ममता बनर्जी को बड़ा झटका? TMC के 100 पार्षदों ने दिया इस्तीफा, सांसद की BJP मीटिंग में मौजूदगी ने बढ़ाई चर्चा

पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय सबसे ज्यादा चर्चा अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) के अंदर बढ़ती बेचैनी को लेकर हो रही है। कभी राज्य की सबसे मजबूत राजनीतिक मशीन मानी जाने वाली पार्टी अब अंदरूनी संकट, इस्तीफों और नाराजगी से जूझती दिखाई दे रही है। हालात ऐसे बन गए हैं कि कई नगर निकायों में पार्टी का ढांचा ही हिलता नजर आ रहा है।

पिछले कुछ दिनों में करीब 100 पार्षदों (काउंसिलर) ने इस्तीफा दे दिया है। दूसरी तरफ पार्टी की वरिष्ठ सांसद कल्कली घोष (Kakoli Ghosh Dastidar) का बीजेपी सरकार की बैठक में शामिल होना राजनीतिक गलियारों में नए संकेत दे रहा है। इन घटनाओं ने सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ममात बनर्जी (Mamata Banerjee) की पार्टी अपने सबसे बड़े राजनीतिक संकट से गुजर रही है?

mamata banerjee abhishek banerjee

🔷TMC में क्यों मचा है भगदड़? (Why TMC Is Facing Internal Crisis)

टीएमसी के भीतर यह उथल-पुथल अचानक शुरू नहीं हुई। बंगाल चुनाव में करारी हार के बाद पार्टी के अंदर असंतोष धीरे-धीरे खुलकर सामने आने लगा। कई नेता मानते हैं कि संगठन जमीनी स्तर पर कमजोर हुआ है और फैसले लेने की प्रक्रिया कुछ लोगों तक सीमित हो गई है।

हालात तब और बिगड़ गए जब शुभेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) के नेतृत्व वाली सरकार ने साफ किया कि नगर निकायों के पुराने कामकाज की जांच होगी और जरूरत पड़ी तो कार्रवाई भी की जाएगी। इसके बाद कई टीएमसी पार्षदों ने कार्यालय जाना तक बंद कर दिया। सरकार ने ऐसे निकायों में प्रशासक नियुक्त करने शुरू कर दिए हैं। इससे साफ संकेत मिला कि स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक नियंत्रण धीरे-धीरे पार्टी के हाथ से निकल रहा है।

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🔷किन नगरपालिकाओं में सबसे बड़ा झटका लगा?

सबसे ज्यादा असर उत्तर 24 परगना और आसपास के औद्योगिक इलाकों में दिखाई दिया।

  • भाटपाड़ा नगरपालिका में 35 में से 30 पार्षदों ने इस्तीफा दिया
  • हलिशहर नगरपालिका में 23 में से 16 पार्षदों ने पद छोड़ा
  • कांचरापाड़ा नगरपालिका में 14 काउंसिलर अलग हो गए

भाटपाड़ा नगरपालिका के उपाध्यक्ष देबज्योति घोष ने कहा कि उनके पास इस्तीफा देने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। उनका आरोप था कि कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं मिल रहा और पार्टी नेतृत्व कोई स्पष्ट दिशा नहीं दे रहा। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि उन पर किसी बाहरी दबाव में इस्तीफा देने का आरोप सही नहीं है।

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🔷भ्रष्टाचार के आरोपों ने बढ़ाई बेचैनी

टीएमसी नेताओं और पार्षदों पर लगातार लग रहे भ्रष्टाचार और वसूली के आरोपों ने पार्टी के भीतर डर और अस्थिरता बढ़ा दी है। पिछले हफ्ते तीन पार्षदों की गिरफ्तारी ने माहौल और तनावपूर्ण कर दिया। उन पर जबरन वसूली और धमकाने जैसे आरोप लगे थे।

इसी बीच दक्षिण दमदम के प्रभावशाली टीएमसी पार्षद संजय दास की रहस्यमय मौत ने राजनीतिक हलकों को झकझोर दिया। संजय दास का शव फंदे से लटका मिला था। पुलिस ने अप्राकृतिक मौत का मामला दर्ज किया है। संजय दास को टीएमसी नेता देबराज चक्रवर्ती का करीबी माना जाता था। देबराज पर भी भर्ती घोटाले से जुड़े आरोपों की जांच चल रही है। इस मामले में पूर्व मंत्री Sujit Bose को पहले ही ईडी गिरफ्तार कर चुकी है।

🔷कोलकाता नगर निगम में भी बढ़ी हलचल

संकट केवल छोटे नगर निकायों तक सीमित नहीं है। कोलकाता नगर निगम (Kolkata Municipal Corporation) यानी केएमसी में भी हालात तनावपूर्ण हो चुके हैं। विवाद तब और बढ़ गया जब निगम ने अभिषेक बनर्जी (Abhishek Banerjee) से जुड़े 17 संपत्तियों को डिमोलिशन नोटिस भेज दिए। इसके अगले ही दिन बीजेपी ने 43 संपत्तियों की सूची जारी कर दी, जिन्हें अभिषेक बनर्जी से जुड़ा बताया गया।

इस पूरे विवाद में कोलकाता के मेयर Firhad Hakim की भूमिका भी चर्चा में आ गई। पहले से ही उनके और अभिषेक बनर्जी के रिश्तों में तनाव की खबरें आती रही हैं। सूत्रों के मुताबिक पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने भी इस मामले में फिरहाद हकीम से नाराजगी जताई थी। हालांकि मेयर ने कहा कि उन्हें नोटिस की जानकारी ही नहीं थी। अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि फिरहाद हकीम मेयर पद छोड़ने पर विचार कर सकते हैं।

22 मई को हालात इतने असामान्य हो गए कि टीएमसी पार्षदों और मेयर को मुख्य सदन के बाहर बैठक करनी पड़ी। उनका आरोप था कि निर्देश के बावजूद मुख्य चैंबर बंद रखा गया। फिरहाद हकीम ने इसे निर्वाचित प्रतिनिधियों का "गंभीर अपमान" बताया। इस घटना ने साफ कर दिया कि पार्टी के भीतर प्रशासनिक और राजनीतिक टकराव खुलकर सामने आने लगे हैं।

🔷BJP बैठक में पहुंचे TMC सांसद से क्यों बढ़ी चर्चा?

टीएमसी के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश तब गया जब लोकसभा सांसद Kakoli Ghosh Dastidar ने बारासात संगठनात्मक जिला अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे के अगले ही दिन वह एक प्रशासनिक बैठक में शामिल हुईं, जिसकी अध्यक्षता मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी कर रहे थे। इस बैठक में टीएमसी के दो विधायक भी मौजूद रहे।

इसके बाद अटकलें तेज हो गईं कि क्या पार्टी के कुछ नेता बीजेपी की ओर बढ़ रहे हैं। काकोली घोष दस्तीदार पहले भी पार्टी की कार्यशैली पर सवाल उठा चुकी हैं। हाल ही में उन्हें लोकसभा में चीफ व्हिप पद से हटाकर Kalyan Banerjee को जिम्मेदारी दी गई थी। अपने इस्तीफे में उन्होंने राजनीतिक रणनीति बनाने वाली कंपनी आई-पैक (I-PAC) की भूमिका पर भी सवाल उठाए और कहा कि "ऐसी अस्थायी एजेंसियों के भरोसे मजबूत राजनीतिक संगठन नहीं चल सकते।"

🔷नंदीग्राम उपचुनाव भी बना सिरदर्द

टीएमसी की परेशानी यहीं खत्म नहीं हो रही। रिपोर्ट्स के मुताबिक पार्टी को नंदीग्राम उपचुनाव के लिए उम्मीदवार ढूंढने में भी मुश्किल हो रही है। यह सीट शुभेंदु अधिकारी के दो सीटों से जीतने के बाद खाली हुई थी। उन्होंने भवानीपुर सीट अपने पास रखी, जहां उन्होंने ममता बनर्जी को हराया था। बताया जा रहा है कि दो टीएमसी नेताओं ने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। इससे पार्टी की अंदरूनी स्थिति को लेकर और सवाल उठने लगे हैं।

🔷क्या ममता बनर्जी संभाल पाएंगी हालात?

1998 में कांग्रेस से अलग होकर बनी टीएमसी ने कई राजनीतिक संकट देखे हैं, लेकिन इस बार हालात अलग नजर आ रहे हैं। फर्क यह है कि अब असंतोष केवल बंद कमरों तक सीमित नहीं है, बल्कि खुले तौर पर सामने आ रहा है।

नगर निकायों में टूट, नेताओं की नाराजगी, भ्रष्टाचार के आरोप और बीजेपी की बढ़ती सक्रियता ने बंगाल की राजनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता बनर्जी एक बार फिर पार्टी को संभाल पाएंगी या बंगाल की राजनीति में सत्ता संतुलन बदलने वाला है।

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