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Air Pollution in Delhi: दिल्ली की हवा सुधारने के लिए दिवाली और पराली के आगे सोचना पड़ेगा?

Air Pollution in Delhi: हर साल अक्टूबर बीतते बीतते दिल्ली की हवा बिगड़ने लगती है। इस साल भी हवा खराब हुई, पर उतनी नहीं जितनी पिछले कई वर्षों में होती रही है। इस साल दिवाली के आसपास भी हवा उतनी खराब नहीं हुई। हालांकि सूचकांक के लिहाज से यह बहुत खराब की श्रेणी में है, लेकिन खतरनाक श्रेणी में नहीं है।

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दिवाली के अगले दिन दिल्ली में वायु गुणवत्ता सूचकांक (Air Quality Index) 303 पर था जो पिछले कई वर्षों के मुकाबले काफी कम था। लेकिन उसके बाद हवा की स्थिति खराब होती चली गई और 31 अक्टूबर को एक्यूआई 500 पर पहुंच गया। दिल्ली की हवा खराब होने के कई कारण है। इनमें से छोटा हिस्सा पड़ोसी राज्यों में फसल अवशेष को जलाने से आने वाला प्रदूषण का भी है। पर दिल्ली और समूची गंगा घाटी में वायु प्रदूषण एक जटिल घटना है जिसके अनेक कारण हैं। प्रदूषणकारी गतिविधियों के साथ मौसम की अवस्था व अनेक स्थानीय कारण उसमें शामिल होते हैं।

अक्टूबर मानसून की वापसी के बाद का महीना होता है। मानसून के बाद हवा की दिशा बदलती है और वह उत्तर-पश्चिम की ओर से प्रवाहित होने लगती है। दिल्ली के उत्तर पश्चिम में पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्य है। इसलिए इन राज्यों की अवस्था का प्रभाव दिल्ली पर पड़ता है। एक अध्ययन के अनुसार दिल्ली में 72 प्रतिशत हवा उत्तर पश्चिम से आती है, केवल 28 प्रतिशत हवा ही पूर्व अर्थात गंगाघाटी की ओर से आती है।

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    हवा की दिशा बदलने के साथ ही तापमान में गिरावट का भी प्रदूषण की मात्रा बढ़ने में योगदान होता है। तापमान गिरने से वायुमंडल का वह स्तर और नीचे आ जाता है जिसके ऊपर प्रदूषकों का फैलाव नहीं होता। इससे वायुमंडल के निचले स्तर में प्रदूषण की सघनता बढ़ जाती है। साथ ही हवा की गति अगर तेज रही तो प्रदूषकों का फैलाव भी तेजी से होता है। लेकिन वायुमंडल के तापमान के गिरने से हवा की गति भी कम हो जाती है। इन मौसमी कारणों से पूरा इलाका प्रदूषण के प्रभाव में रहता है। ऐसे में पराली जलने से आया धुआं या धूल की आंधियों के आने से प्रदूषण एकाएक बढ़ जाता है।

    फसल अवशेष खासकर धान की पराली जलाने के मामले 2009 से काफी बढ़ गए। क्योंकि पंजाब व हरियाणा की सरकारों ने पानी की बचत करने के लिए धान की खेती विलंब से करने का कानून बना दिया। मकसद भूजल दोहन को नियंत्रित करना था। देर से फसल लगाने से फसल-चक्र का मानसून से जुड़ाव हो जाता है। सिंचाई के लिए भूजल का दोहन कम होता है। लेकिन कटाई के बाद अगली फसल लगाने के लिए कम समय मिलता है।

    खेत खाली करने के लिए पराली को जला देना सुविधाजनक होता है। कटाई में हार्वेस्टर जैसे मशीनों के उपयोग ने भी इसे प्रोत्साहित किया। पिछले ग्यारह वर्षों से यह प्रक्रिया चल रही है। केन्द्र सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद इसे रोका नहीं जा सका है, हालांकि इसमें कुछ कमी जरूर आई है। वैसे फसल अवशेषों को जलाने की घटनाएं मुश्किल से 45 दिन होती है, पर दिल्ली का प्रदूषण फरवरी तक इसी तरह बना रहता है।

    हवा में धूल और वाहनों से हुए प्रदूषण के दो प्रमुख कारण हैं। ठंड और सूखे मौसम से हवा में धूल की मौजूदगी बनी रहती है। नवंबर से जून के बीच वर्षा बहुत कम होती है। कानपुर आईआईटी के एक अध्ययन में पता चला कि हवा में पीएम 10 व पीएम 2.5 की मात्रा में 56 प्रतिशत धूलकण होता है और पीएम 2.5 का 20 प्रतिशत वाहन प्रदूषण से आता है।

    वाहन प्रदूषण का मुकाबला करने के लिए सरकार ने पिछले वर्षों में कई उपाय किए हैं। इनमें बीएस-6 ईंधन को अपनाया जाना, इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहित करना, आपातकालीन स्थिति में वाहनों को नंबर के मुताबिक ऑड-इवन के रूप में चलाना, पूर्वी और पश्चिमी सीमा पर एक्सप्रेस-वे बनाना आदि शामिल हैं।

    कोरोना जनित लॉकडाउन के दौरान दिल्ली की हवा एकदम साफ हो गई थी। सितंबर में तापमान भी औसत से अधिक रहा। इसका अर्थ है कि हवा अधिक समय तक साफ रही। वाहनों के सड़क पर आने के साथ ही तापमान गिरने लगा और पराली जलाने की घटनाओं के मिले जुले प्रभाव से हवा खराब होने लगी।

    दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित 20 महानगरों में 14 भारत में हैं इनमें एक दिल्ली भी है। राजधानी होने से दिल्ली की हवा खराब होने की चर्चा अधिक हो जाती है। पड़ोसी पंजाब व हरियाणा में पराली जलाने की घटनाएं अधिक होने से इस प्रदूषण का दोष उन पर थोप दिया जाता है। जबकि वायु प्रदूषण का प्रकोप कमोबेश पूरी गंगा घाटी में है और पराली जलाने से अधिक बड़ा कारण तापमान के घटने से प्रदूषण की सघनता बढ़ना और वाहनों व दूसरे स्रोतों से होने वाला प्रदूषण है।

    वैसे दिल्ली की हवा आज भी बहुत खराब श्रेणी (एक्यूआई-500) में है इसके नवंबर में और अधिक खराब होने की आशंका है। कुछ जगहों पर हवा में पानी का छिड़काव करने के लिए मशीनें तैनात की गई हैं ताकि हवा में मौजूद धूलकण नीचे बैठ जाएं और हवा थोड़ी साफ हो सके। लेकिन फसल अवशेष जलाने से प्रदूषण में बढ़ोतरी हो गई है और इससे पीएम 2.5 कणों की हिस्सेदारी 26 प्रतिशत हो गई है। हवा की गति और दिशा की वजह से स्थिति अभी अधिक खराब होने की आशंका जताई गई है। इसे देखते हुए निर्माण कार्यों पर कठोरता से रोक लगा दी गई है।

    इस आदेश को लागू करने के लिए दिल्ली सरकार ने अधिकारियों की टोली तैनात कर दी है, परंतु ये सब इसके तात्कालिक समाधान हैं जिससे कुछ हद तक ही राहत मिल सकती है। दिल्ली में वायु प्रदूषण के वास्तविक समाधान के लिए पूरी व्यवस्था को शीर्षासन करना पड़ेगा, जिसकी कोई संभावना अभी दिखती नहीं है।

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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