Kejriwal in Gujarat Election: गुजरात में तिल तिल बढ रहा है केजरीवाल की लोकप्रियता का ग्राफ
Kejriwal in Gujarat Election: चुनाव आयोग ने प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के गृहराज्य गुजरात में मतदान की तिथियों की घोषणा कर दी है। 1 और 5 दिसंबर को गुजरात में दो चरणों में मतदान होगा और 8 दिसंबर को हिमाचल प्रदेश के साथ परिणाम सुनाये जाएंगे। अब जबकि चुनाव आयोग ने अपने पत्ते खोल दिये हैं तो यह देखना भी जरूरी है कि आज की तारीख में कौन सा राजनीतिक दल गुजरात में कहां खड़ा है।

गुजरात में आमतौर पर दो राजनीतिक दलों का ही दबदबा रहा है। कांग्रेस और भाजपा। इस बार गुजरात की राजनीतिक तस्वीर में आम आदमी पार्टी का प्रवेश हुआ है। पहली बार गुजरात के चुनाव मैदान में उतरी आम आदमी पार्टी की ताकत यह है कि हर हफ्ते उसके वोट शेयर में कुछ वृद्धि हो रही है। आम आदमी पार्टी की इस सफलता के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार माना जा रहा हैं, जिसने अपने वोट बैंक को पूरी तरह से खुला छोड़ दिया। बीजेपी के दो सबसे बड़े नेता नरेंद्र मोदी और अमित शाह भी केजरीवाल के बढ़ते कद के लिए जिम्मेदार हैं, जिन्होंने गुजरात में खुद के अलावा किसी और को पनपने ही नहीं दिया, इसी कारण केजरीवाल की तुलना सीधे उन्हीं दोनों से हो रही है।
जून महीने के बाद से ही प्रति सप्ताह आम आदमी पार्टी के वोट शेयर में बढ़ोत्तरी कोई कम आश्चर्य की बात नहीं है। क्योंकि गुजरात के मतदाताओं के बीच, भले नकली ही सही, लेकिन अरविंद केजरीवाल अपनी बेहद सरल, सामान्य और सहज उपस्थिति से जो प्रभाव पैदा कर रहे हैं, वह उनकी पार्टी की पैठ बढ़ाने में सकारात्मक साबित हो रहा है।
केजरीवाल द्वारा लोगों से जुड़ना जारी है। हर जाति, समाज, वर्ग, धर्म, उम्र, सहित प्रत्येक आय वर्ग और व्यवसाय के लोगों में भी केजरीवाल का क्रेज दिख रहा है। भले ही कांग्रेस के लिए यह बेहद बुरी खबर यह है कि गुजरात विधानसभा चुनाव में केजरीवाल उसके वोटर अपनी तरफ कर सकते हैं, लेकिन केजरीवाल और उनकी पार्टी के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि वे गुजरात में कितने लंबे समय तक टिक पाएंगे?
गुजरात की राजनीतिक धड़कनों की समझ रखने वाली वरिष्ठ पत्रकार प्रीति सोमपुरा कहती हैं कि केजरीवाल और उनकी 'आप' का गुजरात में सीधा मुकाबला कांग्रेस से ही है, इसलिए नुकसान कांग्रेस को ही होना है। सोमपुरा यह भी कहती हैं कि बीजेपी गुजरात विधानसभा का चुनाव अगले लोकसभा चुनाव के नजरिये से लड़ रही है, फिर वह निर्विवाद रूप से सबसे बड़ी पार्टी भी है, जिसका वहां किसी का कोई मुकाबला नहीं दिखता।
प्रीति कहती हैं कि बीजेपी की बरसों की लगातार मेहनत, संघ परिवार की घर घर पहुंच, प्रधानमंत्री के लगातार दौरों और गृह मंत्री अमित शाह की लंबी उपस्थिति के कारण भी गुजरात में बीजेपी सबसे आगे है। राजनीतिक विश्लेषक संदीप सोनवलकर कहते हैं कि कांग्रेस की अंतर्कलह, नेतृत्व की शिथिलता और 27 साल से गुजरात में उनका सत्ता में न होने के साथ साथ मोदी और शाह का खौफ भी कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती है।
हाल ही में सामने आए गुजरात के कुछ सर्वे केजरीवाल के लिए बड़ी खुशखबरी के रूप में तो कांग्रेस को मायूस कर देने वाली खबर लाए हैं। सितंबर महीने की समाप्ति तक के इन सर्वे के आंकड़ें उठाकर देखें तो पिछली बार सत्ता में आते आते रह गई सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के बारे में सिर्फ 9 फीसदी वोटर ही कह रहे हैं कि गुजरात में वह सत्ता में आ सकती है। जबकि केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के समर्थन में 19 फीसदी और बीजेपी के साथ 63 फीसदी मतदाता खड़े दिख रहे थे।
लेकिन नवंबर आते आते सितंबर महीने के आंकड़ों में जो परिवर्तन देखने को मिला वह आंखें खोल देने वाला कहा जा सकता है। विभिन्न पार्टियों के आंतरिक सर्वे में कांग्रेस 9 से घटकर 8 फीसदी और बीजेपी 63 से घटकर 60 फीसदी पर उतर गई, लेकिन केजरीवाल 19 से बढ़कर 23 फीसदी लोगों का समर्थन हासिल करने में सफल हुए हैं। मतलब साफ है कि अक्टूबर के महीने में केजरीवाल की 'आप' का हर सप्ताह 1 फीसदी की दर से वोट शेयर बढ़ा है।
गुजरात में कोई आश्चर्य नहीं कि मतदान का दिन आते आते आम आदमी पार्टी 25 फीसदी वोट शेयर तक पहुंच जाए। यह कहते हुए राजनीतिक विश्लेषक सोनवलकर यह तर्क भी रखते हैं कि भले ही केजरीवाल केवल दिल्ली जैसे छोटे से प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, फिर भी मोदी और शाह को छोड़ दें, तो किसी भी गुजराती नेता के मुकाबले केजरीवाल का राजनीतिक कद ज्यादा बड़ा दिखता है। खासकर गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल मुकाबले तो बहुत ज्यादा बड़ा।
वरिष्ठ पत्रकार अभिमन्यु शितोले के मुताबिक मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल को गुजरात में भी सब लोग पहचानते हैं, यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता, लेकिन केजरीवाल को सब पहचानने लगे हैं। केजरीवाल की यही पहचान गुजरात में कमाल कर रही है। शितोले के मुताबिक गुजरात में कांग्रेस पर केजरीवाल का वोट शेयर भारी पड़ने का एक प्रमुख कारण उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता भी है।
हालांकि, गुजरात में कांग्रेस की ताकत बढ़ाने के लिए राजस्थान के दो नेता मुख्यमंत्री अशोक गहलोत एवं गुजरात कांग्रेस के प्रभारी डॉ. रघु शर्मा जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं। इससे कार्यकर्ताओं में जागरूकता आई है और उसकी सराहना भी उनको उनको मिल रही है। लेकिन वोट बैंक में बढ़ोतरी नहीं हो रही, यह कांग्रेस के लिए चिंता का विषय है।
इसके बावजूद तस्वीर यही है कि हाल में अध्यक्ष बने मल्लिकार्जुन खड़गे हों या नेहरु परिवार। इनको जैसे गुजरात की कोई चिंता ही नहीं है। राहुल गांधी अपनी पदयात्रा में व्यस्त हैं। ऐसे में लगभग समूचा कांग्रेस तंत्र गुजरात और हिमाचल के चुनाव की चिंता की बजाय उनकी यात्रा को सफल बनाने में लगा हुआ है। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व का गुजरात में यह लगभग अवहेलना जैसा व्यवहार भी संगठन को लगातार कमजोर कर रहा है और उसके कार्यकर्ताओं व मतदाताओं को केजरीवाल जैसे लुभावने वादे करने वाले नेता की तरफ धकेल रहा है।
इसी वजह से, कल तक सिर्फ दिल्ली तक सीमित आम आदमी पार्टी और केजरीवाल की लोकप्रियता का ग्राफ पंजाब के पश्चात गुजरात में तिल तिल करके बढ़ रहा है। यह न केवल चौंकानेवाला है, बल्कि कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी, तो बीजेपी के लिए भी आने वाले वक्त की चुनौती है। लेकिन परवाह कौन करता है, क्योंकि राजनीति की बगिया में चुनौतियां वैसे भी सदाबहार होती हैं!
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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