Festivals and Traditions: सिर्फ छठ ही नहीं, भारत के सभी पर्व लोकपर्व हैं
Festivals and Traditions: छठ के नजदीक आते ही इसे लोकपर्व और लोकपरम्पराओं से चलने वाला बताने की होड़ लग जाती है। असल में इसे लोक पर्व बताने के पीछे मंशा होती है यह दर्शाना कि कैसे इसमें किसी पुरोहित को नहीं बुलाना पड़ता। इस सवाल से दूसरा सवाल तुरंत ही पैदा होता है कि तो भला किस पर्व को मनाने के लिए पुरोहित आवश्यक है?

असल में मनुवाद कहकर, ब्राह्मणवाद बताकर समाज को तोड़ने की एक साजिश रची जाती है। इससे वो पुरानी जर्मन कविता सी याद आ जाती है जिसमें गवाह कहता है 'पहले वो समाजवादियों के लिए आये, मैं समाजवादी नहीं था इसलिए चुप रहा। फिर वो मजदूर यूनियन वालों के लिए आये, मैं यूनियन वाला भी नहीं था इसलिए मैं चुप रहा। इसी तरह अंत में जब वो मेरे लिए आये, तो मेरे पक्ष से बोलने को कोई बचा ही नहीं था।' समाज को तोड़ने की ऐसी कोशिशों को भी सामाजिक जुटाव के पर्व-त्योहारों पर पहचाना जाना आवश्यक है।
भारत सांस्कृतिक विविधताओं का देश है, इसलिए जैसे कहीं और अधिक प्रचलित त्यौहार करवाचौथ के बारे में लोगों को पता होता है, वैसे ही किसी दूसरे क्षेत्र में चलने वाले छठ पर्व के बारे में भी देश भर में जानकारी तो होती ही है।
संभवतः यही कारण रहा होगा कि जब एक तथाकथित मॉडर्न महिला ने पहनावे या रहन-सहन का मजाक उड़ाने की घटिया कोशिश की तो देश भर की कई स्त्रियों ने नाक से सिन्दूर लगाकर चित्र सोशल मीडिया पर डालना शुरू कर दिया था।
हिन्दुओं के लिए अपने से भिन्न समुदायों की परम्पराओं को उचित सम्मान देना, उनमें स्वयं भी भागीदारी करना, कोई नयी या बड़ी बात कभी रही ही नहीं। इस वजह से विदेशों में जहाँ "सेलिब्रेटिंग डाइवर्सिटी" एक बड़ी बात होती है, वहीँ ये भारत के लिए कोई विचित्र या नया कांसेप्ट कभी नहीं बन पाया।
छठ में पंडे-पुरोहित की जरुरत नहीं होती है। बहुत सही बात है। अब ये बताइये कि कुछ ही दिन पहले जो भाई दूज (भातृ-द्वितीय या भरदुतिया) किया था, या करते आ रहे हैं, उसमें कौन से पुरोहित बुलाये जाते हैं? मंदिरों के आयोजन छोड़ दें तो नवरात्रि पर घरों में कौन से पंडित बुलाये जाते हैं? मंदिरों या सार्वजनिक स्थलों पर किसी का एकाधिकार नहीं होता इसलिए वहाँ यजमान के साथ एक पुरोहित बैठता है। ऐसे ही दीपावली पर व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को छोड़ दें, तो कितने घरों में पंडित पूजा के लिए बुलाये जाते हैं?
कोई अनुष्ठान करने के लिए पंडित रक्षाबंधन पर नहीं बुलाये जाते, होलिका दहन या होली पर भी नहीं बुलाये जाते। हिन्दुओं के अधिकांश आयोजन तो पंडितों के बिना ही होते हैं।
विवाह जैसे आयोजनों में भी देखेंगे तो पाएंगे कि मंत्रपाठ का जिम्मा भले पंडित का हो लेकिन सारे विधि-विधानों का जिम्मा तो किसी नाई और घर की ही किसी महिला के हाथ में होते हैं। वट-सावित्री अभी-अभी बीता है, करवाचौथ को भी अधिक समय नहीं हुआ। किसी में पंडित को बुलाकर पूजा करवाना याद आता है क्या?
हिन्दुओं के तमाम आयोजन पंडितों के बिना ही होते हैं। विधियों को शास्त्रोक्त और शुद्ध रखने के लिए कभी-कभार पंडितों को बुला लिया जाए ऐसा हो सकता है। आयोजन अधिक वृहत हो और घर के लोग आने वाले अतिथियों-आगंतुकों को अधिक समय दे सकें इसके लिए ऐसे पर्व या पूजा पाठ पर पंडितों को बुलाया जाता है।
ये बिलकुल वैसा ही है जैसे आपके विवाह के आयोजनों में होने लगा है। थोड़े समय पहले तक गाँव में कोई टेंट हाउस तो होता नहीं था। पूरी बरात के लिए भोजन बनाना हो तो अड़ोस-पड़ोस के घरों से बर्तन जुटते थे। शहर पलायन करके आ गए लोगों की इतनी जानपहचान ही नहीं होती कि बर्तन जुटाए जा सकें, इसलिए किराये पर बर्तन आने लगे।
पहले लोग मानते थे कि लड़की के विवाह की सूचना ही आमंत्रण है। बिना बुलाये ही लोग कुर्सियां सजाने से लेकर जूठी पत्तलें उठाने तक आ जुटते थे। आज संयुक्त परिवार तक तो है नहीं, चार लोगों के घर में उतने लोग इकठ्ठा ही नहीं होंगे इसलिए किसी कैटरर को बुलाया जाता है। वो खाना परोसने-खिलाने में जुटा होता है तो घर के लोग मेहमानों का स्वागत कर पाते हैं।
जहां तक शुद्धता की बात है तो जैसे बिना नहाये हर कोई दूसरी किसी तथाकथित विधि-विधान वाली पूजा का सामान नहीं छू सकता, वैसी ही पाबन्दी छठ के लिए आये सामान पर लागू होती है। घर के जिस हिस्से में रखा होता है, वहाँ जाना बच्चों के लिए भी प्रतिबंधित होता है। जैसे कठिन उपवास छठ के लिए होते हैं, वैसा ही कठिन उपवास तो जिउतिया, वट-सावित्री जैसे बिना पंडित वाले व्रतों में भी होता है न?
पंडित जी वाली पूजा में जैसे दूब चाहिए, शंख चाहिए, वैसे ही यहाँ गुड़ के बदले चीनी डालकर काम नहीं चला सकते। लौकी-कद्दू के बदले आलू-गोभी बनाने लगे हैं क्या? सूप और दौरी-छिट्टा, डगरा जैसे बांस के बने के बदले प्लास्टिक वाला बर्तन प्रयोग में लाने लगे हैं? मुहूर्त अगर पंडित जी वाली पूजा में होता है तो छठ में भी सूर्योदय से पहले घाट पर जाने के बदले दस बजे ऊँघते हुए घाट पर नहीं जाते हैं। सूर्यास्त के पहले पहुँचने के बदले आठ बजे ऑफिस का काम निपटाकर या दुकान बढ़ाने के बाद नहीं पहुँचते। मुहूर्त का ध्यान भी रखते हैं।
ज़ात-पांत नहीं पूछी जाती का बेकार का राग भी बार बार गाया जाता है। होली में आप पर कौन रंग डालेगा, कौन नहीं, ये अगर आप ज़ात पूछकर तय करते थे तो आप घनघोर असामाजिक तत्व हैं। पंडाल लगाकर पूजा करना बहुत बाद में आई व्यवस्था है।
इसलिए अगर सरस्वती पूजा, या दुर्गा पूजा जैसे अवसरों पर आपने ज़ात पूछकर किसी को पंडाल में आने से रोका होता तो आप ऐसे ही एससी/एसटी एक्ट में जेल में चक्की पीस रहे होते। सिर्फ छठ ही क्यों भारत के किसी सार्वजनिक उत्सव, त्यौहार और पर्व में ज़ात-पांत नहीं होती।
छठ के बारे में बताना ही है तो ये बताइये कि जैसे हिन्दुओं के सभी त्यौहार सामाजिक रूप से मनाये जाते हैं, ये भी वैसा ही है। जैसे रावण दहन या होलिका दहन के लिए समाज इकठ्ठा होता है, रामलीला के आयोजनों में सभी आते हैं, वैसे ही यहाँ भी सभी सम्मिलित होते हैं। जैसे हिन्दुओं का कोई भी त्यौहार, कोई भी मंदिर, समाज के सभी वर्गों के लिए आय सुनिश्चित करने का साधन है, चाहे वो हलवाई हो, फूल बेचने वाले हों, बिलकुल वैसे ही यहाँ भी सूप बनाने वाले से लेकर कृषक तक सभी वर्गों के पास त्यौहार पर खर्च करने को कोई अतिरिक्त आय हो, इसका ध्यान रखा जाता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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