स्वतंत्र भारत में कैसे शुरू हुआ पर्यावरण का पाठ?
स्वतंत्रता के समय पर्यावरण कोई मुद्दा नहीं था, स्वच्छता जरूर एक मुद्दा था जिस पर गांधीजी काफी जोर देते थे। स्वच्छता रहन-सहन से जुड़ा मामला है, जबकि पर्यावरण का संबंध औद्योगिक गतिविधि से है। भारत में परंपरागत रूप से कारीगरी पर आधारित उद्योग थे। उसका पर्यावरण पर कोई खास असर नहीं होता था। विलायत में बड़ी मशीनों का अविष्कार होने के बाद यह स्थिति नहीं रही। उन मशीनों से बड़े पैमाने पर उत्पादन होता था। उतने ही कच्चे माल की जरूरत होती थी, तैयार माल को खपाने के लिए भी बड़ी आबादी की जरूरत थी। कहने की जरूरत नहीं कि परतंत्रता के आखिरी दिनों में हम पश्चिमी औद्योगिक विकास के लिए कच्चा माल देने और तैयार माल खपाने के साधन बन गए थे।

अंग्रेजी राज में ही हमारी परंपरागत कारीगरी आधारित उद्योगों का विनाश और मशीनी उद्योगों का प्रसार होने लगा था। स्वतंत्रता के बाद भी इस तौर तरीके में उल्लेखनीय बदलाव नहीं हो सका। हालांकि गांधीजी मशीनी सभ्यता से जल्दी से जल्दी छुटकारा पाना चाहते थे। लेकिन देश की आर्थिक स्थिति उन दिनों इतनी खराब थी कि हमने गरीबी से जल्दी छुटकारा पाने के लिए उन्हीं तौर तरीकों को बड़े पैमाने पर अपना लिया जिनकी शुरुआत अंग्रेजी राज में हो चुकी थी।
पश्चिमी ढंग के औद्योगिक विकास के साथ-साथ पर्यावरण का विनाश और प्रदूषण का प्रसार होने लगा। रसद ढोने और कच्चे माल के बंदरगाहों तक पहुंचाने के लिए अंग्रेज रेलगाड़ी लेकर आए। रेल की पटरियों को बिछाने के लिए स्लीपर्स की जरूरत थी और इसके लिए बड़े पैमाने पर जंगल काटे जाने लगे। मशीनों को चलाने के लिए कोयले की जरूरत थी और खदानों से कोयला निकालने के लिए जंगलों की कटाई हुई।
दूसरे खनिज पदार्थों के लिए भी जंगलों की कटाई हुई। जंगलों की इस बेतहाशा कटाई से वर्षा में कमी हुई और सूखे की मार पड़ने लगी। तब सिंचाई की सुविधा बढ़ाने के लिए नहरों को बनाया गया। नहरों का जाल फैलाने के लिए नदियों को बांधा जाने लगा। नदियों को बांधने के साथ पनबिजली बनाने का तर्क भी जोड़ दिया गया। सिंचाई में फिर भी कमी रह गई तो नलकूप आ गए। चौमासे के दौरान वर्ष भर के लिए जल-संग्रह कर लेने के कुआं-तालाब की व्यवस्था की भरपूर उपेक्षा शुरु हो गई।
पश्चिमी ढंग की मशीन आधारित औद्योगिकरण, रसायनिक खाद आधारित खेती व दूसरे तामझाम का असर हुआ कि हम उस तंगी की हालत से तो निकलते दिखे जिसका सामना 50-60 के दशक में करना पड़ा था। लेकिन अगले दशक भर में इसकी कीमत का पता भी चलने लगा। लोगों में सुगबुगाहट शुरु हुई। 1972 में चमोली में चिपको आंदेलन शुरु हो गया। गांव वाले अपने जंगलों को कटने से बचाना चाहते थे। उनकी आजीविका, उनका भविष्य उन जंगलों पर निर्भर था।
इसी दौरान नर्मदा घाटी में बंध रहे बांधों का बुरा असर वहां के खेतिहर समाज पर दिखने लगा जिसकी प्रतिक्रिया में मिट्टी बचाओ आंदोलन शुरु हो गया। पर्यावरण को लेकर देश में शुरुआती हलचल तेज होने लगी।
विश्व के स्तर पर पर्यावरण की चिंता भी उन्हीं दिनों उभरी। संयुक्त राष्ट्र की ओर से 1972 में स्टॉकहोम में विश्व पर्यावरण सम्मेलन हुआ। इसमें भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी शामिल हुई। स्टॉकहोम के इस सम्मेलन में पर्यावरण के विभिन्न पहलुओं पर विचार विमर्श हुआ। वैश्विक स्तर पर पर्यावरण की चेतना फैलने लगी। वापस आने पर इंदिरा गांधी की पहल पर वन्यप्राणी संरक्षण अधिनियम-1972 बना। फिर 1980 में वन संरक्षण अधिनियम पारित हुआ।
देश के पर्यावरण के इतिहास में 1985-86 का खास स्थान है। भोपाल में यूनियन कार्बाइड कारखाने से गैस रिसने से हजारों लोग मारे गए। उसी साल केन्द्र सरकार ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम बनाया। फिर प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने गंगा एक्शन प्लान की घोषणा की। वैश्विक स्तर पर बिगड़ते पर्यावरण की व्यापक समझ 1990 के दशक में आई। 1992 में ब्राजील के नगर रियो में बड़े स्तर पर शिखर सम्मेलन हुआ जिसे पृथ्वी सम्मेलन कहा गया।
तब तक यह साफ हो गया था कि कोयला और पेट्रोलियम पदार्थों के जलने से पृथ्वी की जलवायु में बदलाव आ रहे हैं। लेकिन यूरोप और अमेरिका के देश भले इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार थे, पर वे इसका ठीकरा विकासशील गरीब देशों पर फोड़ना चाहते थे। भारत के नेतृत्व में दुनियाभर के विकासशील देश एकजुट हुए और मिलकर अमीर देशों को मजबूर किया कि वे अपना उत्तरदायित्व स्वीकार करें।
पर्यावरण गंभीर विषय बन गया था। राजधानी दिल्ली समेत देश के कई नगरों में वायु प्रदूषण इतना बढ़ गया कि सांस लेना दूभर हो गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे रोकने के तरीके निकालने की कोशिश की। अधिक धुआं छोड़ने वाली पुरानी गाडियों को सड़क से हटाने और वाहनों में निम्न उत्सर्जन वाली गैसों का उपयोग करने की व्यवस्था हुई। इसी बीच किसानों की आत्महत्या की खबरें आने लगी। हरित क्रांति की विजय गाथा फीकी पड़ने लगी थी। रसायनिक खादों व नलकूप वाली सिंचाई के मंहगे कारोबार आम किसानों के अनुकूल नहीं थे।
जो पर्यावरण चेतना 1970-80 के दशक में यहां वहां उठ रही थी, उसका असर 1990 में दिखने लगा। सरकार जिन मामलों में ढीली थी, उन मामलों में अदालत की फटकार पड़ने लगी। देशभर में पर्यावरण पर काम करने का संस्थानों में नई ऊर्जा और संकल्प की स्थिति बनी। अखबारों में पर्यावरण पर इतनी सामग्री आने लगी कि यह एक मुख्य विषय बन गया।
उसी दौर में देश की अर्थव्यवस्था को उदारीकरण के रूप में मुक्त व्यापार के लिए खोला गया। 1992 में केबल टीवी का आगमन हुआ। तीन वर्ष के भीतर इंटरनेट आ गया और फिर मोबाइल फोन भी भारत आ गया। इस सबके शोर में उपभोग की उथली संस्कृति आई।
अब जलवायु परिवर्तन का शोर है। धरती का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। 1997 में क्योटो सम्मेलन के समय से यह मुद्दा विमर्श में है। फिर 2015 में पेरिस में धरती के बढ़ते तापमान को थामने की गरज से समझौते हुए। हालांकि बाद में दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका ने इसका पालन करने से मना कर दिया। फिर भी वैश्विक स्तर पर यह एक महत्वपूर्ण समझौता है। इस वर्ष भी ग्लासगो में वैश्विक जलवायु सम्मेलन हुआ है जिसमें विश्व के बढ़ते तापमान को औद्योगिक युग के आरंभ होने के पहले के स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस अधिक की सीमा में रखने की घोषणा की गई है।
वैश्विक स्तर पर सामने आ रहे तथ्यों और शोध-अध्ययनों से पता चलता है कि भारत में परंपरा से विकसित हवा-पानी के रखरखाव के ढंग अधिक लाभकारी रहे हैं। भारत में पेड़ की पूजा की जाती रही है। इसी तरह कुंओ और तालाबों की श्रृंखला न केवल बरसाती पानी को वर्षभर सहेज कर रखते हैं, भूजल भंडार को भी परिपूर्ण रखते रहे हैं।
इस बारे में वैश्विक स्तर पर जारी रिपोर्टों (आईपीसीसी) में भी भारतीय परंपरागत व्यवस्थाओं की सराहना की गई है। पर्यावरण की चुनौतियों को देखते हुए आजादी के 75 साल का जश्न मनाते हुए क्या हम उन परंपरागत भारतीय व्यवस्थाओं को फिर से अपनाने का संकल्प ले सकते हैं?
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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