Fertility Rate: मानव जाति के लिए बोझ क्यों बन गये बच्चे?
कभी बढ़ती जनसंख्या दुनिया के लिए चिंता का विषय था, आज संपन्न देशों के लिए घटती जनसंख्या चिंता का विषय बन गया है। यूरोप से लेकर एशिया तक संसार के कई देश भविष्य में अपनी नस्लों के खत्म हो जाने की आहट से परेशान हैं।

Fertility Rate: जीवों में बच्चे पैदा करना यह प्रकृति द्वारा निर्धारित होता है लेकिन मनुष्य एक ऐसा जीव बन गया जिसने इसका नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। नतीजा, आज कुछ अफ्रीकी, लैटिन अमेरिकी या एशियाई देशों को छोड़ दें तो दुनियाभर के देशों में बच्चे बोझ बन गये हैं। एक दौर में इनके यहां बच्चा पैदा होने को अपराध की तरह परिभाषित कर दिया गया। अब जब वही देश अपने यहां बच्चों की पैदाइश बढ़ाना चाहते हैं तो परिवार इसके लिए तैयार नहीं हो रहा है।
सबसे खराब स्थिति उन देशों की है जहां पूंजीवाद बहुत सफलता से फैला है। आज दक्षिण कोरिया जो अपनी उपभोक्ता तकनीकी और व्यावसायिक कौशल के लिए दुनियाभर में नाम कमाता है, उसके यहां अगली पीढी का निशान धुंधला होता जा रहा है। 2023 का आंकड़ा है कि वहां बच्चे पैदा होने की दर नकारात्मक से भी नीचे पहुंच गयी है, 0.78 प्रतिशत। यानी हजार जोड़ों पर सिर्फ 780 बच्चे पैदा हुए हैं। इसके बाद दूसरा नंबर आता है हांगकांग का जहां जन्मदर 0.82 प्रतिशत है।
फिर इसी तरह सिंगापुर में 1.1, स्पेन में 1.19, इटली में 1.24, चीन में 1.24, स्विटजरलैण्ड में 1.52, जर्मनी में 1.58 जापान में 1.34 है। यूरोपीय यूनियन में आज कोई देश ऐसा नहीं है जहां जन्मदर भविष्य की जनसंख्या को आज के स्तर पर स्थिर रख सके। यूरोप में सबसे बेहतर स्थिति फ्रांस की है जहां जन्मदर 1.84 है लेकिन यह भी जनसंख्या को स्थिर रखने के निर्धारित कॉरपोरेट मानक 2.1 से नीचे है। हालांकि बीते दो दशकों में यूरोप में जन्मदर में थोड़ा सुधार आया है। समग्र यूरोप में जन्मदर 2001 में जहां 1.43 प्रतिशत थी वहीं अब 2021 में वह सुधरकर 1.53 हो गयी है। फिर भी यूरोपीय यूनियन के 27 देशों में कोई देश ऐसा नहीं है जो यह कह सके कि उसके यहां जनसंख्या नकारात्मक नहीं है।
एशियाई देशों में सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश रहा चीन अपनी आबादी को स्थिर करने के लिए आठ साल से हाथ पैर पटक रहा है लेकिन नतीजा शून्य है। 1963 में चीन में जन्मदर 7.51 थी। यानी औसत एक हजार विवाहित जोड़ों पर 7500 बच्चे। अपने कठोर कम्युनिस्ट शासन की बदौलत उसने एक बच्चे की नीति लागू करके जनसंख्या वृद्धि को तो रोक लिया लेकिन आज उस चीन में एक हजार विवाहित जोड़े पर 1280 बच्चे पैदा हो रहे हैं। इससे न केवल जनसंख्या वृद्धि नकारात्मक हो गयी है बल्कि सामाजिक असंतुलन भी पैदा हुआ है।
चीन सिंगल लोगों का देश बनता जा रहा है। विवाह दर तेजी से गिर रही है क्योंकि जोड़े बनाने के लिए स्त्री पुरुष का असंतुलन पैदा हो गया है। इस पर भी मुसीबत यह कि विवाह दर से ज्यादा तलाक दर तेजी से बढ़ रही है। चीन के सिविल अफेयर डिपार्टमेन्ट के मुताबिक 2021 में चीन में सबसे कम 76 लाख विवाह रजिस्टर हुए हैं, जो 1986 के बाद सबसे कम है। सिंगल लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जो भविष्य में 40 करोड़ तक पहुंच जाने का अनुमान है। 2015 में चीन में सिंगल चाइल्ड पॉलिसी खत्म कर दी गयी और आज तीन बच्चे पैदा करने तक कोई रोक टोक नहीं है। लेकिन सब सरकारों के कानून से कहां संभव होता है। कभी जनसंख्या घटाने वाले चीन की चिंता अब अपना भविष्य बचाने की हो गयी है।
कुछ ऐसे ही हालात जापान के हैं। जापान के प्रधानमंत्री फ्यूमियो किशिदा ने इसी साल जनवरी में चेतावनी जारी करते हुए कहा था कि *अभी नहीं तो कभी नहीं।" उन्होंने साफ कहा था कि "आनेवाली पीढी के लिए हमारे सामने यही आखिरी मौका है। अब हम प्रतीक्षा नहीं कर सकते।" जापान में जन्मदर 1.34 पर पहुंच गयी है जिसका अर्थ है उसके सामने भी भविष्य को लेकर लगभग वैसा ही संकट खड़ा है जैसा चीन और दक्षिण कोरिया के सामने।
विश्व के जिन देशों में जनसंख्या वृद्धि दर नकारात्मक है वो सभी देश आर्थिक रूप से बहुत मजबूत देश माने जाते हैं। इसलिए यह तो नहीं कह सकते कि उनके पास खाने पीने या जीवन से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने का साधन नहीं है इसलिए कम बच्चे पैदा कर रहे हैं। फिर क्या कारण है बीते पांच छह दशकों में जिन देशों ने आर्थिक तरक्की की वहां बच्चों का अभाव होने लगा?
इसमें सबसे पहला और बड़ा कारण है जीवन में स्थायित्व का अभाव। सोशलिस्ट इकोनॉमी में जीवन की स्थिरता सबसे बड़ा मुद्दा होती थी। विश्व के जिन देशों में समाजवादी व्यवस्था पहुंची वहां जीवन में आय की स्थिरता की गारंटी सबसे पहले सुनिश्चित की गयी। इसको खत्म करने के लिए संसारभर में जो कॉरपोरेट पूंजीवाद फैला उसने जीवन में स्थिरता की समाजवादी गारंटी को वापस ले लिया। दुनियाभर के देशों में लेबर लॉ में "सुधार" किये गये और मजदूर हितों को किनारे कर दिया गया। जहां समाजवाद नहीं था वहां भी बदलते दौर के साथ कानूनों में बदलाव करके हर मनुष्य के जीवन को अस्थिर कर दिया गया।
मसलन, आज नौकरी है तो कोई गारंटी नहीं कि कल भी रहेगी। नौकरी से हटाने के बाद मजदूर हित से जुड़े जो प्रावधान थे वो भी दुनियाभर में लगभग खत्म कर दिये गये। ऐसी अर्थव्यवस्था में जीनेवाले व्यक्ति के लिए बच्चा पैदा करना और उसे उचित ढंग से पालना किसी संकट से कम नहीं। जब आपके जीवन में आय को लेकर कोई स्थिरता ही नहीं है तो भला आप बड़ा परिवार बनाकर उसे कैसे पाल लेंगे? इसका परिणाम ये हुआ कि पूंजीवादी बाजारवाद ने परोक्ष रूप से जनसंख्या को नियंत्रित ही नहीं किया, नकारात्मक कर दिया।
जनसंख्या के नकारात्मक होने का दूसरा कारण भी पूंजीवाद से ही जुड़ा है, बढ़ता शहरीकरण। पूरी दुनिया में जहां जहां औद्योगिक पूंजीवाद सफल हुआ है वहां गांव बहुत तेजी से उजड़े हैं और शहर तेजी से बढे हैं। जापान को ही देखें तो वहां की 92 प्रतिशत जनसंख्या शहरों में रहती है। सिंगापुर और हांगकांग जैसे देशों में तो गांव की कल्पना ही नहीं की जा सकती लेकिन चीन में भी गांव से दोगुनी आबादी शहरों में आबाद हो चुकी है। साल दर साल इसमें वृद्धि हो रही है। भारत जैसे देश में जिसे गांव गणराज्य वाला देश कहा जाता था वहां अगले आठ दस सालों में शहरी आबादी ग्रामीण आबादी से अधिक हो जाएगी। ऐसा दावा स्वयं शहरी विकास मंत्री कर रहे हैं।
शहरी जनसंख्या बढ़ने के कारण खेती और पशुपालन पर निर्भरता खत्म हुई है जिसका सीधा असर व्यक्ति के भोजन की गारंटी पर हुआ है। खेती और पशुपालन पर निर्भर समाज को बाकी सांसारिक संपन्नता भले न हो लेकिन अन्न का अभाव नहीं रहता। ऐसे में उनके परिवार के भरण पोषण की न्यूनतम गारंटी रहती है। जितने हाथ उतने काम के कारण ग्रामीण समाज में अधिक जनसंख्या अधिक संपन्नता का भी द्योतक था। लेकिन शहर में ऐसा संभव नहीं है। यहां जीवन ज्यादा कठिन और जटिल है। संसाधन के नाम पर हाथ में कुछ नहीं है। जो है वो रोजमर्रा की आमदनी है। उसी से जीवन को चलाना है। इसके कारण परिवार में जितने कम सदस्य रहते हैं शहर का जीवन उतना सुखमय रहता है।
बच्चों के बोझ बनते जाने का तीसरा बड़ा कारण वंशबोध का अभाव है। ग्राम आधारित परिवारों का समाज में वंशबोध बहुत बड़ी उपलब्धि समझा जाता है। आप किस परिवार या कुल में पैदा हुए हैं इसका महत्व होता है। हर परिवार चाहता है कि उसका वंश आगे बढ़े। सामाजिक व्यवस्था में परिवार जितना बड़ा हो कुल उतना सशक्त समझा जाता है। लेकिन शहरीकरण में इस वंशबोध का अभाव है। शहर में अगर किसी का बच्चा पैदा होता है तो एक दो पीढ़ी से अधिक उसका अतीत नहीं होता। एक दो पीढ़ी से अधिक यहां उसे न कोई जानता है और न जानना चाहता है। ऐसे में बच्चा एक कुल या परिवार का हिस्सा न होकर पति पत्नी की निजी जरूरत का विस्तार होता है। उन्हें जरूरत है तो बच्चा है, वो जरूरत नहीं समझते तो बच्चा नहीं होता।
चौथा कारण औद्योगिक उत्पादन में महिलाओं को शामिल करना है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जो नव पूंजीवादी दौर शुरु हुआ उसमें महिलाओं को घरों से बाहर निकालने के लिए बहुत व्यवस्थित तरीके से महिला सशक्तीकरण का नैरेटिव गढ़ा गया। इस सशक्तीकरण में महिलाओं को घर से बाहर निकलकर औद्योगिक गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
आज तो स्थिति यह है कि महिलाएं हर प्रकार की औद्योगिक और वित्तीय गतिविधि में शामिल हैं। एक तरह से दुनिया के औद्योगिक देश इसे अपनी उपलब्धि के तौर पर प्रचारित करते हैं। लेकिन जिन जिन देशों में इसे उपलब्धि माना जाता है, आखिर क्या कारण है कि उन्हीं देशों में जनसंख्या वृद्धि दर नकारात्मक है? इसका सीधा संबंध परिवार से है। परिवार को संभालने का जिम्मा स्वाभाविक रूप से स्त्रियों का ही रहा है। वो बच्चों का जितना बेहतर लालन पालन कर सकती हैं, पुरुष नहीं कर सकता। ऐसे में अगर वही घर से बाहर निकलकर औद्योगिक गतिविधि का हिस्सा बन गयी तो आनेवाली पीढ़ी का रास्ता अपने आप सीमित हो जाता है या फिर पूरी तरह से बंद हो जाता है।
कैरियरवाद और विवाह की बढ़ती उम्र नकारात्मक होती जनसंख्या का पांचवा बड़ा और महत्वपूर्ण कारण है। 2009 में यूरोप से निकलनेवाली आर्थिक पत्रिका द इकोनॉमिस्ट ने तीन देशों का एक सामाजिक सर्वे किया था। इसमें चीन, जापान और भारत शामिल थे। इकोनॉमिस्ट ने माना था कि इन देशों में विवाह की उम्र लगातार बढ़ती जा रही है जिसका सीधा असर यहां की परिवार व्यवस्था और समाज पर पड़ रहा है। इकोनॉमिस्ट ने उस समय एक बहुत कड़वा सच लिखा था। उसने लिखा था कि एशियाई देशों को अपनी परिवार व्यवस्था पर बहुत गर्व था, आखिरकार यूरोप उसे तोड़ने में सफल रहा।
स्वाभाविक है यह टूटन चारों ओर दिख रही है। जापान और चीन में तो महिलाओं के विवाह की औसत उम्र 30 साल पहुंच चुकी है। स्वाभाविक है जिस उम्र में उनका शरीर बच्चा पैदा करने के सर्वाधिक अनुकूल रहता है, उस उम्र में वो कैरियर बनाने में लगी होती हैं। जब तक वे विवाह करती हैं उनकी शारीरिक क्षमता बच्चे पैदा करने के मामले में घट चुकी होती है। भारत में इतनी खराब स्थिति नहीं हुई है और प्रजनन का राष्ट्रीय औसत 2.0 है। लेकिन यह भी एक समुदाय विशेष में अधिक प्रजनन दर होने की वजह से है। वरना जनसंख्या वृद्धि के मामले में हम भी तेजी से दक्षिण कोरिया, जापान या चीन होने की ओर ही आगे बढ़ रहे हैं।
हां, इसमें इजराइल जैसे देश अपवाद जरूर हैं जिन्होंने तकनीकी और औद्योगिक विकास में अग्रणी रहने के बाद भी अपनी नस्लों को समाप्त करने का बीड़ा नहीं उठा रखा है। आज भी वहां प्रजनन दर 3.0 है और बाजार में रहकर भी बाजार के सिद्धांतों को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया है। जल्दी विवाह करना और कम से कम 3 बच्चे पैदा करना उनकी महिलाओं की प्रगतिशीलता के आड़े नहीं आता, न परिवार के लिए ये बच्चे बोझ बनते हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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