Gyanvapi ASI Survey: ज्ञानवापी में सर्वे से क्या हासिल हुआ?
Gyanvapi ASI Survey: इसे संयोग ही कहा जाएगा कि 22 जनवरी को अयोध्या में रामलला अपने नये भवन में विराजमान हुए और 24 जनवरी को वाराणसी में ज्ञानवापी का मामला चर्चा में आ गया।
आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) की ओर से 92 दिन तक चले सर्वे के बाद 12 दिसंबर 2022 को रिपोर्ट जिला अदालत में प्रस्तुत कर दी गयी थी।

रिपोर्ट सौंपते समय एएसआई ने ही न्यायालय से फैसला सुनाने के लिए एक महीने का समय मांगा था। इसके बाद 24 जनवरी बुधवार को ज्ञानवापी परिसर में बनी मस्जिद पर हुए एएसआई सर्वे को अदालत ने सार्वजनिक करने का आदेश दे दिया। ज्ञानवापी परिसर में बनी मस्जिद का इंतजाम देखने वाली इंतजामियां कमेटी ने कोर्ट से गुजारिश की थी कि वो रिपोर्ट को सार्वजनिक न करें लेकिन अदालत ने दोनों पक्षों को रिपोर्ट की प्रति सौंपने का आदेश देते हुए इसे सार्वजनिक करने का आदेश भी दे दिया।
ज्ञानवापी परिसर में जो मस्जिद बनायी गयी है वह मंदिर तोड़कर उसी मलबे से बनायी गयी है इसे जानने के लिए किसी सर्वे की कोई जरूरत ही नहीं है। मस्जिद की पश्चिमी दीवार आज भी मंदिर की वही पुरानी दीवार है जिसे तोड़कर वहां औरंगजेब के समय में मस्जिद बनवायी गयी। यहां तक कि एएसआई ने भी ज्ञानवापी परिसर में कहीं कोई खुदाई नहीं की है। ऐसा न करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का आदेश था। फिर भी वहां इतने सबूत बिखरे हुए मिले हैं जिसे वही बात साबित होती है जो पहले से हर कोई पहले से जानता है।
ज्ञानवापी परिसर में मंदिर तोड़कर उसी जगह पर खड़ी की गयी मस्जिद का सच जानने के लिए न तो किसी सर्वे की जरूरत है और न ही इतिहास की किताबों की। जिन लोगों ने वहां आदि विश्वेश्वर महादेव का मंदिर तोड़कर मस्जिद बनायी उन्हें लगता था कि उनके शासन का कभी अंत नहीं होगा। इसलिए मंदिर के मलबे से ही मस्जिद बना दी। पश्चिमी दीवार को जस का तस छोड़ दिया और उसी पर गुंबद निर्मित कर दिया।
ज्ञानवापी परिसर में श्री आदिविश्वेश्वर का अष्टकोणीय मंदिर था। जिन्होंने मंदिर तोड़ा उन्होंने पूरब, पश्चिम और दक्षिण की ओर से मंदिर को तो ध्वस्त कर दिया लेकिन न तो आदिविश्वेश्वर शिवलिंग को हटा सके और न ही वहां विराजमान नंदी को। आज भी वो दोनों अपनी पूर्ववत जगह पर स्थित हैं।
मामला तब सामने आया जब श्रृंगार गौरी के पूजन के लिए महिलाओं का एक समूह स्थानीय अदालत पहुंच गया। मां श्रृंगार गौरी का मंदिर भी इसी अष्टकोणीय ज्ञानवापी मंदिर परिसर में ही था जिनकी पूजा उसी पश्चिमी दीवार के साथ होती थी जो आज भी सही सलामत खड़ी है।
स्थानीय अदालत में अभी सुनवाई हो ही रही थी कि एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें वुजुखाने में वही प्राचीन आदि विश्लेश्वर शिवलिंग दिखाई दिया जो ठीक नंदी के उत्तर में है। इसके बाद हंगामा होना ही था। बात बढ़ी तो मुस्लिम पक्षकारों ने इसे फव्वारा बताना शुरु कर दिया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस वुजुखाने को बंद करने का आदेश दे दिया जहां शिवलिंग स्थित है। अब उसमें से मछलियां निकालकर भी मुस्लिम पक्ष को सौंप दी गयी हैं और कम से कम उस शिवलिंग वाले हौद से मुस्लिम पक्ष दूर हो गया है जहां वह हाथ पैर धोता था और कुल्ला करता था।
यह जानते हुए कि यहां पानी के भीतर हिन्दुओं के सबसे पवित्र तीर्थस्थानों में से एक काशी के आदि विश्वेश्वर विराजमान हैं, मुस्लिम वहां हाथ पैर धोते रहे। सिर्फ यही एक उदाहरण यह बताने के लिए पर्याप्त है कि स्वतंत्र भारत में भी एक संविधान के तहत रहने वाला मुस्लिम समुदाय दूसरे समुदायों की आस्था का कितना सम्मान करता रहा है।
ऐसे में जैसे जैसे ज्ञानवापी परिसर का मामला अदालतों में आगे बढ़ रहा है मुस्लिम पक्ष नये नये पैंतरे खेल रहा है। मसलन कभी वो शिवलिंग को फव्वारा बताता है तो कभी कहता है कि वहां मंदिर तो था लेकिन उसे जौनपुर के किसी राजा ने तोड़ा था। फिर कभी ये तर्क देता है कि 1669 में मंदिर को तोड़ा तो औरंगजेब ने ही था लेकिन ऐसा उसने एक हिन्दू महिला की शिकायत पर किया था। मुस्लिम समुदाय में कुछ लोग कहते हैं कि एक हिन्दू महिला ने जब उस मंदिर में अपने साथ ज्यादती की शिकायत औरंगजेब से की तो औरंगजेब आलमगीर ने उस मंदिर को तोड़ दिया।
मुस्लिम समुदाय को उसके रहनुमा हमेशा कॉन्स्पिरेसी थ्योरी में जिन्दा रखते हैं। वो ऐसी ऐसी कहानियां गढते हैं जिनका कोई सिर पैर भले न हो लेकिन मुस्लिम समुदाय को भटकाने और भड़काने का काम जरूर करती हैं। वही अयोध्या मामले में वो करते रहे और वही अब ज्ञानवापी परिसर में बनी मस्जिद को लेकर कर रहे हैं।
पहले उन्होंने एएसआई सर्वे न होने देने की पुरजोर कोशिश की और जब सर्वे हो गया तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक न होने देने की अपील की। अब जब रिपोर्ट भी सार्वजनिक हो गयी है तो इंतजामिया कमेटी के ज्वाइंट सेक्रेटरी मोहम्मद यासीन कह रहे हैं कि "हम खामोश हैं तो इसका मतलब ये नहीं कि आप हमें रौंदते चले जाइये।" जब उनसे पूछा गया कि लेकिन यह सब तो अदालत के जरिए हो रहा है तो उनका जवाब था कि यही तो समस्या है कि यह सब अदालत के जरिए हो रहा है।
मतलब मुस्लिम पक्षकार का काशी के ज्ञानवापी परिसर को लेकर भी वही अड़ियल रुख है जो अयोध्या को लेकर था। अगर अदालतें भी उसके मन मुताबिक नहीं फैसला देतीं तो वह उस पर भी सवाल उठा सकता है, भले ही ऐसा करने के लिए उसके पास कोई सबूत, तथ्य और सत्य न हो। जैसे राम मंदिर का फैसला सुप्रीम कोर्ट से आ जाने के बाद भी मुस्लिम उलेमा आज भी अपनी कौम को बहका रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि वहां मस्जिद के नीचे कोई मंदिर नहीं था, फिर भी उसने अक्सरियत (बहुसंख्यक) का ध्यान रखते हुए बाबरी मस्जिद की जगह हिन्दुओं को दे दी।
ज्ञानवापी में किये गये एएसआई के सर्वे में भले ही दर्जनों ऐसे नये सबूत मिले हों जो तहखानों में बंद थे लेकिन मुस्लिम पक्ष आज भी सच स्वीकार करने को तैयार नहीं है। वह इसे अपने खिलाफ और मुस्लिम समुदाय को भड़काने वाली कार्रवाई के तौर पर प्रचारित कर रहा है। यहां यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि किसी मंदिर को तोड़ना और वहां रखी मूर्तियों को नष्ट करना इस्लाम में अच्छा काम समझा जाता है। मूर्तिपूजा को वो शिर्क मानते हैं और न तो खुद करते हैं और अगर कोई कहीं कर रहा होता है तो उसे भी नष्ट करने का प्रयास करते हैं।
भारत में इस्लामिक शासन के दौरान सोमनाथ से विश्वनाथ तक जो मंदिर तोड़े गये वो इसी मानसिकता के कारण तोड़े गये थे। 12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे प्राचीन आदि विश्वेश्वर मंदिर को ही दो बार तोड़ा गया। एक बार 1194 में और दूसरी बार 1669 में।
काशी में ही एक विशाल वैष्णव बिन्दू माधव मंदिर को भी तोड़ा गया जो ठीक गंगा के तट पर था। यह मंदिर भी आदि विश्वेश्वर मंदिर के साथ ही 1669 में तोड़ा गया था जहां आज विशाल धरहरा मस्जिद खड़ी है। धरहरा मस्जिद का भी वही हाल है जो ज्ञानवापी में बनी मस्जिद का है। वहां की दरो दीवार चीख चीखकर यही कह रही है कि यह मस्जिद नहीं बल्कि मंदिर है, बस यहां के देवता कहीं और चले गये हैं।
ज्ञानवापी परिसर में एएसआई के ताजा सर्वे से हिन्दू पक्ष के लिए ऐसा नया कुछ हासिल नहीं हुआ है जो वो पहले से देख सुन नहीं रहे हैं। अगर कुछ नया है तो मुस्लिम पक्षकारों के लिए है कि वो अगर इतिहास को स्वीकार नहीं करेंगे तो उनका वर्तमान कभी बेहतर नहीं होगा। वो जितना झूठ और जिद्द का सहारा लेंगे उतना ही कमजोर पड़ेंगे। उन्हें यह भी सोचना होगा कि यह मात्र सर्वे था, जिसमें अकाट्य प्रमाण मिल गए हैं। इसलिए मुस्लिम समुदाय को बिना लाग लपेट के यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि औरंगजेब ने मंदिर तोड़कर ही मस्जिद बनायी थी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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