Ganesh in Tamil Culture: शैवभूमि तमिलनाडु के पिलयर देवता गणेश
Ganesh in Tamil Culture: बात गणेश चतुर्थी के मौके पर वर्ष 2020 की है। हाल में ही सनातन धर्म को समाप्त करनेवाली टिप्पणी कर चर्चा में आये डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन ने ट्विटर पर एक फोटो शेयर किया। यह फोटो उनकी बेटी तन्मया की थी जो हाथ में मिट्टी से बने गणेश को थामे खड़ी है। हालांकि फोटो में न कोई कैप्शन था और न ही उनकी बेटी का चेहरा दिख रहा था लेकिन इस ट्वीट के बाद द्रविड़ राजनीति में भूचाल आ गया।
हंगामा बहुत हुआ तो उदयनिधि स्टालिन ने सफाई दी कि यह गणेश मूर्ति उनकी मां दुर्गा स्टालिन ने घर में स्थापित करने के लिए मंगाई थी। वो चाहती थी कि बेटी के साथ इस तस्वीर को शेयर करूं इसलिए सोशल मीडिया पर शेयर कर दिया। हालांकि इतने से डीएमके राजनीति में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं आ गया लेकिन यह इस बात का संकेत था कि तमिलनाडु में भगवान गणेश कितने गहरे व्याप्त हैं कि धर्म विरोधी द्रविड़ राजनीति करनेवाले के घर में भी प्रविष्ट हो गये।

तमिलनाडु में गणेश को आमतौर पर पिलयर (Pillayar) कहकर संबोधित किया जाता है जिसका अर्थ होता है बालरूप देवता। शैव भूमि तमिलनाडु के समाज में गणेश बाल रूप में ही अधिक स्वीकार्य हैं और उनको उसी रूप में अधिक महत्व प्राप्त है। इसलिए बाल देवता के रूप में इन्हें पिलयर कहकर संबोधित किया जाता है। तमिलनाडु में गणेश की महत्ता इस रूप में भी है कि इन्हें स्थापित करने के लिए किसी मंदिर की जरूरत नहीं होती। वो आसानी से कहीं भी विराजमान हो जाते हैं, घर में या फिर घर के बाहर बगीचे में।
महाराष्ट्र की तरह तमिलनाडु में गणेश चतुर्थी सार्वजनिक रूप से सामाजिक उत्सव न होकर पारिवारिक महत्व का उत्सव अधिक होता है। तमिल समाज के लोग मानते हैं कि गणेश उनके लिए बालरूप देवता हैं जो घर के एक सदस्य की तरह हैं। वो न केवल मुरुगन (कार्तिकेय) के भाई हैं बल्कि शिव पार्वती के पुत्र भी हैं। इसलिए लंबे समय से शैवभूमि तमिलनाडु में गणेश का विशिष्ट महत्व है।
इस बारे में एक कहानी यहां प्रचलित है कि एक बार लंका के राजा विभीषण कावेरी नदी में स्नान करने के लिए आये। उनके हाथ में भगवान विष्णु की प्रतिमा थी। वो स्नान तो करना चाहते थे लेकिन प्रतिमा को धरती पर नहीं रखना चाहते थे क्योंकि एक बार वो प्रतिमा को भूमि पर रख देते तो वह वहीं जम जाती। तब विनायक (गणेश) एक चरवाहे के रूप में वहां प्रकट होते हैं और भगवान विष्णु की प्रतिमा को अपने हाथ में थामकर रखते हैं। लेकिन जैसे ही विभीषण कावेरी में डुबकी लगाते हैं विनायक उस विष्णु प्रतिमा को वहीं नदी किनारे रख देते हैं जिसे अब श्रीरंगम के नाम से जाना जाता है।
गणेश या विनायक को लेकर ऐसी ही अनेक कहानियां और कुछ ऐतिहासिक घटनाएं तमिलनाडु में काफी प्रचलित हैं। जैसे, पल्लव वंश और चालुक्य वंश के बीच 642 में हुए एक युद्ध का सेनापति परनजोति था। परनजोति पल्लव सेना का नेतृत्व कर रहा था। इस लड़ाई में चालुक्यों की हार हुई और वहां से वापस लौटते समय परनजोति जीत के प्रतीक के रूप में गणेश की एक प्रतिमा लाया और उसे वर्तमान नागपट्टनम जिले के उथरापतिस्वामी मंदिर में रख दिया। इन्हें वर्तमान में वातापि गणपति कहा जाता है। कालांतर में परनजोति स्वयं भी एक शैव सन्यासी बन गया था।
पिलयरापट्टी गणेश का इतिहास इससे भी पुराना बताया जाता है। बताया जाता है कि पिलयारपट्टी गणेश पांड्य शासन के दौरान चौथी सदी में या फिर उससे भी बहुत पहले स्थापित किया गया था। एक तमिल कवि काबिलर का गीत है जिसमें वो एक प्राचीन सरदार परी का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि जिस तरह से (विनायक) भगवान सभी लोगों द्वारा बेकार समझे जाने वाले मदार के पुष्प को स्वीकार करते हैं उसी तरह परी उन लोगों को भी उपहार देती है जिसे दूसरे लोग हाशिये पर रखते हैं। इस कविता का प्रभाव है कि तमिल संस्कृति में गणेश को मदार का फूल विशेष रूप से अर्पित किया जाता है।
विल्लुपुरम में एक शिलालेख मिला है जो चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व का बताया जाता है। इस शिलालेख के साथ एक गणेश प्रतिमा भी प्राप्त हुई थी जिसकी ऊंचाई 75 सेमी है। इससे पुरातत्वविद मानते हैं कि तमिलनाडु में गणेश की उपस्थिति चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व या उससे भी पहले से हो सकती है। हालांकि करीब दो से ढाई हजार साल पुराना इतिहास होने के बाद भी डीएमके की नास्तिक राजनीति के उभार का शिकार विनायक या गणेश भी हुए। डीएमके के उभार के समय गणेश को आर्य देवता बताकर उनका बहिष्कार करने का ऐलान किया गया। आज भी कुछ डीएमके नेता गणेश की मूर्तियों को सिर्फ इसलिए तोड़ते दिखाई देते हैं क्योंकि उनका आरोप है कि गणेश तमिल देवता नहीं हैं बल्कि बाहर से आये हैं।
डीएमके की राजनीति करनेवाले लोग परनजोति की उसी कहानी को आधार बनाते हैं जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है लेकिन जो पुरातात्विक साक्ष्य हैं वो तमिल संस्कृति में उससे भी पहले से गणेश के होने की गवाही देते हैं। बहरहाल आज जिस बालरूप विनायक का तमिल संस्कृति में महत्व बढ़ा है उसका मूल विनायकर अगवाल है। चौदहवीं सदी में रचे गये विनायकर अगवाल में गणेश की बालरूप में महिमा बतायी गयी है जिसका श्रेय कवियित्री अवैयार को दिया जाता है।
किंवदंती है कि जब महान शिवभक्त सुंदरर ने शिव के निवासस्थान कैलाश जाने का निर्णय लिया तो अवैयार ने भी वहां जाने की इच्छा जताई। तब विनायक (गणेश) ने अवैयार से वादा किया कि अगर वह उनके बारे में एक सुंदर कविता लिखे तो वह सुंदरर से भी पहले उन्हें वहां पहुंचा देंगे। इसी का परिणाम विनायकर अगवार ग्रंथ है जो तमिलनाडु के बच्चे बच्चे में लोकप्रिय है। इसी ग्रंथ का ही परिणाम है कि गणेश को बाल देवता के रूप में तमिल संस्कृति में मान्यता मिल गयी जिससे डीएमके नेता उदयनिधि की बेटी तन्मया को भी लगाव है।
गणेश चतुर्थी का जितना महत्व महाराष्ट्र में है लगभग वैसा ही महत्व तमिलनाडु में भी है। अंतर बस इतना है कि महाराष्ट्र की तरह व्यापक सार्वजनिक उत्सव कम होते हैं और अधिकतर लोग घर पर ही बालरूप गणेश को स्थापित कर उनकी पूजा करते हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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