Dog Bite Cases: आवारा ही नहीं, पालतू कुत्ते भी हो रहे हिंसक
Dog Bite Cases: दो साल पहले लखनऊ में एक पालतू पिटबुल कुत्ते ने अपनी मालकिन की ही जान ले ली थी। इस दर्दनाक घटना में 82 वर्षीय बुजुर्ग महिला का पेट, सिर और चेहरा लहूलुहान हो जाने से उसकी मौत हो गई थी। गाजियाबाद की एक और घटना में पार्क में खेलते बच्चे को पालतू कुत्ते ने इतनी बुरी तरह से काट लिया था कि उसके चेहरे पर 150 से ज्यादा टांके आए थे।
रिहायशी इमारतों की लिफ्ट, परिसर, सड़क या किसी के अपने ही आँगन में पालतू कुत्तों द्वारा लहूलुहान किए जाने की घटनाओं ने बच्चों और बड़ों के साथ ऐसी दुर्घटना की आशंका बढ़ा दी है। यही वजह है कि कुत्तों को पालने और उनसे प्रेम करने के साथ ही अपनों-परायों की सुरक्षा के पक्ष पर भी सोचना आवश्यक है। खासकर तब जबकि श्वानों द्वारा किसी इंसान की जान ले लेने के मामले आए दिन बढ़ते जा रहे हैं।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2019 में देशभर में कुत्तों के काटने के 72 लाख से ज्यादा मामले सामने आए थे। इनमें पालतू और आवारा कुत्ते शामिल हैं। ऐसे प्राणघातक हमलों और काटने की घटनाओं से हो रही मौतों को देखते हुए ही बीते दिनों केंद्र सरकार के सुझाव पर उत्तर प्रदेश सरकार ने कुत्तों की कुछ नस्लों को पालने पर प्रतिबंध लगा दिया है।
ज्ञात हो कि लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए राज्य की योगी सरकार ने क्रूर मानी जानी वाली कुत्तों की 23 प्रजातियों के आयात, प्रजनन और बिक्री पर रोक के आदेश जारी किए हैं। इसके लिए पशु पालन और डेयरी विभाग ने हितधारक संगठनों और विशेषज्ञों के दल के साथ पशुपालन आयुक्त की अध्यक्षता में गठित एक विशेषज्ञ समिति ने कुत्तों की उन खूंखार प्रजातियों की पहचान की है, जो इन्सानों के लिए खतरनाक हैं।
दरअसल सुरक्षा से जुड़े कारण हों या पश्चिमी देशों की अंधी नकल करने की वजह, बीते कुछ बरसों में हमारे यहाँ शहरी इलाकों में निजी कुत्ता पालने का चलन बढ़ा है। विशेषकर कोरोना काल में अकेलेपन को दूर करने के लिए बहुत से लोगों ने अपने घरों में श्वान पाले हैं। आमतौर पर लोग विदेशी नस्लों के कुत्तों को रखते हुए अपनी पसंद के अलावा किसी पक्ष पर गौर ही नहीं करते। जबकि कुत्ते जैसे पालतू जानवर की मनः स्थिति को प्राकृतिक परिवेश से लेकर खानपान तक, बहुत कुछ प्रभावित करता है।
लोग अपना अकेलापन दूर करने या फिर भावनात्मक कमी को पूरा करने या दिखावा करने के लिए कुत्तों को तो पाल लेते हैं लेकिन यह भूल जाते हैं कि हर जीव को अपनी प्रजाति के बीच ही रहना अच्छा लगता है। यही कारण है कि अपनी प्रजाति से दूर होने के कारण ये मूक जानवर घर में कैद होकर हिंसक हो जाते हैं। समझना जरूरी है कि अकेलेपन के चलते एक आक्रोश घरेलू जानवरों के मन में भी पैदा होता है, क्योंकि उनका यूं रहना प्राकृतिक रूप से सही नहीं है। जबकि देखने में आ रहा है कि महानगरों की गगनचुंबी इमारतों में बसे कई परिवार तो खिलौना समझकर पालतू कुत्ते को घर ले आते हैं।
इन परिस्थितियों में परिवेश से लेकर प्रशिक्षण तक, बहुत सी चीजों के सहज और सही ना होने से उनका स्वभाव उग्र हो जाता है। यही वजह है कि बीते दिनों पशुपालन मंत्रालय ने भी देशभर में कुत्तों की कुछ प्रजातियों पर इस आधार पर प्रतिबंध लगाया है कि वे इन्सानों के लिए खतरा बन सकते हैं। इस आदेश के तहत प्रतिबंधित कुत्तों को प्रजनन से रोकने के लिए उनकी नसबंदी करना शामिल है।
ज्ञात हो कि केंद्र ने इस आदेश में भारत के सभी राज्यों को कहा है कि 'आक्रामक कुत्तों के कारण लोगों के मरने की घटनाएं बढ़ रही हैं। इस वजह से अमेरिकी बुलडॉग, पिटबुल टेरियर, रॉटवीलर, मास्टिफ, डॉर्नजैक, सर्प्लानिनैक, दक्षिण रूसी शेफर्ड डॉग, जापानी डोसा, अकिता, मास्टिफ्स, टेरियर्स, रोड्सियन रिजबैक, वुल्फ डॉग्स, कैनारियो जैसी आक्रामक कुत्तों की 23 प्रजातियों की बिक्री और पालन पर प्रतिबंध होना चाहिए। इतना ही नहीं प्रतिबंधित नस्लों के कुत्तों की खरीद-फरोख्त और प्रजनन के लिए कोई लाइसेंस या अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
आक्रामक कुत्तों के हमले के कारण घर के सदस्यों और आस-पड़ोस के लोगों के अस्पताल तक पहुँचने के समाचारों के बीच केंद्रीय पशुपालन मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पत्र लिखकर इस प्रतिबंध को लागू करवाने को कहा है। केंद्र सरकार ने पशु क्रूरता को रोकने के लिए डॉग ब्रीडिंग एंड मार्केटिंग रूल्स 2017 और पेट शॉप रूल्स 2018 को लागू करने की बात कही है।
दरअसल, इंसानों पर पालतू कुत्तों के हमले की घटनाएँ आमजन की सुरक्षा और सहजता से भी जुड़ी हैं। खूंखार कुत्तों का हर कहीं लोगों पर हमला करना पूरे परिवेश के लिए चिंता का सबब है। पिटबुल को तो कुत्तों की हिंसक प्रजाति के रूप में ही जाना जाता है। इसके चलते दुनियाभर में 30 से ज्यादा देशों ने इसे पालतू जानवर के रूप में रखने पर प्रतिबंध लगा रखा है। पिछले महीने ही दिल्ली में 7 साल बच्ची पर उसके पड़ोसी के पिटबुल कुत्ते ने हमला करते हुए इस तरह काटा और घसीटा कि लड़की को अस्पताल में दाखिल करवाना पड़ा।
राजधानी दिल्ली में ही दो महीने पहले हुए एक अन्य मामले में पड़ोसी परिवार के इसी पिटबुल प्रजाति के कुत्ते ने 7 वर्षीय बच्चे को दबोच लिया। बच्चे को घसीटकर घर के अंदर ले जाने के समय शोर सुनकर आए लोगों ने बच्चे को बचाया। हाल ही में हरियाणा के कुंडली की एक सोसाइटी में सुबह की सैर के बाद लिफ्ट से घर जाने के समय पिटबुल कुत्ते ने एक रेजीडेंट के संवेदनशील अंग के पास काट लिया।
बीते वर्ष ही मुंबई की हाउसिंग सोसाइटी में पड़ोसी के जर्मन शेफर्ड कुत्ते द्वारा काटे जाने के बाद एक 10 वर्षीय लड़की को दो घंटे के ऑपरेशन के बाद 45 टांके लगाने पड़े। इस पीड़ादायी घटना में लड़की के माता-पिता ने कुत्ते के मालिक के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज करवाई थी।
शहरी इलाकों में जो लोग कुत्ते पाल रहे हैं उनके लिए उसकी कोई व्यावहारिक उपयोगिता नहीं है। वह सिर्फ एक ऐसे निर्दोष जीव के रूप में घर में रहता है जो निश्छल भाव से अपने मालिक को प्यार करता है। लेकिन मालिक के अलावा बाकी लोगों के प्रति उसका क्या व्यवहार होगा, इसका आकलन नहीं किया जा सकता।
लेकिन जैसा चलन बढ़ा है उसमें कुत्ते पालना भी एक प्रकार का स्टेटस सिंबल बनता जा रहा है। लोग बड़े शौक से बताने लगे हैं कि उनके पास किस नस्ल का कितना मंहगा कुत्ता है। फिर भले ही यह मंहगा कुत्ता किसी हिंसक प्रजाति का हो या अपने अकेलेपन में हिंसक बन जाए। लोग इसकी चिंता नहीं करते।
तकलीफदेह यह भी है कि कुत्ते का काटना किसी पालतू जानवर का हमला भर नहीं है। कुत्ते के काटने से रेबीज़ या टिटेनस का संक्रमण हो सकता है। इसके बावजूद हैरान-परेशान और बेचैन कर देने वाले ऐसे मामले इन दिनों खूब सुनने में आ रहे हैं।
इतना ही नहीं सवाल पालतू कुत्तों के सही प्रशिक्षण और उनके मालिकों के असंवेदनशील बर्ताव को लेकर भी उठ रहे हैं। गाजियाबाद में लिफ्ट में हुई घटना के वायरल वीडियो में तो स्पष्ट नजर आया कि काटने के बाद रोते-बिलखते बच्चे से कुत्ते की मालकिन ने कोई संवाद तक नहीं किया। वहीं एक दूसरे मामले में भी घायल युवक का कहना है कि पालतू कुत्ते के हमला करने पर मालिक यह सब होते देखते रहा, लेकिन उसने मदद नहीं की।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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