Air Pollution: वायु प्रदूषण के खिलाफ युद्ध स्तर पर कार्रवाई की जरूरत
Air Pollution: इसे नियति कहें या कर्म का सिद्धांत। देश की राजधानी में बैठकर अलग अलग मंत्रालय विकास की जो योजनाएं बनाते हैं, वही विकास धुंध के रूप में हर साल दिल्ली के आसमान को ढकने लगा है। निश्चित रूप से दिल्ली के प्रदूषण की दिल्ली की परिस्थितियां उतनी जिम्मेवार न हों लेकिन दिल्ली में बैठकर बनायी गयी नीतियां जरूर जिम्मेवार हैं। प्रदूषण पैदा करनेवाले औद्योगिक विकास का अनुमोदन करने में सरकारी विभाग जितनी जल्दबाजी दिखाते हैं, उससे पैदा होने वाले प्रदूषण से निपटने में उतनी ही लेट लतीफी के शिकार हो जाते हैं।
भारत में हवा की गुणवत्ता सुधारने के लिए दिल्ली में बैठनेवाली भारत सरकार द्वारा 2019 में एक नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (एन-कैप) शुरु किया गया था। यह कार्यक्रम देशव्यापी था और इसके तहत 2025-26 तक पीएम-10 मैटर को वातावरण में 40 प्रतिशत तक कम करना है। यह अभियान केन्द्रीय पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की निगरानी में शुरु किया गया था। इस कार्यक्रम के तहत न सिर्फ बड़े शहरों में बल्कि राज्य स्तर, छोटे शहरों और जिला स्तर पर प्रदूषण की निगरानी करना है। इसके साथ ही निचले स्तरों पर पहुंचकर वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के उपाय करने हैं।

आज चार साल पूरे होने को आये लेकिन इस दिशा में न तो जमीन पर ऐसा कोई प्रभावी कार्यक्रम दिखता है और न ही उसके प्रभाव को आंकने के लिए कोई वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध है। नये तरीकों के अभाव में शहरों में प्रदूषण नियंत्रण के वही पुराने उपाय अपनाये जा रहे हैं जो प्रभावी से ज्यादा सांकेतिक हैं। वायु प्रदूषण के नये स्रोतों का कोई डाटा भी सरकार के पास उपलब्ध नहीं है।
भारत सरकार द्वारा शहरी प्रदूषण को नियंत्रित करने के इसी एन-कैप कार्यक्रम की अगर इस साल मार्च 2023 की रिपोर्ट देखें तो परिणाम इतने आशाजनक नहीं हैं कि 2025 तक निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त कर सकें। दिल्ली को ही देखें तो पीएम-10 मैटर का घनत्व 178 ग्राम पर क्यूबिक मीटर था। चार साल की मेहनत के हालात में शून्य सुधार हुआ है और दिल्ली की हवा में पीएम-10 मैटर जस का तस बना हुआ है। इन्हीं आंकड़ों के अनुसार कुछ छोटे शहरों में जरूर उम्मीद से अधिक सुधार आया है जिसमें आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ छोटे शहर शामिल हैं।
कुछ छोटे शहरों में हालात भले सुधरें हो लेकिन औद्योगिक गतिविधि वाले शहरों, बड़े शहरों में वायु की गुणवत्ता में कोई खास सुधार नहीं आया है। इसका दुष्परिणाम ये हो रहा है कि सरकारी संसाधन भी खर्च हो रहे हैं लेकिन कोई अपेक्षित परिणाम भी नहीं निकल रहा है। अगर वायु प्रदूषण को नियंत्रित करना है तो लंबे समय की रणनीति बनानी पड़ेगी। विभिन्न तकनीकी के जरिये नये नये तरह के वायु प्रदूषण का जो खतरा पैदा हो रहा है उसे समझना होगा और अकेले एक मंत्रालय की बजाय विभिन्न मंत्रालयों के साथ मिलकर काम करना होगा। तब जाकर अपेक्षित परिणाम प्राप्त हो सकते हैं।
शहर के स्तर पर वायु प्रदूषण के विभिन्न स्रोतों की पहचान करना इतना आसान काम नहीं है। हमें यह समझना होगा कि वायु प्रदूषण बहुविध तरीके से फैलता है और इसे किसी सीमा में नियंत्रित नहीं किया जा सकता। इसलिए किसी एक शहर को केन्द्र में रखकर इसे रोकना संभव नहीं है। अगर हमें अपने शहरों को प्रदूषण मुक्त रखना है तो इसके लिए हमें समग्रता में सोचना और कार्य करना होगा। हमें किसी एक शहर को ध्यान में रखने की बजाय उसके आसपास के शहरों, ग्रामीण इलाकों और राज्यों में वायु प्रदूषण को कम करने के उपाय करने होंगे।
जैसे इस समय अगर दिल्ली का दम घुट रहा है तो उसके लिए अकेले दिल्ली का प्रदूषण जिम्मेवार नहीं है। उस पर यूपी, हरियाणा और पंजाब की प्रदूषण पैदा करनेवाली गतिविधियों का भी असर हो रहा है। इसलिए राज्य सरकार, जिला प्रशासन, शहर की नगरपालिकाएं जब मिलकर सामूहिक रूप से प्रयास करेंगी तब हम वायु प्रदूषण के पर काबू कर पायेंगे।
इसके लिए बहुत स्थानीय स्तर पर योजनाएं बनाने की जरूरत है और उन्हें कठोरता से लागू करने की भी। गाड़ियों से फैलने वाले प्रदूषण, कल कारखानों से निकलनेवाला प्रदूषण, पराली और घरेलू इस्तेमाल की लकड़ी व कोयला को जलाने से होनेवाला प्रदूषण और सड़कों की दशा सबको ध्यान में रखकर योजना बनानी पड़ेगी। ये योजनाएं किसी एक शहर के लिए नहीं बल्कि आसपास के शहरों/राज्यों को जोड़कर बनानी होगीं। शहर की सीमारेखा सीमित है और वायु का विचरण असीमित। ऐसे में कोई शहर वायु प्रदूषण को रोकने के लिए कोई भी उपाय करे, वह सीमित ही रहेगा क्योंकि सड़कें शहर के बाहर भी जाती हैं और उद्योग शहर के आसपास ही लगे होते हैं। इसके लिए जरूरी है कि राज्य सरकार के स्तर पर सभी आवश्यक विभाग मिलकर वायु प्रदूषण के दैत्य पर काबू करने का प्रयास करें तभी इस दिशा में सफलता मिल पायेगी।
दो साल पहले प्रधानमंत्री मोदी भले ही काॅप 26 में वादा करके आये हों कि 2070 तक वो जीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को भारत में प्राप्त कर लेगें लेकिन उनके इस वादे को पूरा करने के लिए सरकारी स्तर पर नीतियों की पारदर्शिता तथा स्पष्ट कार्ययोजना जरूरी है। अभी तो हालात ऐसे हैं कि सरकार के पास न तो प्रदूषण का सटीक आंकलन है और न ही इतने संसाधन और उपकरण है कि वह प्रभावी तरीके से वायु प्रदूषण को नियंत्रित कर सके।
सरकारी कर्मचारी इसे एक सरकारी कार्यक्रम की तरह खानापूर्ति करते हैं। वायु प्रदूषण का नियंत्रण सिर्फ खानपूर्ति नहीं हो सकता। यह लोगों के जीवन और स्वास्थ्य को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। सरकारी कर्मचारियों को ये समझना होगा कि वो प्रदूषण नियंत्रण का उपाय करके न केवल दूसरे लोगों के जीवन रक्षा का उपाय कर रहे हैं बल्कि अपने जीवन को भी सुरक्षित कर रहे हैं। जब तक वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सरकारी कर्मचारियों में इस स्तर की समझ नहीं विकसित होगी, सिर्फ खानापूर्ति ही होती रहेगी।
केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए जिन 131 शहरों को चिन्हित किया गया है, इन शहरों को स्वयं कुछ पता नहीं है कि उनके यहां वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोत और कारण क्या है। इन शहरों के पास इस बात का कोई डाटा ही उपलब्ध नहीं है कि उनके यहां किस स्रोत से कितना कार्बन उत्सर्जन हो रहा है। इसके उलट दिल्ली में बीते एक दशक में प्रदूषण पर 11 तथ्यात्मक अध्ययन हो चुके हैं। उनकी रिपोर्ट भी आयी और इन्हें रोकने के उपाय भी बताए गये लेकिन परिणाम जस का तस।
तमाम शहर तो ऐसे हैं जिन्हें सिर्फ प्रदूषण नियंत्रण सूची में इसलिए शामिल नहीं किया गया है क्योंकि सरकार का फोकस 10 लाख से ऊपर वाले शहरों पर है। भारत में कुछ छोटे शहर दिल्ली से भी ज्यादा प्रदूषित हो सकते हैं क्योंकि अभी भी इन शहरों में भोजन बनाने के लिए कोयले या लकड़ी का इस्तेमाल होता है, डीजल के वाहन चलते हैं और सड़कों की हालत बेहद खराब है। फिर भी सरकार की नजर में ये शहर इसलिए नहीं है क्योंकि वो बड़े शहरों की सूची में शामिल नहीं है।
बहरहाल ऐसे समय में जब एक बार दिल्ली का दम घुट रहा है तब जरूरत ऐसी है कि वायु प्रदूषण के खिलाफ युद्ध स्तर पर कार्रवाई शुरु होनी चाहिए। न सिर्फ बड़े शहरों के स्तर पर बल्कि छोटे और मंझोले शहरों के स्तर पर भी। वर्तमान में जो भी कानून हैं उनको सख्ती से लागू किये जाएं और जरूरत पड़ने पर नये कानून भी बनाये जाएं। स्वच्छ वायु ही प्राणवायु है। यह सबकी पहली और आखिरी जरूरत है। फिर चाहे वह देश की राजधानी दिल्ली में बैठे अफसर हों या दूर दराज के छोटे शहरों में रहनेवाले लोग। इससे किसी भी प्रकार से समझौता लोगों के जीवन से समझौता होगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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