 30 बार नार्थ ईस्ट जानेवाले नरेन्द्र मोदी अब मणिपुर क्यों नहीं जा रहे हैं।
साफ है, यह सारा घटनाक्रम तब घटित हो रहा था जब मणिपुर में शुरु हुई हिंसा पर काफी हद तक काबू पा लिया गया था। हिंसा के पीछे म्यांमार से आनेवाले छापामार कुकी तथा परोक्ष रूप से चीन के पदचिन्ह भी दिखाई देने लगे थे। ऐसे वक्त में जब हिंसा के पीछे के असली गुनहगारों की पहचान होनी थी तब कांग्रेस ने अपनी 'सद्भावना' से पीड़ित और उत्पीड़क के बीच की रेखा को ही मिटा दिया। जो मेइती अब तक पीड़ित नजर आ रहे थे, उन पर कुकी महिलाओं को नग्न करके घुमाने और उनके साथ सामूहिक बलात्कार का ऐसा घिनौना आरोप लग गया कि अब वही उत्पीड़क नजर आने लगे। करीब दो महीने से मणिपुर पर चुप बैठे प्रधानमंत्री मोदी को इस शर्मनाक घटना के सामने आने पर अपनी लंबी चुप्पी तोड़नी पड़ी।
21 जून को जिस दिन मैडम सोनिया गांधी ने मणिपुर की हिंसा का मामला उठाया था उसके ठीक एक दिन पहले 20 जून को इम्फाल से 75 महिलाओं का एक दल दिल्ली आया था। उसने यहां प्रेस कांफ्रेस की और प्रधानमंत्री कार्यालय को ज्ञापन भी दिया था। वो मणिपुर में एक शांति दल की सदस्य थीं और सभी उसी मेइती समुदाय से जुड़ी हुई थीं जो इस कुकी प्रायोजित हिंसा का सर्वाधिक शिकार हुई हैं। लेकिन न तो प्रधानमंत्री कार्यालय ने उनके ज्ञापन को कोई महत्त्व दिया और न ही मोदी ने कोई बयान। बयान तब दिया जब कांग्रेस ने पुख्ता प्रमाण के साथ पीड़ित को ही उत्पीड़क साबित कर दिया।
मणिपुर में जारी हिंसा पर मोदी दो महीने तक क्यों चुप रहे यह राज तो उनके अलावा भला और कौन जान सकता है? हो सकता है उनके पास कुछ ऐसा इन्पुट रहा हो जिसके आधार पर उनके बोलने पर ईसाई देशों के नेताओं के नाराज हो जाने का खतरा पैदा होता हो। या फिर ऐसा भी हो सकता है कि उन्हें यह मुद्दा बोलने लायक ही नहीं लगा। या फिर यह भी हो सकता है कि वे हिन्दू मेइती लोगों के पक्ष में खड़ा नहीं दिखना चाहते थे। कारण जो भी रहा हो लेकिन उनके नौ साल के कार्यकाल में कई ऐसे मौके आये हैं जब उनके बोलने की सबसे अधिक जरूरत उनके ही समर्थकों ने महसूस की लेकिन मोदी मौन साध गये।
अपने वोटबैंक के समर्थन वाले बयान संभवत वो चुनाव के समय में बोलने के लिए बचाकर रखते हैं। लेकिन इस बार उनकी यह रणनीति उन पर ही भारी पड़ गयी है। मणिपुर में हिंसा का मुद्दा कांग्रेस संसद तक ले आयी है। विपक्षी दलों का एक प्रतिनिधिमंडल 29-30 जुलाई को मणिपुर के दौरे पर है। साफ है, भाजपा भले यह कहती रहे कि वो संसद में मणिपुर सहित हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार हैं लेकिन सच्चाई यह है कि मणिपुर हिंसा को लेकर कांग्रेस ने अपनी चतुर रणनीति से जो नैरेटिव गढ दिया है, उसको तोड़ पाना भाजपा के लिए कठिन होगा।
रही सही कसर राहुल गांधी ने यह बोलकर पूरी कर दी है कि "मोदी इसलिए नहीं बोल रहे हैं क्योंकि वो जानते हैं कि उनकी विचारधारा ने मणिपुर को जलाया है।" राहुल गांधी ने अपने इसी बयान में आरएसएस का नाम लेकर अपना राजनीतिक लक्ष्य और बेहतर तरीके से साध लिया है। अब उनके लिए मणिपुर के मेइती हिन्दू ही मणिपुर को 'जलानेवाले' हैं और कुकी ईसाई पीड़ित समुदाय। समय के साथ यही बात उनके समर्थक स्थापित भी कर देंगे।
इस तरह पीएम मोदी की एक चुप्पी ने मणिपुर के पूरे नैरेटिव को ही उनकी पार्टी के खिलाफ खड़ा कर दिया। राजनीति ही नहीं जीवन में भी कहां चुप रहना है और कहां बोल पड़ना है इसकी समझ से ही हमारी सफलता और असफलता निर्धारित होती है। मोदी न केवल इस बात को जानते हैं बल्कि संसद में खड़े होकर दावा भी कर चुके हैं कि वो राजनीति को बहुत अच्छे से समझते हैं।
मणिपुर में किस राजनीतिक रणनीति के तहत वो चुप रहे यह तो वही समझते हैं लेकिन एक पूर्व कांग्रेसी नेता बीरेन सिंह के नेतृत्व में भाजपा की सरकार चला रहे नरेन्द्र मोदी के लिए मणिपुर पर यह चुप्पी संसद में पूरी भाजपा को भारी पड़ी है। अब भाजपा चाहे जितनी कोशिश कर ले मणिपुर में हुए नैरेटिव के नुकसान की भरपाई नहीं कर पायेगी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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