अयोध्या मसला: गैर विवादित जमीन लौटाने से और जटिल हो जाएगा मूल विवाद
नई दिल्ली। 2019 के आम चुनाव की बेला आ चुकी है। औपचारिक घोषणा का बस एलान बाकी है। चुनाव का अभियान भी अघोषित तरीके से शुरू हो चुका है। लोकलुभावन नारे और वादे गढ़े जा रहे हैं। कहे-अनकहे अयोध्या का विवाद हर चुनाव की तरह इस चुनाव में भी मुद्दा रहेगा। केंद्र और यूपी में बीजेपी की सरकार है और इन सरकारों का नेतृत्व कर रही बीजेपी के घोषणापत्र का हिस्सा है राम मंदिर निर्माण। यह मसला सुप्रीम कोर्ट में है। मगर, अदालत के बाहर की गतिविधियां मतदान आते-आते चरम पर पहुंच जाती है। इसी पृष्ठभूमि में मंगलवार को केंद्र सरकार की उस पहल को देखने की जरूरत है जिसमें उसने सुप्रीम कोर्ट से अनुमति मांगी है कि उसे अयोध्या विवाद से जुड़ी अधिग्रहीत गैर विवादित ज़मीन उनके मालिकों को लौटाने दिया जाए।

क्या पूरा हो चुका है अधिग्रहीत जमीन का मकसद?
मसला सवाल के साथ ही शुरू होता है कि क्या ज़मीन को अधिग्रहीत करने का जो फैसला केंद्र सरकार (तत्कालीन नरसिम्हाराव सरकार) ने लिया था, उसका मकसद पूरा हो चुका है? क्या था मकसद? तत्कालीन नरसिम्हाराव सरकार ने 1993 में ज़मीन अधिग्रहण का मकसद यह बताया था कि विवाद के निपटारे के बाद इस जमीन पर कब्जे या उपयोग में कोई बाधा नहीं होगी।

मकसद अधूरा, फिर भी हड़बड़ी!
अभी तो विवाद का निपटारा हुआ ही नहीं है! फिर ज़मीन के उपयोग को लेकर केंद्र सरकार को क्या हड़ब़ड़ी है? हड़बड़ी बस चुनाव है। चुनाव के वक्त केंद्र सरकार राम मंदिर निर्माण के लिए कुछ करते दिखना चाहती है। अगर केंद्र सरकार की इस पहले के ऐसे मायने-मतलब न भी निकालें और सिर्फ उसके तर्क को देखें तो सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया है कि राम जन्मभूमि न्यास चाहता है कि उसे उसकी ज़मीन लौटा दी जाए, जो विवादित नहीं है और सरकार ने अधिग्रहीत कर रखी है। वास्तव में जो गैर विवादित 67 एकड़ जमीन है उसमें सबसे बड़ा हिस्सा राम जन्मभूमि न्यास का ही है। यह 42 एकड़ है।

खुद ठुकरा चुका है केंद्र अधिग्रहीत ज़मीन लौटाने की मांग
राम जन्मभूमि न्यास अपनी गैर विवादित ज़मीन उसे सौंपने की मांग बहुत पहले से करते रहे हैं। खुद केंद्र सरकार ने 1996 में यह मांग ठुकरा दी थी। इतना ही नहीं 1994 में इस्माइल फारूकी मामले में सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि विवादित जमीन पर कोर्ट का फैसला आने के बाद ही गैर विवादित जमीन को उनके मूल मालिकों को लौटाने पर विचार हो सकता है। न्यास की मांग इलाहाबाद हाईकोर्ट भी 1997 में खारिज कर चुका है। ऐसे में केंद्र सरकार को वह आधार या तर्क बताना होगा कि क्यों अधिग्रहीत ज़मीन लौटा दी जानी चाहिए। ऐसी नयी बात क्या हो गयी है जिसके आलोक में इस मांग पर विचार किया जाए।
दरअसल केंद्र सरकार की पहल सक्रिय रहने भर की है और राजनीतिक रूप से सत्ताधारी दल यह संकेत देना चाहते हैं मानो उन्हें केंद्र और राज्य में सरकार बनाने का मकसद अधूरा नहीं रहा है। राम मंदिर का जो वादा घोषणापत्र में किया गया है, उसके प्रति पार्टी और सरकार गम्भीर रही है। ऐसा संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि गैर विवादित जमीन हाथ में आ जाने के बाद वहां मंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी, भले ही विवादित जमीन पर अदालत का फैसला लम्बित रहे। लेकिन क्या ऐसा हो सकता है?

गैर विवादित जमीन को अलग करके नहीं देख सकते
2002 में गैर विवादित जमीन पर पूजा और अनुष्ठान कराने की कोशिश हुई थी। तब इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी। असलम भूरे की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में 67 एकड़ जमीन पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। उसके बाद ही यह तय हो गया था कि गैर विवादित जमीन पर भी पूजा या कोई अनुष्ठान नहीं हो सकता। उसी समय सुप्रीम कोर्ट ने ये साफ कर दिया था कि विवादित और गैर विवादित जमीन को अलग करके नहीं देखा जा सकता। बात साफ है कि तर्क की कसौटी पर न अधिग्रहीत ज़मीन मूल मालिकों को लौटाने की कोई नयी वजह है और न ही इससे राम मंदिर विवाद को हल करने में किसी सहूलियत की सम्भावना। अधिग्रहीत जमीन लौटायी गयी और उसका कोई ऐसा उपयोग शुरू हो गया जिससे मूल विवाद को हल करने में मुश्किल हो, तो यह नयी मुसीबत होगी। ऐसा नहीं हो सकता कि मंदिर निर्माण को दो हिस्सों में बांट लें। एक गैर विवादित ज़मीन पर मंदिर निर्माण और दूसरा विवादित ज़मीन पर मदिर निर्माण और बाद में इन दोनों को एक करने का लक्ष्य बता दिया जाए। यह एक किस्म की चालबाजी होगी, जो राम मंदिर निर्माण से जुड़े विवाद को हल करने में और मुश्किलें पैदा करेगी। ऐसे में मूल विवाद सुलझने के बजाए और भी जटिल हो जाएगा।












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