Family Crimes: अपनों के खून से रंगे अपनों के हाथ
Family Crimes: रविवार को सुप्रीम कोर्ट की वकील रेनू सिन्हा की हत्या ने नोएडा समेत पूरे देश को भौचक्का कर दिया। 61 वर्षीय रेनू के पति नितिन सिन्हा पूर्व आईआईएस अधिकारी हैं। पुलिस के मुताबिक नितिन ने गुनाह कबूल कर लिया है और हत्या का कारण पांच करोड़ के बंगले को बताया गया है।
दरअसल नितिन बंगला बेचना चाहते थे और रेनू इसका विरोध कर रही थी। जायदाद के इस विवाद ने साथ देखे दशकों के वैवाहिक जीवन के उतार- चढ़ाव को भूलाकर उम्र के उत्तरार्ध में पत्नी की हत्या जैसा जघन्य कृत्य करवा दिया। बंगला बेचने का जुनून इस कदर हावी था कि पत्नी का मर्डर कर बाथरूम में छुपाने के कुछ समय बाद ही नितिन ने ब्रोकर को बंगला दिखाया भी था। इसके बाद आरोपी स्वयं उसी बंगले के स्टोर रूम में छिपा हुआ था। मृतका के मायके वालों की पुलिस शिकायत के बाद छान-बीन में मामले का खुलासा हुआ।

पिछले ही हफ्ते ग्रेटर नोएडा से एक ऐसी ही घटना की खबर सामने आई जहाँ बेटे ने घरेलू विवाद में अपने पिता और चचेरे दादा की हत्या कर दी। जैस्मिन ने अपने पिता विक्रमजीत को इसलिए मौत के घाट उतार दिया क्योंकि पिता अपने परिवार के भरण-पोषण के बदले रुपया अपने ऐशो आराम, शराब और महिला मित्रों पर खर्च करता था। आरोपी के मुताबिक़ उसके पिता-माता में तलाक हो चुका था। कोर्ट के आदेश के अनुसार भरण-पोषण के 15 हज़ार भी विक्रमजीत अपने परिवार को नहीं देता था। उसने अपने बेटी के विवाह की जिम्मेदारी भी उठाने से इंकार कर दिया था और इन्हीं सब बहस में अपमान को महसूस करते जैस्मिन ने गंडासे से अपने पिता की इहलीला समाप्त कर दी।
हत्या की ये घटनाएं सिर्फ घटनाएं नहीं हैं। ऐसी हत्याएं जहाँ परिवार का सदस्य ही हत्यारा होता है, अब आम सी बात हो गई है। ऐसी हत्याएं समाज के विकृत होते स्वरुप का आइना हैं। लगातार बढ़ते ऐसे अपराध हमें बहुत कुछ सोचने पर विवश करते हैं। हम ज़माने से पारिवारिक कलह का कारण ज़र, जोरु और जमीन को मानते आए हैं। थोड़े से बदलाव के साथ यही तीन प्रमुख कारण आज भी प्रासंगिक है। जोरू अर्थात स्त्री ही नहीं वरन पर पुरुष भी ऐसी कलहों के कारण और माध्यम बन रहे हैं। NCRB के डेटा के अनुसार प्रेम प्रसंग भारत में हो रही हत्याओं की तीसरी बड़ी वजह बन गया है। अब प्रेम प्रसंग में पति पत्नी की हत्या करे या पत्नी पति की दोनों ही आंकड़ें भयावह हैं। ऑनर किलिंग भी प्रेम प्रसंगों में हुई हत्याओं का एक रूप है जिसमें अपना ही परिवार सम्मान के नाम पर अपने ही बच्चों को मौत के घाट उतार देता है।
झूठा दिखावा, जाति और पैसे-रुतबे का दम्भ, अनैतिक संबंध और भावनात्मक कुंठा प्रेम प्रसंगों में हुई हत्याओं का प्रमुख कारण है। कई बार तो बच्चे अगर इतर संबंधों में बाधा बनते हैं तो उनको भी मौत के घाट उतार दिया जाता है। क्या माँ और क्या बाप, अपने ही बच्चों की हत्या करने से पहले सोचते तक नहीं हैं। अभी इसी साल मार्च में मेरठ में एक माँ ने अपने दो बच्चों की हत्या इसलिए कर दी क्योंकि वो किसी और के साथ रहना चाहती थी।
कोई ऐसा पारिवारिक रिश्ता नहीं बचा है जो हत्या जैसे जघन्य अपराध से अछूता हो। सबके अपने कारण हैं। मनोविज्ञान की मानें तो परिवार में होनेवाली हत्याओं के लिए 'कम्युनिकेशन गैप' एक बहुत बड़े कारण के रूप में उभरकर सामने आया है। परिवार के सदस्य आपस में अपनी जरूरतें, मजबूरियां, इच्छाएं, समस्याएं खुल कर एक-दूसरे से नहीं कह पा रहे हैं। एक समय ऐसा आ जाता है जब परिवारजनों के प्रति भावनात्मक शून्यता आ जाती है। बात करना और समझाना दुष्कर लगता है और हत्या कर देना आसान।
ज़र अर्थात धन सम्पत्ति, ज़मीन ज़ायदाद के विवादों में अक्सर देखा गया है कि उचित समय पर बंटवारा ना करना क्षोभ का कारण बन जाता है। ऐसा नहीं है कि इन मामलों में लालच केंद्र में नहीं होता है। परन्तु अधिकांश मामलों को समय रहते उचित बंटवारा करके टाला जा सकता है। अगर ग्रेटर नोएडा के विक्रमजीत समय रहते अपने बेटे के हिस्से का मकान और संपत्ति दे देते तो शायद उनकी ऐसी नृशंस हत्या न हुई होती। माता- पिता को जहाँ अपने बाकी के जीवन की चिंता होती है कि सब कुछ बांट दिया तो बच्चे उनका ख्याल नहीं रखेंगे, वहीं बच्चों को भी वर्तमान और भविष्य के लिए माता-पिता के हर प्रकार के साथ की जरूरत होती है। माँ-बाप की ऐसी चिंता कई बार निरर्थक भी नहीं होती है। परन्तु यह भी सच है कि हमारे समाज में अपवादों को छोड़ दें तो बच्चे माता-पिता की जिम्मेदारी उठाना अपना धर्म समझते हैं।
यहाँ समझना होगा कि उनकी अगली पीढ़ी अपने उम्र के उस पड़ाव पर होती है जहाँ वो जिम्मेदारियों के बोझ तले दबी होती है। कई बार अपने रोजगार के लिए, इलाज के लिए, बच्चों की पढाई और शादी के लिए रुपयों की जरुरत होती है। ऐसे में वो अपने ही परिवार की ओर उम्मीद की नज़र से देखते हैं। खुलकर अगर बात-विमर्श हो तो समाधान निकल कर भी आए परन्तु हमारी पारिवारिक व्यवस्था में अधिकांश जगह हम बातचीत की बजाय वर्षों से चली आ रही परम्पराओं के रास्ते चल देते हैं और वस्तुस्थिति को समझने का प्रयास भी नहीं करते। अब चाहे इतर जाति में प्रेम का मामला हो या जमीन जायदाद बंटवारे का मामला हम वही करते हैं जो समाज में तथाकथित रूप से वर्षों से स्वीकार होता है।
मानव के सामाजिक जीवन की सबसे छोटी और प्रथम इकाई परिवार है। पारिवारिक जीवन मूल्य ही सामाजिक सभ्यता की नींव रखता है। लोभ, कर्तव्यों के प्रति उदासीनता, आत्म केंद्रित होना ये सब परिवार के क्षरण का कारण हैं। कभी प्रेम में पड़े अपनी ही औलाद को परिवार- समाज के झूठे दिखावे में फंसकर मार देते हैं तो कभी जरूरतें या लोभ इस कदर हावी हो जाता है कि माता पिता भाई आदि की हत्या कर देते हैं। परिवार का माहौल ऐसा होना चाहिए कि बातचीत की गुंजाइश हमेशा बची रहे। एक दूसरे पर भरोसा हो कि हमने कुछ मांगा तो परिवार देगा। जब हम अधिकारों और कर्तव्यों के बीच का संतुलन सीख लेंगे और खुल कर घर में बात कर सकेंगे तो शायद ऐसी घटनाएं ना हो।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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