Gujarat Election Result: भाजपा ने गुजरात में सचमुच जादू कर दिया
प्रधानमंत्री बनने के बाद भी नरेंद्र मोदी गुजरात सरकार के कामकाज पर बारीकी से नज़र रखते हैं और उनके बाद जो भी नेता वहां के मुख्यमंत्री बने हैं, वे भी उन्हीं के मार्गदर्शन और दिशा-निर्देशों के मुताबिक काम कर रहे हैं।

Gujarat Election Result: 182 में से 156 सीटें... यानी लगभग 86 प्रतिशत सीटों पर विजय। वह भी 52.5 प्रतिशत वोटों के साथ। एक ऐसी पार्टी की सरकार के लिए, जो पिछले 27 वर्षों से राज कर रही है। भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात विधानसभा चुनावों में सचमुच जादू ही कर दिया।
गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को अपनी विधानसभा सीट पर लगभग 83 प्रतिशत वोट मिले हैं और उनकी जीत का मार्जिन 1 लाख 92 हज़ार वोटों से अधिक का रहा है। केवल मुख्यमंत्री ही नहीं, अन्य 10 उम्मीदवार भी एक लाख से अधिक वोटों से जीते हैं। इस बिल्कुल एकतरफा विधानसभा चुनाव में भाजपा के 51 उम्मीदवारों ने 50 हजार से अधिक वोटों से जीत हासिल की है। उसके जीतने वाले 156 उम्मीदवारों की जीत का औसत मार्जिन 44,536 वोटों का रहा है, जबकि जिन 26 सीटों पर विपक्षी और निर्दलीय उम्मीदवार जीते हैं, वहां पर जीत का औसत मार्जिन केवल 12,108 वोट है।
गुजरात का चुनाव परिणाम ऐसा है कि इस बार विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेता को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा भी हासिल नहीं हो पाएगा, क्योंकि उसे विधानसभा में 10 प्रतिशत से भी कम सीटें मिली हैं। 182 में केवल 17 सीटें।
मज़े की बात यह है कि इतने एकतरफा चुनाव के बावजूद कई लोग जहां हिमाचल प्रदेश की हार दिखाकर भाजपा से इस जादुई जीत का श्रेय छीनना चाहते हैं, वहीं कई लोग यह नैरेटिव गढ़ने में जुट गए हैं कि यदि आम आदमी पार्टी और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने वोटकटवा की भूमिका नहीं निभाई होती, तो भाजपा को इतनी बड़ी जीत नहीं मिलती। जबकि आंकड़े गवाह हैं कि इन दोनों ही बातों का सच्चाई से कोई नाता नहीं है।
हिमाचल प्रदेश वह छोटा सा पहाड़ी राज्य है, जहां हर पांच साल में सरकार बदल जाती है और जहां भारतीय जनता पार्टी की हार पूरे राज्य में कांग्रेस से महज 0.9% यानी केवल 38 हज़ार वोट कम मिलने के कारण हो गई है। साथ ही, यदि गुजरात में भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ कांग्रेस को छोड़कर कोई भी पार्टी न होती, कोई निर्दलीय भी न होता, हर सीट पर केवल दो ही उम्मीदवार होते - एक भाजपा और एक कांग्रेस के - और नोटा के सारे वोट भी कांग्रेस उम्मीदवारों को ही चले जाते, तो भी कांग्रेस के वोट भारतीय जनता पार्टी से 5 प्रतिशत कम होते, जो कि एक बहुत बड़ा मार्जिन है।
इन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के वोट भाजपा से 25 प्रतिशत कम रहे हैं। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को मिलाकर भी भाजपा से लगभग 12.5 प्रतिशत वोट कम ही रहते हैं। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी पूरे राज्य में सिर्फ 13 सीटों पर लड़ी और केवल 93 हजार वोट ला सकी। कहने का मतलब यह कि लगभग हर सीट पर भाजपा की जीत का मार्जिन देखिए और इन कथित वोटकटवा पार्टियों को मिले वोट देखिए।
गुजरात में इस बार भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में एक ऐसी प्रो-इनकम्बेन्सी यानी सत्ता-समर्थक लहर चल रही थी, जिसे कोई भी गठबंधन कैसा भी जातीय-सांप्रदायिक समीकरण बनाकर 150 सीटों से नीचे नहीं रोक सकता था।
इसलिए आलोचकों के लिए भाजपा की इस ऐतिहासिक और अकल्पनीय सफलता को खारिज करने से ज्यादा इस बात को समझना ज़रूरी है कि आखिर उसने ऐसा क्या किया है कि गुजरात की जनता ने इक्कीसवीं सदी का एक चौथाई हिस्सा उसके नाम कर दिया और आगे भी करने के लिए तैयार है।
दरअसल, भाजपा ने नरेंद्र मोदी के जरिए गुजरात के समाज, राजनीति और सरकार में क्रमशः शांति, स्थिरता और विकासवादी सोच का बीजारोपण किया। प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी लगातार 12 साल 227 दिन तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। उनसे पहले गुजरात में आयाराम गयाराम की तरह मुख्यमंत्री बदलते रहे थे। केवल हितेंद्र देसाई और माधव सिंह सोलंकी ही एक-एक बार लगातार 5 साल से अधिक समय तक मुख्यमंत्री रह पाए थे।
अक्टूबर 2001 में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने जब मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया, तब भूकंप के कारण वहां की अर्थव्यवस्था तो खस्ताहाल थी ही, राज्य में आए दिन दंगे और तरह-तरह के अपराध होते रहने से कानून-व्यवस्था की भी दुर्गति थी। भयावह गोधरा कांड और इसकी प्रतिक्रिया में गुजरात दंगे भी उनके मुख्यमंत्री बनने के महज 5 महीने के भीतर ही हो गए थे। इन विषम परिस्थितियों में बेहतर प्रशासनिक दक्षता दिखाते हुए उन्होंने राज्य को संकट से निकाला। गांव-गांव तक बुनियादी सुविधाओं को पहुंचाने और इन्फ्रास्ट्रक्चर को सुधारने के लिए उन्होंने ज़बर्दस्त काम किया।
वाइब्रेंट गुजरात जैसे अभियानों के जरिए मोदी ने राज्य में बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश आकर्षित किया। उनकी जनकल्याणकारी नीतियों, विकास कार्यों और पारदर्शितापूर्ण प्रशासन का लाभ किसी न किसी रूप में हर गुजराती तक पहुंचा। समझा जाता है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद भी गुजरात सरकार के कामकाज पर वे बारीकी से नज़र रखते हैं और उनके बाद जो भी नेता वहां के मुख्यमंत्री बने हैं, वे भी सिंहासन पर उनकी खड़ाऊं रखकर उन्हीं के मार्गदर्शन और दिशा-निर्देशों के मुताबिक काम कर रहे हैं। चूंकि यह डबल इंजन सरकार अच्छी चल रही है, इसलिए गुजराती जनमानस का भी उन पर अटूट विश्वास बना हुआ है।
ऐसे में विपक्ष के लोग यदि गुजरात में भाजपा द्वारा किये गये कार्यों और प्रयोगों को विनम्रता से स्वीकार नहीं कर पा रहे, तो इसका मतलब है कि देश की राजनीति को भी अब तक वे ठीक से नहीं समझ पा रहे, क्योंकि भाजपा जब अपने गुजरात मॉडल को लेकर देश के सामने आती है, तो उसे देश की जनता का भी व्यापक समर्थन मिल जाता है। उसका गुजरात मॉडल, ब्रांड मोदी, विकास और जनकल्याणकारी नीतियों के साथ ही हिन्दुत्व की राजनीति का एक ऐसा चतुर्भुज बनाता है, जिसके प्रभाव से एकाध राज्यों को छोड़कर देश का शायद ही कोई हिस्सा अब अछूता है।
लेकिन विपक्षी दलों के पास न तो ब्रांड मोदी का कोई ठोस विकल्प है, न ही भ्रष्टाचार और वंशवाद के चंगुल में फंसे रहकर विकास और जनकल्याण के बारे में अपनी नीतियों को प्रभावशाली ढंग से समझा पाने की सामर्थ्य है। ऊपर से हिन्दुत्व के मुद्दे पर लगभग तमाम दलों की स्थिति में एक विचित्र विरोधाभास भी दिखाई देता है।
यह हाल तब है, जब 2024 के लोकसभा चुनाव में डेढ़ साल से भी कम समय बचा है। 2014 एवं 2019 के लोकसभा चुनावों में हर बार 60 प्रतिशत से अधिक वोटों के साथ भाजपा को 26 में से 26 सीटें देने वाले गुजरात ने तो इन विधानसभा चुनावों के नतीजों से यह बता ही दिया है कि 2024 के लिए उसके मन में क्या है।
यह भी पढ़ें: Assembly Elections 2023: भाजपा के सामने 2023 की चुनौतियां ज्यादा गंभीर हैं
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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