लोकतंत्र में असहमति को अन्याय मानना ठीक नहीं

नई दिल्ली। किसी भी लोकतांत्रिक देश में विपक्ष और असहमति को खासा भाव मिलना चाहिए। भारत में तो कुछ ज्यादा ही। भारत चूंकि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, इसलिए यहां के लोगों को ज्यादा अपेक्षा रहती है कि असहमतियों को कुछ अधिक महत्व मिले। मिल भी रहा है, लेकिन अपेक्षा के अनुरूप नहीं। शायद यही वजह है कि नेशनल लेबल पर धीरे-धीरे आवाजें उठने लगी हैं। असहमतियों को कम भाव मिलने के आरोपों का वर्गीकरण दो बिन्दुओं से किया जा सकता है। पहला बढ़ता जनोन्माद और दूसरा अघोषित अश्वमेघ। फिलहाल चर्चा जनोन्माद की।

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आपको बता दें कि लोकतंत्र में जनोन्माद का भाव ठीक नहीं है। उसमें भी यदि सियासत की बात करें तो वह और भी गलत है। यूं कहें कि जनोन्माद हर हाल में शालीनता को नष्ट करता है। आज देश के विभिन्न कोनों से जनोन्माद की खबरें प्रचारित-प्रसारित हो रही हैं। दुख का एहसास कराने वाली ये खबरें झकझोर रही हैं। सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? जनोन्माद को पालने, पोसने वाला कौन है? आखिर यह लगातार संवर्धित क्यों हो रहा है? यदि दार्शनिकों की बात करें तो प्लेटो और अरस्तू ने लोकतंत्र की निरंतरता पर परस्पर विपरीत विचार व्यक्त किए थे। प्लेटो ने अपनी पुस्तक रिपब्लिक के आठवें खंड में लोकतंत्र को मूलत: अस्थाई बताया है। उनका कहना है कि लोगों को स्वतंत्रता दिए जाने पर उनके बीच जनोन्माद फैलाने वाले नेताओं के उभरने की परिस्थिति भी बनती है। सत्ता के लिए ऐसे नेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा से निरंकुश शासन पैदा होता है। इसके संकेत गहरे हैं। समझने वाली बात है कि देश में जनोन्माद क्यों और कैसे बढ़ रहा है।

आपको बता दें कि बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना दूसरा कार्यकाल शुरू किया है, तब भारतीय लोकतंत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा नजर आ रहा है। इसलिए इस बात पर विचार करना मुनासिब होगा कि क्या अरस्तू के कथनानुसार एक समतामूलक समाज की आकांक्षा जनोन्माद फैलाने वाले नेताओं को काबू में रख सकेगी या फिर जनोन्माद अंतत: निरंकुश शासन को जन्म देगा, जिसे कि प्लेटो ने अपरिहार्य बताया है। 'द प्रिंट’ का विश्लेषण बताता है कि लोकतंत्र के मूल में काण्ट के तर्कयुक्त संकल्प की अवधारणा निहित है। लोकतंत्र किसी भी मुद्दे को बहस और चर्चा के जरिए तय करता है और समुदाय के सदस्यों या प्रतिनिधियों के बीच ये चर्चा इस काम के लिए स्थापित सभा में होती है, जहां बेरोकटोक बोलने की गारंटी होती है। तर्कयुक्त संकल्प लोगों के विचारों या मतों का समुच्चय मात्र नहीं है। न ही यह सिर्फ बहुसंख्यकों की इच्छा है। जैसा कि अरस्तू ने कहा था कि तर्कयुक्त संकल्प खुली बहस में बनी सहमति है।

विचार-विमर्श रहित बहुमत को जनता का तर्कसंगत संकल्प नहीं कहा जा सकता। तर्कसंगत संकल्प की ठोस व्यवस्था के बिना लोकतंत्र का अस्तित्व नहीं हो सकता। जबकि जनोन्मादी तंत्र बयानबाजी का एक साधन है जिसमें जनता के तर्कयुक्त संकल्प की अवहेलना करते हुए आबादी के एक हिस्से की भावनाओं को भड़काया जाता है। तर्कसंगत संकल्प की बात करें तो उसके लिए जगह की उपयुक्तता, सुविधाएं, भूमि का प्रकार, दूरी आदि पर विचार किया जाएगा। स्थान चुनने के लिए विभिन्न हितधारकों और विभिन्न मानकों के बीच एक व्यापक समझौता होना आवश्यक होगा। साथ ही, अपनाए जाने से पहले इस संकल्प को बहुमत की कसौटी पर कसा जाएगा।

उल्लेखनीय है कि तर्कसंगत संकल्प से किनारा करने के लिए एक समुदाय (बहुसंख्यक) की भावनाओं को उभारना और दूसरे समुदाय को खारिज करना ही जनोन्माद है। यहां महत्वपूर्ण अंतर ये है कि जहां तर्कसंगत संकल्प में समस्या के समाधान के लिए उसे तर्क की कसौटी पर कसना अनिवार्य है, वहीं जनोन्मादी नेता तर्क प्रक्रिया से कोई वास्ता नहीं रखना चाहता। उसकी दिलचस्पी मात्र समस्या को किसी असंबद्ध भावनात्मक मुद्दे में बदलने में होती है। जन भावनाओं का दोहन लोकतंत्र की कमजोरी है। जनोन्मादी नेता जानबूझ कर ऐसे मुद्दे चुनता है जो समुदाय विशेष की पहचान से गहरे जुड़े होते हैं और जिन्हें अतीत की कोई बड़ी घटना दूसरे समुदाय से अलग करती है। तुरंत किसी बात से घृणा करने लगना इंसान का सहज स्वभाव है। जबकि विश्वास और प्रेम का असर दिखने में समय लगता है। इस कारण जनोन्मादी नेताओं के हाथ में घृणा एक बेहद शक्तिशाली भावनात्मक औजार होता है। सामान्य परिस्थितियों में तर्कयुक्त संकल्प के मुकाबले इसकी अनदेखी कर दी जाती है।

जनोन्माद और लोकतांत्रिक मूल्यों के ह्रास को कुछ ताजा घटनाक्रमों के माध्यम से भी समझा जा सकता है। जैसे सत्ता में बैठा ताकतवर व्यक्ति चाहता है कि हर तरफ उसी का राज हो। यानी अश्वमेघ। पिछले दिनों देश की कुछ घटनाएं बाहर के लोगों को हैरान करने वाली हैं तो देश के अंदर के लोगों को परेशान करने वाली। कर्नाटक में सत्ताधारी पार्टियों में बगावत, मुंबई में अपनी पार्टी के विधायकों से मिलने गए कर्नाटक के मंत्री का हिरासत में लिया जाना, गोवा में विपक्षी कांग्रेस के दो तिहाई विधायकों का सत्ताधारी बीजेपी में शामिल होना, तेलगू देशम पार्टी के कई राज्य सभा सदस्यों को बीजेपी में लिया जाना या उससे पहले केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी के अध्यक्ष को बंगाल में सभा करने से रोकने की कोशिश, दूसरी पार्टियों के निर्वाचित प्रतिनिधियों को हड़पने के मामले में क्षेत्रीय पार्टियां भी पीछे नहीं हैं।

पिछले दिनों तेलांगना में सत्ताधारी टीआरएस ने भारी जीत के बावजूद विपक्षी कांग्रेस के 19 में से 12 विधायकों को मिला लिया था। कर्नाटक की घटना इस मायने में विशेष है कि वहां सरकार के गिरने का खतरा है। इस मामले को ऐसे या वैसे देखा जा सकता है। या तो सत्ताधारी विधायकों की बगावत या विपक्षी बीजेपी द्वारा उन्हें तोड़ने की कोशिश। गोवा का मामला तो एकदम साफ है। दोनों ही मामले लोकतंत्र के लिए अच्छे नहीं हैं। इन मामलों से तीन बातें उभर कर सामने आती हैं। एक, पार्टी सदस्यों की पार्टी के प्रति कोई निष्ठा नहीं रह गई है, राजनीतिक दल एक दूसरे को एक दूसरे का प्रतिद्वंद्वी नहीं एक दूसरे का दुश्मन समझने लगे हैं। पार्टियां एक दूसरे को खत्म कर आगे बढ़ना चाहती हैं तो पार्टियों के नेता अपने फायदे के लिए पार्टी को कुछ भी नुकसान पहुंचाने के लिए तैयार हैं।

अटल बिहारी वाजपेयी के पांच साल के गठबंधन शासन के बाद लग रहा था कि भारतीय लोकतंत्र परिपक्व हो चला है। लेकिन यहां तो हालात बिल्कुल बदले हुए से लग रहे हैं।लेकिन मनमोहन सिंह के दस साल के शासन ने कुछ ऐसा किया जिसने बीजेपी को आक्रामक, तामसिक और प्रतिशोधी बना दिया है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी अश्वमेध यज्ञ पर निकली है, जिसके प्रताप तले कोई भी लोकतंत्र की मयार्दाओं का पालन करने की जरूरत नहीं समझ रहा है। जिस तरह से विरोधी समझे जाने वालों के खिलाफ पुलिस या दूसरी कार्रवाईयां हो रही हैं साफ झलक रहा है कि पार्टियों का एक दूसरे में न तो भरोसा रह गया है और न ही एक दूसरे के लिए कोई सम्मान है। लोकतंत्र का अर्थ लोगों का तंत्र है। जनता अपने संप्रभुता के अधिकार का इस्तेमाल पांच वर्षों के लिए चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से करती है। इसीलिए नरेंद्र मोदी खुद को प्रधानमंत्री के बदले प्रधानसेवक कहते हैं, क्योंकि वे अपने को किसी राजा के प्रधानमंत्री नहीं बल्कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के बहुमत के नेता के रूप में प्रधानसेवक मानते हैं।

पार्टियां लोकतंत्र का सहारा हैं। वे अपने विचारों और गतिविधियों से लोगों को मुद्दों और विकल्पों से परिचित कराती हैं, उन्हें संगठित करती हैं। चुनाव में मतदाता उन्हीं के आधार पर फैसला लेता है और एक या दूसरी पार्टी को चुनता है। बहुमत में आने वाली पार्टी सरकार बनाती है। विपक्ष का काम उस पर नियंत्रण रखना होता है। विपक्ष के बिना लोकतंत्र संभव नहीं है। पार्टियों के बिना भी लोकतंत्र नहीं चल सकता। इसलिए उन्हें बचाना भी हर लोकतांत्रिक देश की जिम्मेदारी है। यह गारंटी करना सरकार का काम है कि दलगत संरचनाएं इतनी कमजोर न हो जाएं कि लोकतांत्रिक संरचनाएं चरमरा जाए। बीजेपी को समझना होगा कि उसके डर से या उससे फायदा लेने के लिए कहीं कोई लोकतंत्र की जड़ों को नष्ट न कर रहा हो। जड़ें जमीन के अंदर होती हैं, दिखती नहीं। बहरहाल, देखना यह है कि देश में सकारात्मक माहौल कबसे बनना शुरू होता है।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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