Election Results: मोदी को मिली हैट्रिक की गारंटी
कर्नाटक के बाद तेलंगाना में कांग्रेस की जीत को भाजपा हल्के में नहीं ले सकती।दक्षिण के ये वही दो राज्य हैं, जहां 2019 में भाजपा लोकसभा की 29 सीटें जीतीं थी। भारतीय जनता पार्टी के लिए यह एक बड़ा संकेत है कि दक्षिण के इन दोनों राज्यों में 2019 का आंकड़ा बरकरार रखना उसके लिए मुश्किल होगा।इन दोनों राज्यों में कांग्रेस को सिर्फ चार सीटें मिलीं थी।कांग्रेस को हमेशा हर संकट में दक्षिणी राज्यों से ही सहारा मिला है।
1977 में जब इंदिरा गांधी रायबरेली से चुनाव हार गई थी तो कर्नाटक की चिकमंगलूर सीट ने ही 1978 के उपचुनाव ने उन्हें लोकसभा में पहुंचाया था।2019 में जब राहुल गांधी अमेठी से हार गए थे, तो केरल की वायनाड सीट ने ही उनके लिए लोकसभा के दरवाजे खोले थे।जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में लोकसभा में कहा था कि एक अकेला सब पर भारी, ठीक उसी तरह 1978 में चिकमंगलूर में नारा लगा था-" एक शेरनी, सौ लंगूर, चिकमंगलूर- चिकमंगलूर।" इंदिरा गांधी की चिकमंगलूर से वापसी हुई थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हिन्दी पट्टी के उन तीनों राज्यों में फिर से वापसी हुई है, जहां 2018 में भाजपा हार गई थी।हालांकि कुछ महीने बाद हुए 2019 के लोकसभा चुनावों में मोदी के नेतृत्व में भाजपा इन तीनों राज्यों की 65 में से 62 लोकसभा सीटें जीत गई थीं।इन तीनों राज्यों में भाजपा की जबर्दस्त वापसी से यह तो स्पष्ट हो गया है कि वह इन तीनों राज्यों में 2019 वाला आंकड़ा 2024 में भी बरकरार रखेगी।
हिन्दी बेल्ट के 11 राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल, चंदीगढ़, पंजाब, जम्मू कश्मीर, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड की 245 सीटों में से भाजपा खुद 183 सीटें जीतीं थीं और उसके सहयोगी भी 31 सीटें जीते थे, यानी 245 में से 214 सीटें एनडीए जीती थी।बाकी बची 31 सीटों में से 21 इंडी एलायंस की हैं, दस बसपा की हैं, जो किसी एलायंस का हिस्सा नहीं है।

यह अलग बात है कि 2019 में भाजपा के सहयोगी के रूप में 16 सीटें जीतने वाला जदयू अब इंडी एलायंस में है।वैसे किसी भी एक चुनाव को अगले चुनाव का सेमीफाइनल नहीं कहा जा सकता, लेकिन 2023 के पांच विधानसभा चुनावों को कांग्रेस लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल मान कर लड़ रही थी।इंडी एलायंस और कांग्रेस सेमीफाइनल में बुरी तरह हारे हैं|
हिन्दी बेल्ट के तीन राज्यों के चुनाव नतीजों ने बता दिया है कि इन 11 राज्यों में भाजपा को अपनी सीटें बढ़ाने की संभावनाएं बनी हुई हैं।इन चुनाव नतीजों ने विपक्षी दलों का यह भ्रम भी तोड़ दिया है कि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में कमी आई है, या वोटर उनके कामों से खुश नहीं हैं, या देश में उनके नेतृत्व के प्रति किसी तरह की हताशा है।
इन चुनाव नतीजों ने यह भी साबित किया है कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा से उनकी लोकप्रियता में बढ़ोतरी कांग्रेस और कांग्रेस समर्थकों का भ्रम था।अगर सच में उनकी लोकप्रियता में बढ़ोतरी हुई होती, तो उसके नतीजे दिखाई देते।हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में कांग्रेस की जीत और अब उसमें तेलंगाना को भी जोड़ दीजिए, तो इसका मतलब यह नहीं है कि इन राज्यों में कांग्रेस के समर्थन में हवा बहने लगी है।
इन तीनों ही राज्यों में सरकारों के खिलाफ नकारात्मक वोटों का कांग्रेस को फायदा हुआ।हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में भाजपा अपनी सरकारों के खिलाफ बनी एंटी इनकम्बेंसी को नहीं रोक सकी और तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति अपनी सरकार के खिलाफ बनी एंटी इनकम्बेंसी को नहीं रोक सकी।बीआरएस उसी तरह घमंड का शिकार थी, जैसे घमंड के घोड़े पर सवार होकर कांग्रेस ने इन चुनावों में इंडी एलायंस के सहयोगियों सपा और जेडीयू को मध्यप्रदेश में भाव नहीं दिया।
कांग्रेस को यह भी समझना होगा कि पिछले 20 सालों में नरेंद्र मोदी ने जो विश्वसनीयता बनाई है, उसे झूठे आरोपों से खत्म नहीं किया जा सकता।राहुल गांधी ने जिस तरह उद्योगपति गौतम अडानी के बहाने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए, उसे जनता ने उसी तरह स्वीकार नहीं किया जैसे 2019 में स्वीकार नहीं किया था।
मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा की जीत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हिन्दी बेल्ट के वोटरों को मोदी के मुकाबले राहुल गांधी स्वीकार्य नहीं है।वोटरों ने राहुल गांधी की गारंटियों के मुकाबले मोदी की गारंटियों पर भरोसा किया।इन तीनों राज्यों में 2018 में भाजपा ने 197 सीटें जीतीं थी, जबकि कांग्रेस ने 281 सीटें जीतीं थीं।जबकि इस बार भाजपा ने 330 सीटें जीती है, और कांग्रेस 170 ही जीत पाई, यानी वह वहां भी नहीं पहुंच सकी, जहां 2018 में भाजपा पहुंच सकी थी।आप इससे कांग्रेस के वोट बैंक में गिरावट को देख सकते हैं।
इन चुनाव नतीजों का कांग्रेस के लिए एक सबक यह भी है कि फिलहाल आने वाले पांच सालों में उसके पास मोदी का विकल्प नहीं है।राहुल गांधी तो मोदी का विकल्प कभी भी नहीं हो सकते।मल्लिकार्जुन खड़गे को कांग्रेस अध्यक्ष बना कर गांधी परिवार ने सोचा था कि दलित वोट बैंक उसकी झोली में आ जाएगा, कर्नाटक में ऐसा हुआ भी, लेकिन उसका असर हिन्दी बेल्ट में बिलकुल नहीं हुआ।
भाजपा ने आदिवासी, पिछड़ों, दलितों और महिलाओं में अपना प्रभाव बड़ी तेजी से बढाया है।उन्हें आर्थिक रूप से तरक्की के अवसर ही नहीं दिए, बल्कि सत्ता में भागीदारी के रास्ते भी खोले हैं।एक जमाने में भाजपा उंची जातियों की पार्टी मानी जाती थी, लेकिन अब वह उन जातियों का प्रतिनिधित्व करती है, जो 75 साल से सत्ता में भागीदारी से वंचित रही।इसलिए राहुल गांधी का जातीय जनगणना का दांव भी नहीं चला।जब राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में नहीं चला तो बाकी देश में कहां चलेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव नतीजों के बाद घोषणा कर दी है कि देश की जनता ने उन्हें हैट्रिक की गांरटी दे दी है।इंडी एलायंस के लिए यह बहुत बड़ा झटका है, अब क्षेत्रीय दल भी यह सोचने पर मजबूर होंगे कि उन्हें कांग्रेस को साथ लेने का लाभ होगा या नुकसान होगा।चुनावों के दौरान ही जब भारत की क्रिकेट टीम आस्ट्रेलिया से वर्ल्ड कप फाइनल का मैच हार गई थी, तो राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी को पनौती कहा था, क्योंकि उस मैच को नरेंद्र मोदी देख रहे थे।अब कांग्रेस को सोचना चाहिए कि क्या राहुल गांधी कहीं उसके लिए पनौती तो नहीं बन गए हैं।
कांग्रेस को कोई और विकल्प ढूंढ कर 2029 के चुनावों की रणनीति पर विचार करना चाहिए।दलित चेहरे के रूप में मल्लिकार्जुन खड़गे विपक्ष का बेहतरीन चेहरा हो सकते थे, वह भाजपा के दलित वोट बैंक में सेंध लगा सकते थे, लेकिन वह पार्टी को नेतृत्व देने के बजाए राहुल गांधी की स्टेपनी बन कर ही रह गए।इन चुनावों में जहां कहीं भी राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे किसी मंच पर साथ दिखे, वहां कांग्रेस के किसी नेता ने खड़गे की तरफ देखा ही नहीं।खड़गे किसी भी नेता से तब तक कोई मीटिंग नहीं करते, जब तक राहुल गांधी उनके साथ न हों।ऐसी स्थिति में दलित मतदाता कैसे कांग्रेस की तरफ आकर्षित होंगे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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