किसान आंदोलन: सरकार का हठ और किसानों के बहाने राजनीति की बू

किसान अन्नदाता हैं। भारत के भाग्यविधाता हैं। उनके अधिकार की हरहाल में रक्षा होनी चाहिए। किसान आंदोन भारत का आंतरिक मुद्दा है। लेकिन इसकी आड़ में विदेशी ताकतें देश के आंतरिक मामले में दखल दे रही हैं। किसान आंदोलन का स्वरूप जिस तेजी से बदल रहा है उससे इसके राजनीतिक इस्तेमाल की आशंका बढ़ गयी है। सरकार की जिद से भी स्थिति खराब हुई है। किसान पहले केवल एमएसपी की लिखित गारंटी चाहते थे। लेकिन अब के तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग कर रहे हैं। लेकिन इसके नाम पर भारत बंद करने, आवश्यक सेवाओं को रोकने का फैसला कहां तक उचित है ? भारत के 19 राजनीति दलों और 12 ट्रेड यूनियन ने किसान आंदोलन को समर्थन दिया है। क्या किसान आंदोलन की आग पर राजनीतिक दल अपनी रोटियां सेंकना चाहते हैं ? पंजाब के किसान नेता देश भर के किसानों को इसमें शामिल होने की अपील कर रहे हैं। लेकिन क्या कभी पंजाब के किसान नेताओं ने ओडिशा के कालाहांड़ी, पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी और बिहार के बदहाल किसानों के लिए आवाज उठायी है ? क्या पिछड़े राज्यों के किसानों की कोई अहमियत नहीं?

किसान आंदोलन: सरकार का हठ और किसानों के बहाने राजनीति की बू

सरकार क्यों नहीं कर रही भ्रम का निवारण

तीन कृषि कानूनों में कई ऐसे प्रावधान हैं जिससे किसान असहमत हैं। मोटे तौर पर उनकी सबसे बड़ी चिंता न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को लेकर है। किसानों का कहना है वे मंडी में अनाज बेचे या बाहर, लेकिन हर हाल में उन्हें एमएसपी की लिखित गारंटी मिलनी चाहिए। केन्द्र सरकार के नये कानून में एमएसपी का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया। किसानों का कहना है कि मंडी (कृषि उत्पाद बाजार समिति) व्यवस्था खत्म कर के एमएसपी को भी खत्म कर दिया गया है। अगर किसानों को अपनी उपज औने पौने दाम पर बेचनी पड़ी तो यह उनके साथ हकमारी होगी। सरकार का तर्क है कि एमएसपी को खत्म नहीं किया गया। एमएसपी का निर्धारण राज्यों का विषय और राज्य इसे अपने स्तर से लागू कर सकते हैं। अब सवाल ये है कि जब केन्द्र ने एमएसपी खत्म नहीं किया है तो फिर इसका कानून में लिखित जिक्र क्यों नहीं कर रही ? इसमें आनाकानी क्यों कर रही है ? सरकार किसानों को लिखित आश्वासन दे कि चाहे कोई भी कानून बने उनका कृषि उत्पाद न्यूनत समर्थन मूल्य पर ही खरीदा जाएगा। एमएसपी से कम मूल्य पर आनाज खरीदना अपराध होगा। किसानों की दूसरी चिंता कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को लेकर है। किसानों को डर है कि नये कानून से कॉरपोरेट कंपनियां उनके खेतों को गिरवी रख लेंगी। किसान अपनी मर्जी के मालिक नहीं रह पाएंगे। केन्द्र सरकार इन भ्रमों का निवारण क्यों नहीं कर रही ?

किसान आंदोलन: सरकार का हठ और किसानों के बहाने राजनीति की बू

छत्तीसगढ़ में कैसे बिक रहा 2553 रुपये प्रति क्विंटल धान ?

किसान आंदोलन की आग धधकी हुई है। कई राजनीतिक दल अपने फायदे के लिए इस आग को हवा दे रहे हैं। कुछ दलों को लगता है कि केन्द्र सरकार को उखाड़ फेंकने का ये अच्छा मौका है, इसलिए पूरी ताकत झोंक दो। अगर राज्य सरकार चाहें तो किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिल सकता है। जैसे छत्तीसगढ़ में 1 दिसम्बर 2020 से धान की खरीद हो रही है। यहां धान का समर्थन मूल्य 2553 रुपये प्रति क्विंटल है। पहले इसमें 1750 रुपये केन्द्र सरकार देती थी और 750 रुपये राज्य सरकार अपना अंश मिलाती थी। अब केन्द्र ने प्रति क्विंटल 53 रुपये की बढ़ोतरी की है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है। जब छत्तीसगढ़ के किसान को एक क्विंटल धान के लिए 2553 रुपये मिल सकते हैं तो पंजाब के किसानों को क्यों नहीं ? कृषि कानून बनने के बाद भी तो छत्तीसगढ़ में किसान एमएसपी पर धान बेच रहे हैं। यहां किसानों से सरकारी दर पर प्रति एकड़ 15 क्विंटल धान खरीदा जा रहा है। छत्तीसगढ़ में धान की खरीद सोसाइटी के माध्यम से हो रही है। यहां तो कांग्रेस की सरकार फिर भी उसे कोई दिक्कत नहीं । अगर केन्द्र कुछ अड़ंगे लगा भी रहा तब भी तो बघेल सरकार एमएसपी का वादा पूरा करने से पीछे नहीं हट रही । क्या सचमुच कुछ राजनीतिक दल अपने स्वार्थ के लिए किसान आंदोलन की आग को हवा दे रहे हैं ?

किसान आंदोलन: सरकार का हठ और किसानों के बहाने राजनीति की बू

भारत-कनाडा संबंध में कड़वाहट

कुछ राजनीति दल इस बात से खुश हैं कि किसान आंदोलन की गूंज कनाडा और संयुक्त राष्ट्र तक पहुंच गयी है। लेकिन यह तो भारत के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप है। कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने दिल्ली के किसान आंदोलन को समर्थन दे कर भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों को और खराब किया है। कनाडा खालिस्तानी अलगवादियों का गढ़ रहा है। जब 2017 में कनाडा के रक्षामंत्री हरजीत सिंह सज्जन भारत आने वाले थे तब बड़ा विवाद हुआ था। तब पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने कहा था कि चूंकि हरजीत सिंह सज्जन पर खालिस्तान समर्थक होने का आरोप है इसलिए वे उनसे नहीं मिलेंगे। सज्जन जब पंजाब दौरे पर आये तो चरमपंथियों ने खालिस्तान के समर्थन में नारे भी लगाये थे। खालिस्तान को लेकर भारत-कनाडा संबंध में कड़वाहट रही है। अब कहा जा रहा है कि ट्रूडो ने सिख समुदाय को खुश करने के लिए ये बयान दिया है।

किसान आंदोलन: सरकार का हठ और किसानों के बहाने राजनीति की बू

भारत की सम्प्रभुता का हनन

कनाडा के अलाव ब्रिटेन, अमेरिका और आस्ट्रेलिया में भी किसान आंदोलन के समर्थन में प्रदर्शन किया गया है जिसमें खालिस्तान समर्थक शामिल हुए। अगर ऐसा है तो आंदोलन के अराजक होने का भी खतरा है। संयुक्त राष्ट्र दुनिया के संप्रभु देशों का संघ है। कम से उसको तो अपने सदस्य देशों की संप्रभुता का ख्याल रखना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुतारेस ने कहा कि लोगों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का अधिकार है और अधिकारियों को इसे करने देना चाहिए। क्या गणतंत्र की जननी भारत को कोई सिखाएगा कि लोगों का क्या अधिकार है और क्या नहीं ? दुनिया के नक्शे पर भारत एक तेजी से उभरता देश है। क्या कुछ विदेशी ताकतें भारत को अराजकता की ओर ढकेल कर तरक्की की राह में रोड़ा अटकना चाहती है?

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+