AAP and Congress: कांग्रेस की कब्र पर आम आदमी पार्टी का उदय
एक दिन पहले दिल्ली नगर निगम के चुनाव नतीजे और अब गुजरात के चुनाव परिणाम। इन परिणामों को देखकर एक बात साफ समझ आती है कि कांग्रेस की कब्र पर आम आदमी पार्टी का उदय और विकास हो रहा है।

AAP and Congress: दिल्ली के जंतर मंतर पर 2011 में अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चल रहा था। आंदोलन इतना प्रभावी हो गया था कि लोकपाल की मांग पर केन्द्र की कांग्रेस सरकार बार बार केजरीवाल को बातचीत का न्यौता दे रही थी। बात किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रही थी, ऐसे में एक दिन झल्लाकर कांग्रेस के नेताओं ने अरविन्द केजरीवाल को ऑफर दे दिया कि राजनीति में भ्रष्टाचार की इतनी ही चिंता है तो इन लोगों को आंदोलन छोड़ राजनीति में उतर आना चाहिए।
उस समय तक आंदोलन में शामिल लोगों का रानीतिक पार्टी बनाने का कोई इरादा नहीं था। लेकिन आंदोलन का संयोजन कर रहे अरविन्द केजरीवाल ने संभवत: इस सलाह को गंभीरता से ले लिया और आम आदमी पार्टी के जन्म के साथ ही भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन खत्म हो गया।
आज आम आदमी पार्टी दिल्ली की स्थानीय पार्टी की छवि से बाहर निकलकर दस साल के भीतर ही एक राष्ट्रीय पार्टी बन गई है। राजनीति के अपने दस सालों के इस सफर में आम आदमी पार्टी ने सबसे ज्यादा किसी को नुकसान पहुंचाया है तो वह कांग्रेस ही है। दिल्ली में जो जगह कांग्रेस की थी अब उस जगह आम आदमी पार्टी अपनी जड़ें जमा चुकी है। दिल्ली के बाहर अभी तक पंजाब और गुजरात में आम आदमी पार्टी ने अपनी जगह बनाना शुरु किया है, और दोनों ही जगहों पर उसका उदय कांग्रेस की कब्र पर हुआ है।
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बुधवार को दिल्ली नगर निगम चुनाव परिणाम आये, जिसमें केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने 250 सीटों में से 134 सीटें जीत लीं। 15 सालों से दिल्ली के तीन नगर निगमों पर काबिज भारतीय जनता पार्टी को इस चुनाव में 104 वार्डों पर ही जीत मिली है। लेकिन आप वोट शेयर देखेंगे तो पायेंगे कि बीते 2017 के चुनाव के मुकाबले आम आदमी पार्टी का वोट शेयर ही नहीं बढ़ा बल्कि भाजपा का वोट शेयर भी बढ़ा है।
2017 के नगरपालिका चुनाव में भाजपा को 36.08 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि इस बार उसे 39.09 प्रतिशत वोट मिले हैं। यानी सीटें कम होने के बावजूद बीजेपी के वोट शेयर में 3 प्रतिशत की बढत हुई है। वहीं आम आदमी पार्टी के वोट शेयर में बीते नगरपालिका चुनाव के मुकाबले लगभग 15.82 प्रतिशत का उछाल आया है। आम आदमी पार्टी को 2017 में 26.23 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि इस बार दिल्ली नगर निगम चुनाव में 42.05 प्रतिशत वोट मिले हैं। अगर इस बार कांग्रेस के वोटों की बात करें तो 2017 में 21.09 प्रतिशत वोट के मुकाबले इस बार उसे 11.68 प्रतिशत वोट मिले हैं और 9.41 प्रतिशत वोटों की भारी गिरावट आयी है। इसके साथ ही निर्दलियों एवं अन्य उम्मीदवारों के वोट शेयर में भी भारी गिरावट आयी है। इस बार कांग्रेस एवं अन्य उम्मीदवारों के वोट कम होकर भाजपा और आम आदमी पार्टी में बंट गए है।
ये नतीजे बिल्कुल वैसे ही हैं जैसे दिल्ली विधानसभा के समय थे। 2020 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को 53.57 प्रतिशत वोट मिले थे। भाजपा को बीते विधानसभा चुनाव में 38.51 प्रतिशत वोट मिले थे। स्वाभाविक है, दोनों पार्टियों में वोटों का यह बड़ा अंतर सीटों का अंतर भी बन गया। भाजपा को सिर्फ 8 सीट मिली जबकि आम आदमी पार्टी को 62 सीटों पर जीत मिली। 2020 में जहां आम आदमी पार्टी के वोट शेयर में मामूली गिरावट आयी थी वहीं बीजेपी का वोट 6.21 प्रतिशत बढा था।
2020 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कुल वोट का मात्र 4.26 प्रतिशत मत मिला था। 2013 से दिल्ली में कांग्रेस लगातार पतन के गर्त में जा रही है जिसका सीधा फायदा आम आदमी पार्टी को मिल रहा है। भारतीय जनता पार्टी का मतदाता न केवल उसके साथ बना हुआ है बल्कि हर बार थोड़ा बहुत बढ़ भी रहा है। लेकिन कांग्रेस इतनी तेजी से धराशायी हुई है कि अपना वोट शेयर बढ़ाकर भी भाजपा दिल्ली में केजरीवाल का मुकाबला नहीं कर पा रही है। दिल्ली में कांग्रेस का पतन ही आम आदमी पार्टी की सफलता का सबसे बड़ा कारण है।
लगभग यही स्थिति पंजाब में भी है जहां कांग्रेस को बुरी तरह हराकर अब आम आदमी पार्टी सत्ता में है। इसी साल हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को 42.01 प्रतिशत वोट मिला था, जो 2017 के 23.7 प्रतिशत के मुकाबले में लगभग दोगुना था। इसका जबर्दस्त लाभ आम आदमी पार्टी को मिला और उसे पंजाब में 117 सीटों में 92 सीटों पर जीत हासिल हुई। 2017 में 77 सीटें जीतनेवाली कांग्रेस को 38.5 प्रतिशत के मुकाबले में 22.97 प्रतिशत वोट ही मिले। इसका असर ये हुआ कि कांग्रेस पंजाब में धड़ाम से गिर गयी और 18 सीटों पर सिमट गयी। हां, शिरोमणि अकाली दल की सहयोगी भाजपा की इस राज्य में पहले भी कोई खास हैसियत नहीं थी। इस बार उसने अपने दम पर चुनाव लड़ा फिर भी उसके वोटों में 2017 के मुकाबले एक प्रतिशत की बढ़त हुई है।
अब ऐसा ही कुछ गुजरात में भी दिखाई दे रहा है। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को कुल 49.04 प्रतिशत वोट मिले थे तो कांग्रेस को 41.44 प्रतिशत वोट। राज्य में कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी टक्कर देते हुए 77 सीटें जीत ली थी। लेकिन इस बार 2022 में भाजपा ने जहां अपने वोटों में तीन प्रतिशत से अधिक की बढ़त की है, वहीं कांग्रेस के वोटों में 22 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आ रही है। आखिरी चुनाव परिणाम आते आते हो सकता है कांग्रेस के वोट शेयर में थोड़ा सुधार हो भी जाए लेकिन वह अपने पिछली बार के वोट प्रतिशत को बरकरार नहीं रख पायेगी।
हिमाचल प्रदेश के चुनाव परिणाम देखें तो साफ दिखता है कि वहां कांग्रेस चुनाव मुकाबले में है इसलिए आम आदमी पार्टी अपने पैर नहीं जमा पायी है। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा में सीधी टक्कर है, क्योंकि वहां आम आदमी पार्टी अपना पैर नहीं जमा पायी है।
साफ है, आम आदमी पार्टी का विकास कांग्रेस की कीमत पर ही हो रहा है। जहां जहां कांग्रेस खत्म हो रही है वहां वहां आम आदमी पार्टी एक राजनीतिक ताकत के रूप में उभर रही है। हो भी क्यों नहीं, आम आदमी पार्टी का गठन और शुरुआत भारतीय जनता पार्टी के विरोध में तो हुआ नहीं था। उसकी शुरुआत ही कांग्रेस के विरोध में हुई थी। ऐसे में वह कांग्रेस का विकल्प बन रही है तो इसमें आश्चर्यजनक क्या है?
अपने अंतर्विरोधों और गलत राजनीतिक नैरेटिव के कारण देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस एक कब्र में परिवर्तित होती जा रही है। उस कब्र पर जिस नयी नवेली पार्टी का उदय और विकास हो रहा है, हो सकता है वही भविष्य में कांग्रेस की जगह ले ले। फिलहाल तो दस सालों में आम आदमी पार्टी के विस्तार से तो यही संकेत मिल रहे हैं।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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