Delhi CM: जेल से सरकार, किसे राजनीतिक नफा, किसे नुकसान

Delhi CM: पिछले साल फरवरी में दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने तिहाड़ जेल में पहुंचते ही इस्तीफा दे दिया था| तब से आशंका व्यक्त की जा रही थी कि शराब घोटाले में मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की भी गिरफ्तारी होगी|

कम से कम अरविन्द केजरीवाल को तो आशंका थी ही, इसलिए उन्होंने खुद कहा था कि अगर उन्हें गिरफ्तार किया गया, तो वह इस्तीफा नहीं देंगे, बल्कि जेल से ही सरकार चलाएंगे| जेल से सरकार चलाने का जनादेश लेने के लिए आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने दिल्ली में कुछ घरों में जाकर लोगों से पूछा था कि अगर केजरीवाल को गिरफ्तार किया जाता है, तो उन्हें जेल से ही सरकार चलानी चाहिए या इस्तीफा दे देना चाहिए|

Delhi CM

बाद में आम आदमी पार्टी ने दावा किया था कि 98 प्रतिशत जनता ने कहा है कि अगर केजरीवाल को गिरफ्तार किया जाता है, तो वह जेल से ही सरकार चलाएं| ईडी ने 21 मार्च को केजरीवाल को हिरासत में लिया था, वह तब से ईडी के रिमांड पर चल रहे थे| लेकिन रिमांड खत्म होने के बाद अब उन्हें तिहाड़ जेल भेज दिया गया है|

इससे पहले रिमांड के दौरान भी किसी के मुख्यमंत्री बने रहने का कोई उदाहरण मौजूद नहीं था, लेकिन अब तो केजरीवाल को बाकायदा जेल भेज दिया गया है| वह पहले मुख्यमंत्री बन गए हैं, जो पद पर रहते हुए जेल में प्रवेश कर रहे हैं| अभी तक लालू यादव और जे. जयललिता के दो उदाहरण दिए जाते थे, जिन्होंने जेल में जाने से पहले इस्तीफा दे दिया था|

Delhi CM arvind kejriwal

हालांकि इन दोनों से पहले 1982 में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ए.आर. अंतुले को भ्रष्टाचार के मामले में जेल जाने से पहले इस्तीफा देना पड़ा था| हालांकि बाद में उसी केस में वह सुप्रीमकोर्ट से बरी हो गए थे| उमा भारती ने तो सिर्फ कोर्ट का सम्मन आने पर इस्तीफा दे दिया था| मदन लाल खुराना ने सिर्फ आरोप लगने पर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था| अब उस लिस्ट में हेमंत सोरेन का नाम भी जुड़ गया है|

केजरीवाल के वकीलों और खुद केजरीवाल को भी नहीं लगता कि उन्हें जल्दी जमानत मिलेगी, इसलिए उन्होंने जेल में पढ़ने के लिए तीन किताबों की मांग की| अरविन्द केजरीवाल की तरफ से दलील दी जा रही है कि संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि जेल जाने पर उन्हें इस्तीफा देना पड़ेगा| वह ठीक कह रहे हैं, संविधान में ऐसा बिलकुल नहीं लिखा|

संविधान सभा के 389 सदस्यों की नैतिकता का स्तर इतना ऊंचा था कि किसी एक ने भी इस मुद्दे पर सोचा ही नहीं कि भविष्य में ऐसी नौबत आ सकती है| लेकिन जो बात संविधान में नहीं लिखी हो उस पर सुप्रीमकोर्ट का फैसला ही परंपरा बनता है, और उसे ही क़ानून भी माना जाता है|

इस संबंध में सुप्रीमकोर्ट का एक फैसला पहले से मौजूद है, इसलिए 28 मार्च को जब हाईकोर्ट ने केजरीवाल को हटाने बारे में पीआईएल नामंजूर की, तो आश्चर्य हुआ। इसलिए यह मामला नए सिरे से हाईकोर्ट के सामने आया हुआ है| पहली बार याचिका अस्वीकार करते हुए कोर्ट ने कहा था कि अगर कोई संवैधानिक संकट है, तो उस पर उपराज्यपाल या राष्ट्रपति को फैसला करना है|

अब नई याचिका में कहा गया है कि कोर्ट उपराज्यपाल को आदेश दें कि वह केजरीवाल को बर्खास्त करें| लेकिन लगता नहीं कि हाईकोर्ट इसमें दखल देगा| संभावना यही है कि हाईकोर्ट इस संबंध में यह मामला उपराज्यपाल और राष्ट्रपति पर ही छोड़ने की बात कहेगी| निश्चित है यह मामला भी सुप्रीमकोर्ट में जाएगा|

यहाँ महत्वपूर्ण यह है कि सुप्रीमकोर्ट का पहले का एक फैसला केजरीवाल को मुख्यमंत्री पद पर रहने की इजाजत नहीं देता| जे. जयललिता दो बार जेल गई थी, पहले 2001 में और दूसरी बार 2011 में| उन्होंने दोनों ही बार इस्तीफा दे दिया था| लेकिन जयललिता के इस्तीफे से पहले तमिलनाडु सरकार का एडवोकेट जनरल सुप्रीमकोर्ट पहुंचा था और सुप्रीमकोर्ट में कहा कि उनके पास जनता का जनादेश है| तमिलनाडु की सरकार जयललिता को ही मुख्यमंत्री देखना चाहती हैं और लोकतंत्र में जनादेश का सम्मान होना चाहिए|

बिलकुल वैसे ही जैसे केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के सभी नेता कह रहे हैं| लेकिन तब सुप्रीमकोर्ट ने कहा था कि "सरकार संविधान के अंतर्गत बनती है| सम्मान संविधान का होता है, संविधान के कारण ही जनादेश मिला है| जनादेश के आधार पर किसी अपराधी या आरोपी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नहीं बिठाया जा सकता| इसलिए जो कुछ भी होगा, वह संविधान के माध्यम से होगा और संविधान इजाजत नहीं देता है कि जेल के अंदर से सरकार चलाई जाए|"

सुप्रीमकोर्ट का एक और जजमेंट है - आर. एस. नायक बनाम ए.आर. अंतुले| इस मामले में अपने फैसले में सुप्रीमकोर्ट ने कहा था कि मुख्यमंत्री पब्लिक सर्वेंट होता है| क्योंकि वह पब्लिक सर्वेंट होता है, इसलिए उस पर पब्लिक सर्वेंट के सारे नियम लागू होंगे|

अब अगर कोई भी पब्लिक सर्वेंट 48 घंटे से ज्यादा जेल में रहता है, तो उसे निलंबित कर दिया जाता है| फिर कोई मुख्यमंत्री जेल में रहते हुए पद पर कैसे रह सकता है| संविधान के मुताबिक़ मुख्यमंत्री और मंत्री राज्यपाल या उपराज्यपाल के अधीन अधिकारी हैं| बस उन का चयन यूपीएससी के बजाए एक निश्चित अवधि के लिए जनता करती है (पांच साल या जब तक सरकार को सदन में बहुमत हासिल है)|

संविधान के मुताबिक़ मुख्यमंत्री की रहनुमाई में केबिनेट राज्यपाल या उपराज्यपाल को सलाह देने का काम करती है| केबिनेट से पास हुए बिना सरकार का कोई भी प्रस्ताव कानूनी तौर पर मान्य नहीं होता| इस संबंध में आपातकाल का उदाहरण मौजूद है| इंदिरा गांधी ने केबिनेट से पास करवाने से पहले ही आपातकाल पर राष्ट्रपति के दस्तखत करवा लिए थे, बाद में सुप्रीमकोर्ट ने इसे गलत ठहराया था|

जेल मेन्यूल के मुताबिक़ जेल में केबिनेट मीटिंग हो नहीं सकती| इस लिए उपराज्यपाल ऐसी सरकार का क्या करेंगे, जो कोई सलाह देने में सक्षम ही नहीं है| केजरीवाल जब तक ईडी की हिरासत में थे, तब तक तो ठीक था, लेकिन रिमांड खत्म होने के बाद अब अगर आजकल में केजरीवाल को जमानत नहीं मिलती, और उन्हें तिहाड़ जेल में ही रहना पड़ता है, तो सरकार ठप्प पड जाएगी|

संवैधानिक संकट अब शुरू हुआ है| उप राज्यपाल पहले ही कह चुके हैं कि वह जेल से सरकार नहीं चलने देंगे| दिल्ली हाईकोर्ट पहले ही कह चुकी है कि संवैधानिक संकट का समाधान उप राज्यपाल या राष्ट्रपति को निकालना है| सवाल यह है कि क्या उपराज्यपाल किसी अन्य मंत्री को मुख्यमंत्री नियुक्त करके नई सरकार बनाने को कह सकते हैं| जैसे तमिलनाडु के मामले में सुप्रीमकोर्ट ने कहा था|

इसका फैसला आम आदमी पार्टी नहीं करेगी, फैसला उपराज्यपाल करेंगे या सुप्रीमकोर्ट करेगा| उपराज्यपाल यानी मोदी सरकार| पहली जिम्मेदारी मोदी सरकार की ही है| दिल्ली सरकार के बारे में मोदी सरकार जो भी फैसला करेगी, उसका चुनावी राजनीति पर असर पड़ेगा| कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावों के समय केजरीवाल की गिरफ्तारी और उनकी सरकार का बर्खास्त किया जाना भारतीय जनता पार्टी को महंगा पड़ सकता है|

जबकि दूसरी तरफ मोदी सरकार ने चुनावों की घोषणा के बाद ईडी को केजरीवाल की गिरफ्तारी की हरी झंडी भी तो कुछ सोच समझ कर दी होगी| भारतीय जनता पार्टी में भी इसे लेकर मतभेद हैं| भाजपा के कुछ नेताओं का मानना है कि गिरफ्तारी गलत समय पर की गई है, चुनावों के दौरान गिरफ्तारी करने की बजाए गिरफ्तारी की तलवार लटकाए रखी जानी चाहिए थी|

जिनका यह तर्क है, वे अपने तर्क के समर्थन में 2013 का उदाहरण देते हैं, जब केजरीवाल के इस्तीफे के एक साल बाद तक मोदी सरकार ने दिल्ली विधानसभा के चुनाव नहीं करवा कर केजरीवाल को और मजबूत होने का मौक़ा दे दिया था| जबकि जोड़तोड़ से भाजपा तभी सरकार बना लेती, या विधानसभा भंग करके तभी चुनाव करवा लेती तो शायद आज यह नौबत ही नहीं आती| दूसरी तरफ एक वर्ग का तर्क यह भी है कि केजरीवाल की गिरफ्तारी मोदी की भ्रष्टाचार खत्म करने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिसका चुनावों में भाजपा को फायदा होगा|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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