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Corona Lockdown: हमें लॉकडाउन की याद क्यों नहीं आती?

हमारे साथ कुछ अच्छा हो या बुरा हमारा मन उसको पकड़ लेता है। फिर समय समय पर उसे याद भी करता है। लेकिन कोरोना काल का लॉकडाउन एक ऐसा समय था जिसे मानों हमारी चेतना ने स्वीकार ही नहीं किया।

coronavirus lockdown anniversary 2023 Why dont we remember the lockdown?

Corona Lockdown: इतनी बड़ी घटना घटित हुई। 2019 में आज के दिन 24 मार्च से ही लगभग 68 दिन तक लोग घरों में कैद रहे। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में तो इसका इतना व्यापक असर नहीं हुआ लेकिन शहरी क्षेत्र रातों रात एक उजाड़ बियाबान में बदल गये। पहले 21 दिन तो लोग घरों से निकल भी नहीं पाये लेकिन उसके बाद जैसे ही 19 दिन का दूसरा लॉकडाउन लगा साधारण लोग असाधारण साहस के साथ घरों से निकल पड़े। मानों अब वो इस उजाड़ बियाबान को हर हाल में छोड़ देना चाहते थे। जो शहर उनकी रोजी रोटी की गारंटी थे अचानक उसे छोड़ वे अपने अपने गांव पहुंच जाना चाहते थे।

इस उजाड़ बियाबान से पीछा छुड़ाने के लिए लाखों लोग न जाने कितनी पीड़ा और मुसीबत सहकर सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करके अपने गांवों तक पहुंचे। कोई गाड़ी से तो कोई साइकिल से। कोई ट्रक में सामान की तरह भरकर अपने घर पहुंचा तो कोई पैदल ही निकल पड़ा। भारत में कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि इस देश की जीवनरेखा कही जाने वाली रेलवे बंद हो जाएगी। लेकिन कोरोना काल के लॉकडाउन में लंबे समय तक रेलवे का पहिया भी थम गया था।

हालांकि 22 मार्च 2019 रविवार के दिन ही लॉकडाउन लग गया था लेकिन औपचारिक रूप से इसकी शुरुआत 24 मार्च से हुई। 24 मार्च से जो भारत बंद हुआ तो 31 मई तक बंद रहा। जो जहां था वहीं फंस गया। कम से कम पहले 21 दिन तो फंसा ही रहा। उसके बाद तो मानों साधारण लोगों ने देश चलाने का दावा करने वालों के खिलाफ सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू कर दिया। लोग निकल पड़े और जहां जाना था, वहां की ओर चल पड़े।

एक से एक मार्मिक और पीड़ित कहानियां हैं कि आज भी याद करो तो आंख भर आती है। कैसा कठिन समय था वह जब लोगों को घरों में बंद करके किसी अदृश्य वायरस को घरों में घुसने से रोका जा रहा था। वायरोलॉजी का एक सामान्य सा सिद्धांत है कि किसी भी वायरस को आप रोक नहीं सकते। उल्टे जो नया वायरस जितनी तेजी से फैलता है उसके खिलाफ उतनी जल्दी हर्ड इम्युनिटी विकसित हो जाती है। लेकिन यहां वायरोलॉजी के इस सामान्य सिद्धांत को ही नकार दिया गया।

दोष किसी एक व्यक्ति, सरकार, देश या संस्था पर देना उचित नहीं। यह एक ऐसा सामूहिक कृत्य था जिसमें कर्ता तो हर कोई था लेकिन वह यह क्यों कर रहा है इसका निर्धारण स्वयं नहीं कर रहा था। हम यंत्रवत हो गये थे। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर किस तिलिस्म ने आकर हमें घेर लिया है। क्या इससे कभी पार पायेंगे भी या नहीं? इतनी उदासी, इतना एकाकीपन, इतनी घबराहट और भय भारत के लोगों ने सामूहिक रूप से शायद कभी अनुभव नहीं किया होगा, जैसा लॉकडाउन में किया था।

फिर भी आज तीन साल बाद ही इतनी भयावह मानवीय यातना हमारी स्मृतियों से इस तरह निकल गयी है कि वे दिन याद नहीं करना चाहते। आखिर हमारी चेतना ने इस सामूहिक पीड़ा को क्यों नकार दिया? यह अनुभव किसी एक व्यक्ति, समुदाय या क्षेत्र विशेष का तो था नहीं। इस पीड़ा का अनुभव तो हमारा साझा अनुभव था, फिर हमारे चित्त से वो यादें, एकदम से कैसे हट गयीं कि हमे याद ही नहीं आ रहा कि 2020-21 हमारे साथ कैसे बीता?

ऐसा लगता है मानों हर भारतीय ने अपने जीवन के वो दो साल काटकर अपने से अलग कर दिए हैं। भुक्तभोगी या प्रत्यक्षदर्शी दोनों पलटकर पीछे नहीं देखना चाहते कि उनके जीवन में कोई ऐसा काल आया भी था। वह सरकार भी उसे अब अपनी उपलब्धि के तौर पर नहीं देखना चाहती जिसने संपूर्ण लॉकडाउन के इस असंभव को संभव किया था।

इसके पीछे का मनोवैज्ञानिक कारण संभवत: यह है कि मन अपने ऊपर किये गये अनावश्यक हस्तक्षेप को कभी स्वीकार ही नहीं करता। वह उसमें होता है, उसे जीता है लेकिन जब उससे बाहर निकलता है तो उसको वहीं छोड़कर आगे बढ़ जाता है। कोरोना कॉल के लाकडाउन के चाहे जितने फायदे बताये गये हों, चाहे जितनी ताली और थाली बजायी गयी हो, सच्चाई तो यही है कि भारत में किसी के मन मानस ने भी कोरोना काल के लॉकडाउन को स्वीकार ही नहीं किया। लोगों ने समर्थन भी किया तो सुनी सुनाई बात पर और लोगों ने विरोध भी किया तो सुनी सुनाई बात पर। न समर्थन करने वाले को पता था कि वह जो कर रहा है वह सही है और न विरोध करने वालों को पक्के तौर पर पता था कि वह जो कर रहा है, वह सही है।

एक ऐसा वायरस जो दशकों पहले खोजा जा चुका था, जिसके टेस्ट की आरटीपीसीआर तकनीकी चार दशक से मौजूद थी, उसे नया वायरस क्यों बताया गया, यह आज तक किसी को समझ नहीं आया। विशेषज्ञों ने समझाया कि कोरोना वायरस तो पुराना है लेकिन इसका एक नया संस्करण आया है जिसका नाम कोविड है। फोन, गाड़ी और किताबों के संस्करण तो बनते छपते हैं लेकिन वायरस का संस्करण पैदा हुआ यह भी आम जनता के लिए नई बात थी। बताने वाले यह बात क्यों बता रहे थे, यह उन्हें भी नहीं पता था और सुनने वाले ये बात क्यों मान रहे थे, ये वो कभी समझ ही नहीं पाये।

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    कोरोनो को लेकर यही वह अनिश्चय था जिसने मानव मन पर इसे लेकर कोई धारणा बनने नहीं दी। हमारा मन जिस घटना की कोई निश्चित धारणा नहीं विकसित कर पाता, वह बात हमारे चित्त पर लंबे समय तक टिकती नहीं है। हमारे चित्त या मन पर वो बात ज्यादा लंबे समय तक रहती है जिसके बारे में हम निश्चित निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं। अनिश्चय की कोई अवधारणा नहीं होती। यही कोरोना और उसे रोकने के लिए लगाये गये लॉकडाउन पर भी लागू होता है। क्योंकि कोरोना को लेकर हमारा मन कभी निश्चित ही नहीं कर पाया कि इसे किस रूप में स्मृति में सहेजकर रखा जाए। इसलिए उससे जुड़ी खराब स्मृतियों को भी मन ने अस्वीकार कर दिया और आज तीन साल बाद भी हम याद भी नहीं करना चाहते कि ऐसा कुछ हुआ था। लॉकडाउन में कोरोना गाइडलाइन का नियम से पालन करते हुए हमने जितना हाथ धोया था, उसकी यादों को लेकर हमारी स्मृति उससे ज्यादा तेजी से धुल गयी।

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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