Assembly Elections 2023: भाजपा के सामने 2023 की चुनौतियां ज्यादा गंभीर हैं
2022 में हिमाचल प्रदेश विधानसभा और MCD में हार के बाद 2023 में होने वाले कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा के सामने कड़ी चुनौती रहने वाली है। 2023 के विधानसभा चुनाव 2024 के लोकसभा चुनावों की दिशा तय कर सकते हैं।

नरेंद्र मोदी गुजरात की जीत को राष्ट्रीय जीत बता रहे हैं, उन्होंने हिमाचल और दिल्ली की हार को भूल कर गुजरात की जीत का जश्न मनाया। सवाल यह है कि क्या यह जश्न 2023 की चुनौतियों को छोटा करके आंकना नहीं है। 2023 की चुनौतियां 2022 से भी ज्यादा गंभीर हैं। हिमाचल प्रदेश और दिल्ली नगर निगम के चुनाव नतीजों ने भाजपा को चेतावनी दी है, लेकिन उस चेतावनी को सही अर्थों में पढने की बजाए, भाजपा गुजरात के जश्न में डूब गई।
गुजरात ने 2024 में मोदी को तीसरी बार प्रधानमंत्री बनवाने का संकल्प लिया है, लेकिन यह संदेश राज्यों की सरकारों के लिए नहीं है। भाजपा को दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और पश्चिम बंगाल के संदेश को पढने की जरूरत है। ये संदेश कुछ कुछ 2018 जैसे ही संदेश हैं, तब राजस्थान, मध्य प्रदेश, छतीसगढ़ और कर्नाटक ने संदेश दिया था।
2019 में अगर मोदी सरकार पुलवामा के जवाब में पाकिस्तान के भीतर घुस कर सर्जिकल स्ट्राईक नहीं करती तो भारतीय जनता पार्टी को इतनी बड़ी जीत नहीं मिलती। सर्जिकल स्ट्राईक से पहले तक भाजपा को 200 के करीब सीटें मिलने का आकलन आ रहा था। 26 फरवरी के सर्जिकल स्ट्राईक ने सारी स्थिति ही बदल दी थी।

उन दिनों टीवी चैनलों पर चुनावी आकलन के कार्यक्रम शुरू हो चुके थे, चुनाव आकलन के लिए मेरा भी एक चैनल से अनुबंध हुआ था। मैंने खुद भी फरवरी के दूसरे हफ्ते में ढाई सौ सीटों का अनुमान लगाया था, जबकि कुछ पत्रकार नोटबंदी और जीएसटी को बड़ा मुद्दा बता कर भाजपा की हार तक का आकलन दे रहे थे। लेकिन सर्जिकल स्ट्राईक के अगले दिन जब चैनल पर आधा दर्जन से ज्यादा पत्रकार अपनी अपनी राय रख रहे थे, तो मैंने अपनी राय बदल कर 2014 से भी बड़े बहुमत की राय दे दी थी। जबकि बाकी पत्रकारों ने तब तक सर्जिकल स्ट्राईक को टर्निंग पॉइंट नहीं समझा था, लेकिन ऐसे टर्निंग पॉइंट सामान्य राजनीतिक हालात में हर बार नहीं आते।
हालांकि 2024 से पहले क्या होगा यह अभी नहीं कहा जा सकता। 2018 वाले संकेत फिर मिलने शुरू हो गए हैं, हालांकि हमें 2023 का इन्तजार करना होगा। जब राजस्थान, छतीसगढ़, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, त्रिपुरा, मेघालय, नगालैंड और मिजोरम के चुनाव होंगे। इस समय मध्य प्रदेश, कर्नाटक, त्रिपुरा में भाजपा सरकारें हैं। वैसे पूर्वोतर के चारों ही राज्यों में एनडीए की सरकारें हैं। तेलंगाना में टीआरएस की सरकार है। कांग्रेस की राजस्थान और छतीसगढ़ में सरकारें हैं।
मल्लिकार्जुन खड़गे के अध्यक्ष बनने और हिमाचल जीतने के बाद कांग्रेस में नए जोश का संचार हुआ है। राजस्थान और छतीसगढ़ दोनों ही राज्यों में आज का राजनीतिक परिदृश्य लगभग हिमाचल जैसा ही है। कर्नाटक और मध्यप्रदेश की तरह कांग्रेस शासित इन दोनों राज्यों में भाजपा-कांग्रेस में कड़ी टक्कर होगी। यानी भाजपा और कांग्रेस शासित दो-दो राज्यों में कड़ी टक्कर होगी। हार या जीत कुछ भी हो सकता है। भाजपा के लिए बड़ी चुनौती कर्नाटक, मध्य प्रदेश और त्रिपुरा सरकारों को बचाने की है। भाजपा ये तीनों राज्य बचाने के साथ अगर कांग्रेस से राजस्थान या छतीसगढ़ में से एक राज्य भी छीन लेती है, तो 2024 का उसका रास्ता साफ़ होगा।
तेलंगाना में दिल्ली और बंगाल जैसी राजनीतिक लड़ाई होगी, जहां अभी से शह मात का खेल शुरू हो चुका है। जिस तरह बंगाल विधानसभा चुनावों और दिल्ली नगर निगम के चुनावों से पहले सीबीआई और ईडी ने तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के मंत्रियों पर शिकंजा कसना शुरू किया था, उसी तरह अब तेलंगाना में शुरू हो चुका है।
दिल्ली के शराब घोटाले में मुख्यमंत्री केसीआर की बेटी और एमएलसी कविता का नाम आया है, सीबीआई और ईडी ने उन्हें तलब भी किया है। ईडी की रिमांड रिपोर्ट में नाम सामने आने के बाद कविता ने कहा कि चुनावों से पहले तेलंगाना में भी वही हो रहा है, जो बंगाल और दिल्ली में हुआ। उन्होंने यहाँ तक कहा कि देश का बच्चा बच्चा जानता है कि चुनावी राज्यों में पीएम मोदी से पहले ईडी आती है।
बंगाल और दिल्ली में सीबीआई और ईडी की ओर से की गई गिरफ्तारियों का भाजपा को राजनीतिक फायदा नहीं हुआ था। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों ईडी के अधिकारियों के एक सम्मेलन में आर्थिक अपराधियों पर कार्रवाई की खुली छूट देते हुए कहा था कि जब राजनीतिक नेताओं के खिलाफ कार्रवाई होती है तो अधिकारियों पर आरोप लगते हैं, लेकिन उन्हें बिना उसकी परवाह किए अपना काम करते रहना है।
जब चुनाव वाले राज्य में सीबीआई और ईडी भाजपा विरोधी दलों के नेताओं पर कार्रवाई करती है, तो उसे राजनीतिक विद्वेष ही माना जाता है। इसलिए अच्छा हो कि सीबीआई और ईडी के लिए भी कोई मर्यादा तय हो। जैसे विधानसभा और लोकसभा की सीट खाली होने पर आख़िरी छह महीनों में चुनाव नहीं होते, उसी तरह सीबीआई और ईडी को भी चुनाव वाले राज्य में आख़िरी छह महीने पहले मंत्रियों, विधायकों, सांसदों के खिलाफ अपना काम बंद कर देना चाहिए, ताकि उसके दुरूपयोग के आरोप न लगें।
तेलंगाना में हाल ही में हुए एक उपचुनाव में जिस तरह टीआरएस और भाजपा में आरोप प्रत्यारोप, छापेमारी, गिरफ्तारियों के नाटक हुए, वह एक संकेत है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में क्या होगा। चन्द्रशेखर राव ने क्योंकि तेलंगाना राज्य निर्माण के लिए संघर्ष किया था, इसलिए वह राज्य को अपनी पारिवारिक संपत्ति समझते हैं। वह अपने सरकारी आवास से ही सरकार चलाते हैं, सचिवालय जाते ही नहीं। राजनीतिक विरोधियों के साथ उनका व्यवहार दुश्मनों जैसा होता है।
पिछले दिनों मुख्यमंत्री आवास पर प्रदर्शन करने जा रही आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी की बहन शर्मिला रेड्डी की कार को हैदराबाद पुलिस की क्रेन घसीट कर थाने ले गई थी, जबकि वह खुद कार में बैठी थी। पुलिस ने कार में बैठी शर्मिला को कार समेत हिरासत में ले लिया। शर्मिला रेड्डी टीआरएस सरकार के खिलाफ प्रदेश में पदयात्रा कर रही हैं। वह जहां भी जाती है, टीआरएस के कार्यकर्ता उनकी यात्रा में बाधा बनते हैं, अब पुलिस प्रशासन ने उन्हें पदयात्रा की इजाजत ही नहीं दी है। यह एक घटना नहीं है, ऐसी अनेक घटनाएं हैं, जो तेलंगाना में चल रही तानाशाही के सबूत देती हैं। इसलिए तेलंगाना की राजनीतिक लड़ाई सब से ज्यादा दिलचस्प होने जा रही है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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