Nepal: 15 साल में 13 प्रधानमंत्री देखने वाले नेपाल में जारी है शह मात का खेल
राजशाही के विकल्प के रूप में नेपाल में जो लोकतंत्र आया वह शतरंजी चाल का शिकार हो गया है। 15 साल के लोकतंत्र में अब तक 13 PM शपथ ले चुके हैं, फिर भी नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियां शह मात की चाल चलने से परहेज नहीं करतीं।

Nepal: अप्रैल 2008 में परंपरागत राजशाही को समाप्त कर नेपाल में संघीय लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की स्थापना हुई। दुनिया भर में तब इसकी खूब प्रशंसा हुई और नेपाल के आम लोगों की खुशी कुछ ऐसी थी मानो उन्हें किसी विदेशी शासन से आजादी मिली हो। लेकिन मात्र 15 वर्ष की अवधि में नेपाल के राजनीतिक दलों ने दल-बदल, अवसरवाद, टकराव, खींचतान, सरकार बनाने और गिराने, पार्टियों के विलय, टूट आदि का अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया है।
15 वर्षों में नेपाल के लोग 13 प्रधानमंत्री, दो दर्जन से अधिक गठबंधन, अनगिनत अविश्वास प्रस्ताव आदि देख चुके हैं। इसलिए सीपीएन-एमसी के वर्तमान प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहल 'प्रचंड' को दो महीने के भीतर दोबारा विश्वासमत प्राप्त करने की आवश्यकता हो गई है, तो यह अप्रत्याशित नहीं है।
नेपाल की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी सीपीएन-यूएमएल ने पुष्प कमल दाहल 'प्रचंड' की साझा सरकार से समर्थन वापस ले लिया है। पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की पार्टी सीपीएन-यूएमएल ने कहा है कि 'राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं, इसलिए वो समर्थन वापस ले रहे हैं।' यूएमएल के नेताओं का कहना है कि प्रचंड की पार्टी सीपीएन (एमसी) ने राष्ट्रपति चुनाव में यूएमएल के उम्मीदवार को समर्थन देने का वचन भंग कर दिया है। 10 जनवरी को हुए समझौते में यह वादा किया गया था कि प्रचंड की पार्टी राष्ट्रपति चुनाव में यूएमएल के उम्मीदवार का समर्थन करेगी।
उल्लेखनीय है कि नेपाल में नौ मार्च को राष्ट्रपति का चुनाव होना है। भारत की तरह नेपाल में भी राष्ट्रपति का चुनाव जनप्रतिनिधियों के मतों से होता है। चुनाव में देश की सबसे बड़ी पार्टी नेपाली कांग्रेस के रामचंद्र पंडौल और दूसरी बड़ी पार्टी सीपीएन (यूएमएल) के सुभाषचंद्र नेमवांग आमने-सामने हैं।
नेपाल की शतरंजी राजनीति के लिए यह कोई नई बात नहीं है। वहां की लगभग सभी प्रमुख पार्टियां 15 वर्षों के भीतर कभी न कभी एक-दूसरे के साथ गठबंधन कर चुकी हैं और लगभग सभी गठबंधन असमय टूटे हैं। लेकिन सीपीएन (एमसी) और यूएमएल की हालिया टूट कई मामलों में पूर्व की टूट से भिन्न है।
गौरतलब है कि पिछले संसदीय चुनाव में सीपीएन (एमसी) ने नेपाली कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन कर चुनाव लड़ा था। लेकिन प्रतिनिधि सभा (संसद) की सीट के मामले में नेपाली कांग्रेस से बहुत पीछे रह गए प्रचंड सरकार बनाने के लिए यूएमएल से मिल गए। प्रचंड को हर हाल में प्रधानमंत्री बनने की जिद थी, लेकिन उनके पास मात्र 32 सीटें थीं। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर 89 सीटों वाली नेपाली कांग्रेस का दावा स्वभाविक था। प्रचंड ने नेपाली कांग्रेस को आखिरी समय में धोखा देकर यूएमएल और आरपीपी के साथ साझा सरकार बना ली। अघोषित समझौता यह हुआ कि प्रतिनिधि सभा के आधे कार्यकाल यानी ढाई साल बाद सीपीएन (एमसी) यूएमएल के नेता केपी शर्मा ओली को प्रधानमंत्री की कुर्सी सौंप देंगे।
नेपाली राजनीति के विश्लेषकों का मानना है कि प्रचंड ने भले ही यूएमएल से समर्थन प्राप्त करने हेतु आधे-आधे समय के लिए प्रधानमंत्री पद की डील स्वीकार कर ली थी, लेकिन अंदर से उनकी ऐसी कोई इच्छा नहीं थी। भारत की ही तरह नेपाल में भी कुछ मौकों पर राष्ट्रपति की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। सरकार बनाने के लिए आमंत्रण देने और विश्वास मत हासिल करने का आदेश देने में राष्ट्रपति अपने विवेकाधिकार का उपयोग करते हैं। यही कारण है कि वादे के बाद भी प्रचंड ने यूएमएल के नेता सुभाषचंद्र नेमवांग को राष्ट्रपति बनाने से इनकार कर दिया। सुभाषचंद्र नेमवांग और प्रचंड के बीच लम्बे समय से प्रतिद्वंद्विता रही है।
नेपाली संविधान के अनुसार राष्ट्रपति तीस दिन के भीतर प्रचंड को प्रतिनिधि सभा में विश्वास मत हासिल करने का आदेश दे सकते हैं। लेकिन मौजूदा राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी का कार्यकाल 13 मार्च को समाप्त होने वाला है और 9 मार्च को नए राष्ट्रपति का चुनाव होने वाला है। ऐसी परिस्थिति में प्रचंड पर तुरंत बहुमत साबित करने का दबाव नहीं है। बहुमत के लिए सीपीएन-(एमसी) को 138 सीट की आवश्यकता होगी। नेपाली कांग्रेस (89 सीट), माधव कुमार नेपाल की सीपीएन यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी (10 सीट) और इस फोल्डर की अन्य छोटी पार्टियों की मदद से वे इस आंकड़े को आराम से प्राप्त करते दिख रहे हैं।
लेकिन असल सियासी संकट इसके बाद शुरू होने की संभावना है। गौरतलब है कि नेपाली कांग्रेस और प्रचंड के बीच राजशाही के जमाने से ही प्रतिद्वंद्विता चलती आ रही है। नेपाली कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने के लिए कम्युनिस्ट एकता के नाम पर कई बार प्रचंड ने ऑल कम्युनिष्ट अलायंस तैयार किया। नेपाली कांग्रेस को रोकने के लिए ही चिर-प्रतिद्वंद्वी सीपीएन (एमसी) और यूएमएल ने 2020 में आपस में विलय कर लिया था। कहा जाता है कि इसमें नेपाल में मौजूद चीनी दूतावास ने भी कड़ी मेहनत की। यह अलग बात है कि विलय जल्द ही विखंडन में बदल गया और दोनों पार्टी वापस अपने पुराने स्वरूप में आ गई।
खबरों के अनुसार प्रचंड, नेपाली कांग्रेस नेता शेरबहादुर देउबा और सीपीएन यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी के नेता माधव कुमार के बीच गुप्त डील हुई है। इसके अनुसार, ये तीनों नेता बारी-बारी से प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालेंगे और सदन में एक-दूसरे का समर्थन करेंगे। नेपाली राजनेताओं के पिछले रिकार्ड को देखते हुए इस डील के पूरे होने की संभावना बहुत कम है।
लेकिन सत्ताई अवसरवादिता के इतर अगर नेपाल के हालात पर गौर करें, तो स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। नेपाल की आर्थिक नीतियों में चीनी हस्तक्षेप और अन्य कारणों से नेपाल का विदेशी मुद्रा भंडार खाली होने के कगार पर है। महंगाई और बेरोजगारी चरम पर है। भारत की मदद से नेपाल की अर्थव्यवस्था कई बार कंगाल होने से बची है। चीन मदद और कर्ज की शर्तें को कठोर करता जा रहा है। लेकिन नेपाल के राजनेताओं को कुर्सी के खेल से ही फुर्सत नहीं है। आने वाले समय में नेपाल राजनीतिक उथल पुथल ही नहीं, अपनी डगमगाती अर्थव्यवस्था के कारण भी दुनिया की निगाह में रहेगा।
यह भी पढ़ें: नेपाल में खतरे में आई प्रचंड सरकार, RSP के बाद अब राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी ने छोड़ा साथ
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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