Geeta Press: त्याग और सेवा की संस्कृति का प्रतीक है गीताप्रेस
Geeta Press: गीता प्रेस गोरखपुर को मिले अंतरराष्ट्रीय गांधी शांति पुरस्कार पर अहिन्दू धड़े ने विरोध तो किया लेकिन पुरस्कार के रूप में एक करोड़ रूपये की राशि को अस्वीकार करके गीता प्रेस संचालकों ने साबित कर दिया कि वो धन या प्रसिद्धि के लिए धर्म का काम नहीं करते। उनकी प्रतिबद्घता मानस सेवा के प्रति है जिसे वो सौ साल से त्यागपूर्वक निरंतर करते आ रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे।
लेकिन स्वतंत्र भारत में ऐसा नैरेटिव स्थापित किया गया, जिससे हिंदुत्व और उसके संस्थानों को लेकर नकारात्मक धारणाएं विकसित हुई हैं। हिन्दू धर्म के प्रतीकों, पुजारियों और उससे जुड़े संस्थानों को लालची, लोभी, अतिवादी आदि-आदि बताने का जो खेल शुरू हुआ, उसकी वजह से बाद की पीढ़ियों की धारणा इसी नैरेटिव के आधार पर ही बनी और विकसित हुई। वसुधैव कुटुंबकम् की हिंदुत्व की सोच को सिरे से नकार दिया गया। सनातनी संस्कृति की दधिचि और शिवि की आत्मोसर्ग और त्याग की परंपरा को भी खारिज कर दिया गया।

यही वजह है कि जब गीता प्रेस को अंतरराष्ट्रीय गांधी शांति पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई तो हिंदुत्व विरोध की राजनीति मुखर हो गई। दिलचस्प यह है कि छत्तीसगढ़ में राम को पूज रही कांग्रेस के प्रमुख नेता जयराम रमेश सामने आ गए। उन्होंने गीता प्रेस को सम्मानित करने के फैसले को सावरकर और गोडसे को सम्मानित करने जैसा बता दिया। लेकिन गीता प्रेस और उसके संचालकों ने जो फैसला लिया है, वह कांग्रेस जैसी विचारधाराओं ही नहीं, हिंदुत्ववादी दर्शन को विकृत दिखाने वाली सोच पर भी करारी चोट है।
गीता प्रेस के संचालकों ने घोषणा कर दी है कि सम्मान के साथ मिलने वाली एक करोड़ की पुरस्कार राशि को वे नहीं लेंगे। गीता प्रेस के बारे में अक्सर यह खबर आती रही है कि किताबों की छपाई की बढ़ती लागत को प्रेस और उसका ट्रस्ट वहन नहीं कर पा रहा है, इसलिए जल्द ही गीता प्रेस बंद हो जाएगा। बाजार की दर से बेहद कम कीमत में साफ-सुथरी छपाई के साथ बिना किसी प्रूफ और भाषायी गलती के साथ बयालिस करोड़ से ज्यादा पुस्तकें और पुस्तिकाएं छापना और उन्हें बेच पाना मामूली बात नहीं है। कायदे से गीता प्रेस की इस प्रतिबद्धता, उसकी पवित्र सोच का सम्मान होना चाहिए, लेकिन हिंदुत्व विरोधी ताकतों को ऐसी बातें पचती कहां हैं?
जिस संस्था के बारे में माना जा रहा है कि वह बढ़ती लागत का आर्थिक बोझ बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है, उसके लिए एक-एक रूपए की कीमत बड़ी होती है। फिर भी उन्होंने सम्मान के साथ मिलने वाली एक करोड़ की राशि नहीं लेने की घोषणा करके अपने त्याग और समर्पण भाव को ही प्रदर्शित किया है। भारतीय परंपरा में मूल्यों की प्रतिष्ठा कैसी रही है, इससे शास्त्र भरे पड़े हैं, इतिहास की कहानियां भी हैं, जिनमें लोगों ने अपना जीवन होम करना उचित समझा, लेकिन अपने मूल्यों और प्रतिबद्धता से समझौता नहीं किया। आज का दौर समझौतों का दौर है। इसलिए मान लिया गया है कि अगर किसी के सामने लालच का कोई जरिया उपस्थित कर दिया जाए तो वह अपनी प्रतिबद्धता और मूल्यों को तिरोहित करने में देर नहीं लगाएगा। विशेषकर जिनके साथ अभावों की अंतहीन स्थितियां रही हों, वह तुरंत झुक जाएगा। लेकिन जिन्हें जीवन मूल्य और उसके प्रति प्रतिबद्धता पता होती है, अपनी संस्कृति से प्यार होता है, उसके प्रति जिनमें सम्मान का भाव रहता है, उनके सामने अर्थ, पद और राजकीय प्रतिष्ठा का कोई मान नहीं रह जाता।
गीता प्रेस चूंकि भारतीय संस्कृति, हिंदुत्व की उदात्त परंपरा का गायक है, जो सनातनी संस्कृति का प्रतीक बन चुका है, उसे अगर एक करोड़ रूपए की रकम उसकी मूल्यबद्धता का क्षरण लगता है तो इस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। गीता प्रेस ने एक करोड़ रूपए की रकम को ठुकरा कर अपनी विरासत और संस्कृति का ना सिर्फ सम्मान किया है, बल्कि उसको नई प्रतिष्ठा दी है। इससे अंतरराष्ट्रीय गांधी शांति पुरस्कार की प्रतिष्ठा ही बढ़ेगी। इस पुरस्कार की पहले से ही प्रतिष्ठा रही है, गीता प्रेस के कदम से उसकी चमक ही बढ़ेगी।
गीता प्रेस के कदम से सात साल पहले की एक और घटना की स्मृति ताजा होना स्वाभाविक है। चार मई 2016 को भारत के राष्ट्रपति ने कुछ गिने-चुने लोगों को संसद के उपरी सदन राज्यसभा के लिए नामित करने की घोषणा की। संसद की सदस्यता के लिए सक्षम लोग क्या-क्या कर्म-सत्कर्म नहीं करते! लेकिन उस बार की सूची में एक नाम ऐसा भी था, जिसने राष्ट्रपति की घोषणा का सम्मान तो किया, लेकिन पूरी विनम्रता के साथ राज्यसभा की सदस्यता का प्रस्ताव स्वीकार करने से इंकार कर दिया।
दिलचस्प यह है कि वह शख्सियत भी उसी हिंदुत्ववादी विचारधारा को बढ़ाने की दिशा में लगातार सक्रिय है, जिसे मौजूदा दौर का एक धड़ा क्या-क्या नहीं साबित करता। छह मई 2016 के दिन राज्यसभा की सदस्यता को अस्वीकार करने वाली हस्ती रहे गायत्री परिवार के प्रमुख प्रणव पंड्या। गायत्री परिवार को देश-दुनिया युग निर्माण योजना के नाम से भी जानती है। गायत्री परिवार के आश्रमों में सादगी, सदाचार और सनातन संस्कृति के हिसाब से आचरण पर जोर रहता है। ऐसे गायत्री परिवार के प्रमुख प्रणव पंड्या अगर राज्यसभा का सदस्य बनना स्वीकार कर लेते तो उनकी वह प्रतिष्ठा नहीं रह पाती, जैसी इस राजपद को अस्वीकार करने के बाद उनकी बनी है।
हिंदू विरोधियों को बताना चाहिए कि ऐसे कितने लोग दुनिया में होते हैं, जिनके जीवन मूल्य के सामने करोड़ों की रकम कोई मोल नहीं रखती। कितने लोग ऐसे होते हैं, जिन्हें राजपद की चमक नहीं लुभाती, उलटे वे अपनी सादगी में ही डूबे रहना चाहते हैं। गीता प्रेस हो या प्रणव पंड्या, वे धर्म की उसी परंपरा के वाहक और प्रतीक हैं, जिसे आए दिन मौजूदा हर बुराई के लिए जिम्मेदार ठहराने की कोशिश होती है।
गीता प्रेस और प्रणव पंड्या जैसे लोगों का आचरण हिंदुत्व की मूल वैचारिकी है। हिंदुत्व की धारा इसी सोच के साथ जीती है। अपवाद हर जगह होते हैं, बुराइयां अपवाद होतीं हैं, मुख्यधारा नहीं। इसलिए बुराइयों को अपवाद के ही रूप में स्वीकार करना चाहिए, मुख्यधारा लोकवृत्त के मूल्य होते हैं। प्रतिष्ठा उनकी ही होनी चाहिए और प्रतिनिधि गुणों के रूप में उनका ही सम्मान होना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या हिंदुत्व विरोधी नैरेटिव इसे स्वीकार करने को तैयार है?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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